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Wed. Apr 22nd, 2026

पर्यावरण संकट पर मंथन, नीतियों और नीयत दोनों पर उठे सवाल

रांची। पृथ्वी दिवस के अवसर पर राजधानी के पुरानी विधानसभा सभागार में आयोजित कार्यक्रम में पर्यावरण संरक्षण और शासन व्यवस्था की कार्यशैली को लेकर तीखी चर्चाएं सामने आईं। युगांतर भारती और नेचर फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी में वक्ताओं ने स्पष्ट कहा कि पर्यावरण संकट केवल प्राकृतिक समस्या नहीं, बल्कि नीतिगत और व्यवहारिक चूक का परिणाम भी है।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने कहा कि आज सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों की कार्य संस्कृति गंभीर सवालों के घेरे में है। उन्होंने चिंता जताई कि पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी केवल आम जनता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि नीति-निर्माताओं, नौकरशाहों और बौद्धिक वर्ग को अधिक जिम्मेदारी के साथ आगे आना होगा। उनके अनुसार आम लोग तो पहले से ही पर्यावरणीय समस्याओं का दुष्परिणाम झेल रहे हैं, जबकि निर्णय लेने वाले वर्ग में अपेक्षित संवेदनशीलता का अभाव दिखता है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में विकास की अवधारणा को नए सिरे से समझने की जरूरत है। “सस्टेनेबल डेवलपमेंट” के बजाय “शाश्वत विकास” को अपनाने की बात करते हुए उन्होंने चेताया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तकनीकी प्रगति के इस दौर में अनियंत्रित विकास विनाश का कारण बन सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि तकनीक को सीमित और जिम्मेदारी के साथ उपयोग करना जरूरी है, क्योंकि यह एक अच्छा सेवक तो है, लेकिन खराब मालिक साबित हो सकती है।

सरयू राय ने पृथ्वी के बढ़ते तापमान को मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया। उन्होंने कहा कि अत्यधिक दोहन, भूमिगत खनन और वैज्ञानिक प्रयोगों के कारण प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है। लालच आधारित विकास मॉडल पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि “शुभ-लाभ” की जगह “लोभ-लाभ” की मानसिकता ने पर्यावरणीय संकट को और गहरा किया है।

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए युगांतर भारती के अध्यक्ष अंशुल शरण ने कहा कि “हमारी पृथ्वी, हमारा भविष्य” केवल नारा नहीं, बल्कि चेतावनी है। उन्होंने बताया कि आने वाले वर्षों में सोलर पैनलों से उत्पन्न होने वाला कचरा एक बड़ी चुनौती बनकर उभरेगा और 2047 तक यह लगभग 11 मिलियन टन तक पहुंच सकता है। इसके प्रबंधन के लिए अभी से ठोस नीति बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक तापमान में संभावित 0.3 डिग्री की वृद्धि भी खतरे की घंटी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

पूर्व कुल सचिव डॉ. एम.के. जमुआर ने अपने संबोधन में प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हजारों वर्ष पुराने ग्रंथों में पर्यावरण संरक्षण के मूल सिद्धांत पहले ही बताए जा चुके हैं। उन्होंने कहा कि जल, वायु और वनस्पति की शुद्धता को बनाए रखना ही पर्यावरण संतुलन का आधार है, लेकिन आधुनिक समाज इन मूल्यों से दूर होता जा रहा है।

वरिष्ठ पर्यावरणविद् डॉ. ओम सिंह ने कहा कि विश्व स्तर पर पृथ्वी दिवस मनाने के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाए हैं। उन्होंने इसका मुख्य कारण सरकार और जनता के बीच समन्वय की कमी को बताया। उनके अनुसार जब तक नीतियों और जनभागीदारी के बीच तालमेल नहीं बनेगा, तब तक पर्यावरण संरक्षण के प्रयास अधूरे ही रहेंगे।

कार्यक्रम के दौरान एक विस्तृत परिचर्चा सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें विभिन्न जिलों से आए प्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्र की पर्यावरणीय चुनौतियों और समाधान पर विचार रखे। वक्ताओं ने सामूहिक रूप से यह निष्कर्ष निकाला कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

कार्यक्रम का संचालन भारतेंदु झा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन धर्मेंद्र तिवारी ने किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

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