चाईबासा: जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने जीवन बीमा दावा अनुचित ढंग से खारिज करने के मामले में कैनरा एचएसबीसी लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के खिलाफ फैसला सुनाते हुए शिकायतकर्ता को राहत प्रदान की है। आयोग ने कंपनी को पांच लाख रुपये की बीमा राशि के अलावा मानसिक प्रताड़ना के लिए 50 हजार रुपये और वाद व्यय के लिए 10 हजार रुपये, यानी कुल 60 हजार रुपये हर्जाना देने का आदेश दिया है। आयोग ने माना कि पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में बीमा दावा अस्वीकार करना सेवा में कमी और मनमानी कार्रवाई है।
मामला चाईबासा निवासी रंजीता गुप्ता की शिकायत से जुड़ा है। उनके पति रघुबीर भारती ने जनवरी 2024 में पांच लाख रुपये की जीवन बीमा पॉलिसी ली थी और प्रथम प्रीमियम के रूप में 1.25 लाख रुपये जमा किए थे। 27 फरवरी 2024 को उनका निधन हो गया। इसके बाद रंजीता गुप्ता ने बीमा कंपनी के समक्ष दावा प्रस्तुत किया, लेकिन कंपनी ने यह कहते हुए भुगतान से इनकार कर दिया कि बीमाधारक ने पहले से मौजूद बीमारी की जानकारी प्रस्ताव पत्र में छिपाई थी।
सुनवाई के दौरान बीमा कंपनी ने दावा किया कि मृतक किडनी और लीवर संबंधी बीमारी से पीड़ित थे और उपचार करा रहे थे। हालांकि आयोग के समक्ष कंपनी अपने इस आरोप के समर्थन में कोई ठोस चिकित्सकीय साक्ष्य पेश नहीं कर सकी। आयोग ने कहा कि केवल अस्पताल का सामान्य रिकॉर्ड या मरीज पहचान संख्या इस बात का प्रमाण नहीं माना जा सकता कि बीमाधारक ने जानबूझकर बीमारी छिपाई थी।
आयोग ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि बीमारी छिपाने का आरोप सिद्ध करने की जिम्मेदारी पूरी तरह बीमा कंपनी की थी। जब कंपनी आरोप साबित करने में विफल रही तो बीमा दावा खारिज करना अनुचित और उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत सेवा में कमी माना जाएगा।
इसी आधार पर आयोग ने कंपनी को शिकायतकर्ता को पांच लाख रुपये की बीमा राशि का भुगतान करने, मानसिक कष्ट के लिए 50 हजार रुपये तथा मुकदमे के खर्च के लिए 10 हजार रुपये देने का आदेश दिया। साथ ही निर्देश दिया कि 45 दिनों के भीतर भुगतान नहीं होने पर बीमा राशि पर आदेश की तिथि से भुगतान तक नौ प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा। आयोग ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि बीमा राशि शिकायतकर्ता और उसके नाबालिग पुत्र के हितों की रक्षा करते हुए दी जाए।

