चाईबासा: पश्चिमी सिंहभूम के आदिवासी बहुल कोल्हान क्षेत्र में हो भाषा की वारंग क्षिति लिपि के जनक एवं साहित्यकार ओतगुरु कोल लाको बोदरा की प्रतिमा चाईबासा के तांबो चौक पर स्थापित करने की मांग उठी है। मांग करने वालों का कहना है कि कोल लाको बोदरा ने हो भाषा और वारंग क्षिति लिपि के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके कार्यों को देखते हुए उन्हें जिले में सम्मानजनक स्थान मिलना चाहिए।
मांग करने वालों ने कहा कि हो भाषा और वारंग क्षिति लिपि का अध्ययन झारखंड के कई स्कूलों और कॉलेजों में कराया जा रहा है। इसके अलावा रांची स्थित डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय में भी इस विषय की पढ़ाई होती है। वहीं, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के हो बहुल क्षेत्रों में भी इस भाषा और लिपि का अध्ययन कराया जा रहा है। ऐसे में कोल लाको बोदरा की प्रतिमा तांबो चौक पर स्थापित कर नई पीढ़ी को उनके योगदान से परिचित कराया जाना चाहिए।
इसके साथ ही लोगों ने वीर गंगाराम कालुंडिया के योगदान को भी याद किया। उनका कहना है कि गंगाराम कालुंडिया ने इचा–खरकाई बांध परियोजना के विरोध में आवाज उठाई थी। आंदोलन के दौरान उन्होंने क्षेत्र के कई गांवों और लोगों के हितों की रक्षा के लिए संघर्ष किया और अपने प्राणों का बलिदान दिया। आज भी विभिन्न सामाजिक संगठन उनके संघर्ष को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।
मांग करने वालों का कहना है कि कोल्हान क्षेत्र के अनेक वीर योद्धाओं और समाज सुधारकों ने समाज, भाषा, संस्कृति और जनहित के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ऐसे व्यक्तित्वों को सम्मान देने से नई पीढ़ी को अपने इतिहास, संस्कृति और विरासत की जानकारी मिलेगी। उन्होंने जिला प्रशासन और सरकार से तांबो चौक पर ओतगुरु कोल लाको बोदरा तथा वीर गंगाराम कालुंडिया सहित कोल्हान के प्रमुख ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को उचित सम्मान देने की मांग की।

