भारत वर्ष 2047 में आजादी के 100 वर्ष पूरे करेगा। उस समय तक देश का राजनीतिक परिदृश्य भी मौजूदा दौर से काफी अलग होगा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि क्या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद भी अपनी राजनीतिक बढ़त बनाए रख पाएगी? राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मलिकराम का मानना है कि 2047 तक भाजपा का भविष्य कई बड़े राजनीतिक, संगठनात्मक और सामाजिक बदलावों पर निर्भर करेगा।
डॉ. मलिकराम के अनुसार, 1980 में महज दो लोकसभा सीटों से शुरुआत करने वाली भाजपा ने 2014 और 2019 में पूर्ण बहुमत हासिल कर राष्ट्रीय राजनीति की दिशा बदल दी। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को सरकार बनाने के लिए गठबंधन का सहारा लेना पड़ा। ऐसे में आने वाले दो दशकों में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी चुनावी बढ़त को बनाए रखने और नए नेतृत्व को स्थापित करने की होगी।
परिसीमन भाजपा के भविष्य का सबसे बड़ा कारक
डॉ. मलिकराम का कहना है कि 2027 की जनगणना के बाद प्रस्तावित लोकसभा परिसीमन भाजपा की राजनीतिक संभावनाओं को सबसे अधिक प्रभावित करेगा। यदि संसद के नए भवन की क्षमता के अनुरूप लोकसभा का विस्तार 888 सदस्यों तक होता है, तो हिंदी भाषी राज्यों का प्रतिनिधित्व उल्लेखनीय रूप से बढ़ सकता है।
उनके अनुसार, उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर लगभग 151 और बिहार की सीटें 40 से बढ़कर करीब 82 होने का अनुमान है। चूंकि इन राज्यों में भाजपा का मजबूत जनाधार है, इसलिए यह बदलाव पार्टी के लिए राजनीतिक अवसर साबित हो सकता है। वहीं, जनसंख्या नियंत्रण में सफल दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम होने की संभावना है। उदाहरण के तौर पर तमिलनाडु की हिस्सेदारी 7.2 प्रतिशत से घटकर लगभग 6 प्रतिशत तक आ सकती है। उनका मानना है कि ऐसी स्थिति में भाजपा पर उत्तर भारत केंद्रित पार्टी होने की धारणा मजबूत हो सकती है, जिससे निपटने के लिए उसे क्षेत्रीय गठबंधनों और स्थानीय सांस्कृतिक मुद्दों पर अधिक ध्यान देना होगा।
मोदी के बाद नेतृत्व परिवर्तन होगी सबसे बड़ी परीक्षा
डॉ. मलिकराम के मुताबिक, 2047 तक भाजपा के सामने सबसे महत्वपूर्ण आंतरिक चुनौती नेतृत्व परिवर्तन की होगी। नरेंद्र मोदी, जो 2014 से पार्टी का प्रमुख चेहरा रहे हैं, उस समय तक 96 वर्ष के होंगे। ऐसे में पार्टी को नए नेतृत्व को तैयार करना होगा, जो बदलते भारत और वैश्विक चुनौतियों के अनुरूप राजनीति कर सके।
उनका कहना है कि भविष्य का भाजपा नेतृत्व अधिक तकनीक-आधारित होगा और डिजिटल इकोनॉमी, जलवायु परिवर्तन तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देगा। साथ ही पार्टी का संगठनात्मक ढांचा भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और डेटा आधारित व्यवस्था में बदल जाएगा। ब्लॉकचेन आधारित सदस्यता, एआई संचालित बूथ प्रबंधन और 24 घंटे सक्रिय डिजिटल वॉर रूम जैसी व्यवस्थाएं चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन सकती हैं।
जेन-जी और महिला मतदाता तय करेंगे राजनीतिक दिशा
डॉ. मलिकराम का मानना है कि 2047 के चुनावों में सबसे प्रभावशाली मतदाता वर्ग जेन-जी होगा, जो पूरी तरह डिजिटल परिवेश में पला-बढ़ा है। यह वर्ग जाति और धर्म की पारंपरिक राजनीति से अधिक विकास, रोजगार, नवाचार और पर्यावरण जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देगा।
उन्होंने कहा कि महिला मतदाता भी चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाएंगी। 2027 के परिसीमन के बाद संसद में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण 2034 तक पूरी तरह लागू होने की संभावना है। ऐसे में भाजपा को महिला सशक्तिकरण को केवल चुनावी नारे तक सीमित रखने के बजाय टिकट वितरण और नीतिगत निर्णयों का प्रमुख आधार बनाना होगा।
आर्थिक विकास के साथ समावेशी लाभ पहुंचाना होगी चुनौती
डॉ. मलिकराम के अनुसार, भारत ने 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस दिशा में भाजपा आत्मनिर्भर भारत जैसी आर्थिक नीतियों को आगे बढ़ा सकती है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। इसके लिए कृषि सुधार, हरित ऊर्जा और समावेशी विकास पर विशेष ध्यान देना आवश्यक होगा।
भाजपा के सामने होंगी पांच बड़ी चुनौतियां
राजनीतिक विश्लेषण के आधार पर डॉ. मलिकराम ने 2047 तक भाजपा के सामने पांच प्रमुख चुनौतियां गिनाई हैं। इनमें मजबूत होती विपक्षी एकजुटता, जनसांख्यिकीय बदलाव के कारण वरिष्ठ नागरिकों की बढ़ती आबादी, संभावित आर्थिक मंदी, सोशल मीडिया पर फर्जी खबरों और डीपफेक का खतरा तथा परिसीमन के बाद क्षेत्रीय अस्मिता के आधार पर क्षेत्रीय दलों का संभावित पुनरुत्थान शामिल हैं।
तीन संभावित राजनीतिक परिदृश्य
डॉ. मलिकराम के अनुसार, इन सभी कारकों को देखते हुए 2047 में भाजपा के सामने तीन संभावित राजनीतिक स्थितियां बन सकती हैं। पहला, पार्टी 350 से अधिक सीटें जीतकर मजबूत बहुमत हासिल करे। दूसरा, क्षेत्रीय दलों के सहयोग से गठबंधन सरकार का गठन करे। तीसरा, विपक्षी दलों के मजबूत पुनरुत्थान की स्थिति में भाजपा सत्ता से बाहर हो जाए।
उन्होंने कहा कि भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका व्यापक कैडर नेटवर्क है, जबकि दक्षिण भारत में सीमित राजनीतिक विस्तार उसकी प्रमुख कमजोरी बना हुआ है। उनका निष्कर्ष है कि 2047 की भाजपा आज की तुलना में कहीं अधिक तकनीक-आधारित और आधुनिक संगठन होगी। पार्टी की दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह बदलते सामाजिक, राजनीतिक और तकनीकी परिवेश के अनुरूप खुद को कितनी तेजी से ढालती है और नई पीढ़ी का भरोसा जीतने में कितनी सफल रहती है।

