जमशेदपुर। पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने रविवार को रांची के मोरहाबादी मैदान में आयोजित रैली को लेकर कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने एक्स पर पोस्ट के जरिए परिसीमन के मुद्दे पर कांग्रेस के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि आदिवासी हितों की बात करने से पहले कांग्रेस को अपने पुराने फैसलों और नीतियों का हिसाब देना चाहिए।
चंपाई सोरेन ने अपने पोस्ट में दावा किया कि वर्ष 2008 में ओडिशा के मयूरभंज जिले में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या नौ से घटाकर सात कर दी गई थी। इसी तरह छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 34 से घटकर 29 होने का भी उन्होंने उल्लेख किया। उन्होंने इन आंकड़ों के आधार पर कांग्रेस की आदिवासी हितों को लेकर प्रतिबद्धता पर सवाल उठाया।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि आदिवासी समाज से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर कांग्रेस का रवैया संतोषजनक नहीं रहा है। उन्होंने बाबा कार्तिक उरांव की ओर से वर्ष 1967 में उठाए गए डीलिस्टिंग बिल का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि इसे आगे नहीं बढ़ाया गया। चंपाई सोरेन ने वर्ष 1961 में आदिवासी धर्म कोड हटाए जाने का भी उल्लेख करते हुए कांग्रेस पर आदिवासी समाज के हितों की अनदेखी करने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा कि परिसीमन का मुद्दा केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसका असर आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी देखा जाना चाहिए। चंपाई सोरेन ने कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया में जनगणना, जनसंख्या के आंकड़े, डेमोग्राफी और अन्य निर्धारित मानकों को ध्यान में रखा जाता है, लेकिन उनका स्पष्ट मत है कि परिसीमन के बाद शेड्यूल एरिया में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या बढ़नी चाहिए।
चंपाई सोरेन ने आदिवासी आरक्षण और सरकारी नौकरियों को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि आदिवासियों के लिए आरक्षित 90 प्रतिशत से अधिक सरकारी नौकरियों पर धर्मांतरित ईसाइयों का कब्जा है। इसके साथ ही उन्होंने सिमडेगा, पाकुड़ और साहिबगंज समेत कई जिलों में जाहेरस्थान और सरना स्थलों की स्थिति पर चिंता जताई और आरोप लगाया कि कई स्थानों पर इन धार्मिक स्थलों पर ताले लगने की स्थिति पैदा हो गई है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि आदिवासी समाज के अधिकारों और उसकी पहचान से जुड़े विषयों को लेकर केंद्र सरकार गंभीर है। उन्होंने उम्मीद जताई कि परिसीमन की प्रक्रिया में अनुसूचित जनजाति के हितों का ध्यान रखा जाएगा और आदिवासी समाज के साथ किसी तरह का अन्याय नहीं होगा।

