जमशेदपुर। भारत के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने राजसत्ता, संस्कृति, शिक्षा और समाजसेवा के बीच अद्भुत संतुलन स्थापित किया। मैसूर के अंतिम महाराजा तथा विश्व हिन्दू परिषद के प्रथम अध्यक्ष श्री जयचामराज वाडियार ऐसे ही महान व्यक्तित्व थे। वे केवल एक सफल शासक ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के संवाहक, विद्वान, संगीत प्रेमी, समाज सुधारक और राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने वाले दूरदर्शी नेता थे। 18 जुलाई 1919 को जन्मे जयचामराज वाडियार का जीवन भारतीय परंपरा, आधुनिक दृष्टि और राष्ट्रभक्ति का अनुपम उदाहरण है।
विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना के समय उन्हें सर्वसम्मति से प्रथम अध्यक्ष चुना जाना उनके व्यक्तित्व की व्यापक स्वीकार्यता का प्रमाण था। उन्होंने अपने जीवन में यह सिद्ध किया कि सत्ता का वास्तविक उद्देश्य समाज, संस्कृति और राष्ट्र की सेवा है।
श्री जयचामराज वाडियार का जन्म 18 जुलाई 1919 को मैसूर के प्रसिद्ध वाडियार राजवंश में हुआ। वे युवराज कान्तिराव नरसिंहराजा वाडियार तथा युवरानी केम्पु चेलुवाजा अम्मानी के एकमात्र पुत्र थे। बचपन से ही उनमें अध्ययन, अनुशासन और भारतीय संस्कृति के प्रति विशेष अनुराग दिखाई देता था। उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय से 1938 में स्नातक परीक्षा प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त कर उत्तीर्ण की। उन्हें पाँच स्वर्ण पदकों से सम्मानित किया गया, जो उनकी असाधारण प्रतिभा का परिचायक था।
शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने शासन और प्रशासन का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया, जिससे आगे चलकर वे एक कुशल शासक सिद्ध हुए। 1939 में उनके पिता और 1940 में उनके चाचा महाराजा नाल्वदी कृष्णराज वाडियार के निधन के बाद मात्र 21 वर्ष की आयु में 8 सितम्बर 1940 को जयचामराज वाडियार मैसूर के महाराजा बने।
यह वह समय था जब भारत स्वतंत्रता आंदोलन के निर्णायक दौर से गुजर रहा था। अनेक रियासतों के सामने भविष्य को लेकर असमंजस था, लेकिन जयचामराज वाडियार ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए स्वतंत्र भारत के निर्माण का समर्थन किया।
भारत के एकीकरण में निभाई ऐतिहासिक भूमिका
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। इसके बाद देशी रियासतों के भारत में विलय का कार्य प्रारंभ हुआ। जयचामराज वाडियार ने बिना किसी विवाद या शर्त के अपने राज्य के भारत में विलय का निर्णय लिया। उन्होंने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर राष्ट्रीय एकता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने के साथ मैसूर रियासत भारतीय गणराज्य का हिस्सा बन गई। इसके बाद भी उन्हें मैसूर का राजप्रमुख बनाया गया। वर्ष 1956 में राज्यों के भाषाई पुनर्गठन के बाद नए मैसूर राज्य (वर्तमान कर्नाटक) के राज्यपाल के रूप में उन्होंने 1964 तक अपनी सेवाएँ दीं। बाद में वे 1964 से 1966 तक तमिलनाडु के राज्यपाल भी रहे।
विश्व हिन्दू परिषद के प्रथम अध्यक्ष
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, 29 अगस्त 1964 को स्वामी चिन्मयानंद जी की अध्यक्षता में मुंबई के सांदीपनि आश्रम में विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना हुई। इसका उद्देश्य विश्वभर में बसे हिन्दुओं को सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आधार पर जोड़ना तथा भारतीय जीवन मूल्यों का संरक्षण करना था।
इस ऐतिहासिक अवसर पर देश के अनेक संत, धर्माचार्य, विद्वान और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे। परिषद के प्रथम महामंत्री का दायित्व संघ के वरिष्ठ प्रचारक दादासाहब आप्टे ने संभाला, जबकि अध्यक्ष पद के लिए सर्वसम्मति से श्री जयचामराज वाडियार का चयन किया गया।
उस समय वे राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर थे। ऐसे समय में परिषद का नेतृत्व स्वीकार करना उनके साहस, स्पष्ट सोच और भारतीय संस्कृति के प्रति समर्पण का परिचायक था।
1965 में मैसूर राजमहल में उनकी अध्यक्षता में परिषद की महत्वपूर्ण बैठक हुई और उसी वर्ष प्रयागराज के कुंभ मेले में प्रथम विश्व हिन्दू सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसने विश्व हिन्दू परिषद को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार प्रदान किया।
संस्कृति और साहित्य के महान संरक्षक
जयचामराज वाडियार भारतीय संस्कृति के सच्चे साधक थे। उन्हें संस्कृत, दर्शन, संगीत और साहित्य में गहरी रुचि थी। उन्होंने “जयचामराज ग्रंथ रत्नमाला” योजना के अंतर्गत सैकड़ों संस्कृत ग्रंथों का कन्नड़ भाषा में अनुवाद कराया, जिससे सामान्य जन भी भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ सके।
ऋग्वेद के 35 भागों सहित अनेक महत्वपूर्ण धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों का प्रकाशन उनके संरक्षण में हुआ। उनका विश्वास था कि भारत की आत्मा उसके शास्त्रों, संस्कृति और ज्ञान परंपरा में बसती है।
जयचामराज वाडियार स्वयं एक कुशल पियानो वादक थे। उन्हें भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ पश्चिमी शास्त्रीय संगीत का भी गहन ज्ञान था। उन्होंने अनेक भारतीय और विदेशी संगीतकारों को संरक्षण दिया। संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला। वे मानते थे कि संगीत मानवता को जोड़ने का सबसे प्रभावशाली माध्यम है।
खेल प्रतिभाओं के समर्थक
वे खेलों के भी बड़े संरक्षक थे। प्रसिद्ध टेनिस खिलाड़ी रामनाथ कृष्णन तथा भारतीय क्रिकेट के महान स्पिनर ई. ए. एस. प्रसन्ना को उनके संरक्षण और आर्थिक सहयोग से आगे बढ़ने का अवसर मिला।
उनकी सोच थी कि शिक्षा, संस्कृति और खेल तीनों मिलकर एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण करते हैं।
महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के विचारों से प्रभावित जयचामराज वाडियार ने ग्रामीण विकास और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया। उन्होंने हस्तशिल्प और पारंपरिक उद्योगों को संरक्षण देकर हजारों लोगों के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए।
वे चाहते थे कि समाज में जाति, पंथ और भाषा के आधार पर कोई भेदभाव न रहे। उनका मानना था कि सच्चा विकास तभी संभव है जब समाज का अंतिम व्यक्ति भी सम्मानपूर्वक जीवन जी सके।
विदेश यात्राओं के दौरान भी जयचामराज वाडियार सदैव भारतीय वेशभूषा धारण करते थे। उनके सिर पर मैसूर की पारंपरिक पगड़ी उनकी सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक थी।
राजशाही समाप्त होने के बाद भी उन्होंने मैसूर के विश्वप्रसिद्ध दशहरा महोत्सव को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वाडियार राजवंश देवी चामुंडेश्वरी का परम भक्त रहा है और दशहरा महोत्सव उसी परंपरा का जीवंत स्वरूप है।
जनता के हित में साहसिक निर्णय
अपने शासनकाल में उन्होंने कई नरभक्षी शेरों और हिंसक हाथियों का शिकार कर ग्रामीण जनता को भयमुक्त किया। उस समय यह केवल शिकार नहीं बल्कि जनसुरक्षा का महत्वपूर्ण कार्य माना जाता था।
उनका प्रशासन न्यायप्रिय, संवेदनशील और जनकल्याणकारी माना जाता था। वे स्वयं जनता की समस्याओं को सुनते और उनके समाधान का प्रयास करते थे।
अल्पायु में महान जीवन यात्रा का समापन
देश, धर्म और संस्कृति के इस महान उपासक का 23 सितम्बर 1974 को मात्र 55 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनका जीवन भले ही छोटा रहा, लेकिन उनके कार्यों की विरासत आज भी प्रेरणा देती है।
जयचामराज वाडियार का जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व पद और शक्ति से नहीं, बल्कि सेवा, संस्कृति, ज्ञान और राष्ट्र के प्रति समर्पण से बनता है।
उन्होंने आधुनिक प्रशासन और भारतीय परंपरा का ऐसा संतुलन प्रस्तुत किया जो आज भी अनुकरणीय है। विश्व हिन्दू परिषद के प्रथम अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संगठन को वैचारिक दिशा दी। एक शासक के रूप में उन्होंने राष्ट्रहित को व्यक्तिगत हितों से ऊपर रखा। एक विद्वान के रूप में भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण का कार्य किया और एक समाजसेवी के रूप में जनकल्याण को अपने जीवन का ध्येय बनाया।
उनकी जन्म-जयंती पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यही कहा जा सकता है कि जयचामराज वाडियार भारतीय संस्कृति, राष्ट्रनिष्ठा, सुशासन और लोकसेवा के ऐसे उज्ज्वल नक्षत्र हैं जिनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरणा देता रहेगा।
लेखक एवं कवि वरुण कुमार के सौजन्य से

