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Thu. Jul 16th, 2026

लोकतंत्र में विरोध की मर्यादा भी उतनी ही आवश्यक है जितना विरोध का अधिकार

जमशेदपुर। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी असहमति को स्वीकार करने की क्षमता है। किसी भी जनप्रतिनिधि, सरकार, दल या विचारधारा का विरोध करना नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। यही अधिकार लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखता है। किंतु यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि विरोध और विद्वेष में एक महीन किंतु स्पष्ट रेखा होती है। जब विरोध विचारों से हटकर व्यक्ति के सम्मान पर हमला करने लगे, तब लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है।

जमशेदपुर में हाल में जो घटनाक्रम सामने आया, उसने इसी प्रश्न को फिर से हमारे सामने खड़ा कर दिया है। जमशेदपुर पश्चिम के विधायक श्री सरयू राय के एक बयान को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। आरोप लगाया गया कि उन्होंने पूरे मानगो क्षेत्र के लोगों को अपराधी कहा है। इसी आरोप के आधार पर विरोध-प्रदर्शन आयोजित हुआ। प्रदर्शन के दौरान उनकी तस्वीर पर गुटखा थूका गया, उसे पैरों से रौंदा गया और अश्लील गालियों का खुलेआम प्रयोग किया गया। पुतला दहन भी किया गया, जिसमें विडंबना यह रही कि पुतला दहन करने वालों में से ही दो लोग झुलस गए।

यहाँ प्रश्न किसी दल या व्यक्ति का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या लोकतांत्रिक विरोध का स्तर अब इतना नीचे आ जाएगा कि असहमति व्यक्त करने के लिए अपमानजनक और अमर्यादित व्यवहार को सामान्य मान लिया जाए? यदि ऐसा होने लगा तो कल यही संस्कृति समाज के हर क्षेत्र में दिखाई देगी।

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी प्रेरणा महात्मा गांधी की सत्याग्रह परंपरा रही है। गांधी ने सत्ता का सबसे कठोर विरोध किया, किंतु विरोधी के सम्मान को कभी समाप्त नहीं किया। डॉ. राममनोहर लोहिया ने तीखे राजनीतिक संघर्ष किए, लेकिन भाषा की मर्यादा बनाए रखी। अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में सबसे प्रखर विपक्ष का नेतृत्व किया, पर व्यक्तिगत कटुता को कभी राजनीति का आधार नहीं बनाया। लोकतंत्र की यही परंपरा भारत की वास्तविक ताकत रही है।

आज दुर्भाग्य यह है कि सोशल मीडिया और सड़क की राजनीति ने कई बार शालीन संवाद की जगह उत्तेजना को दे दी है। राजनीतिक मतभेदों को व्यक्तिगत शत्रुता में बदल देना लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए शुभ संकेत नहीं है। विचार का उत्तर विचार से दिया जाना चाहिए। यदि किसी नेता का बयान गलत है तो उसका तथ्यात्मक प्रतिवाद किया जा सकता है, प्रेस कॉन्फ्रेंस की जा सकती है, ज्ञापन दिया जा सकता है, शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया जा सकता है, न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है या जनता के बीच जाकर उसके विचारों को चुनौती दी जा सकती है। लेकिन किसी की तस्वीर पर थूकना, उसे पैरों से रौंदना और अश्लील गालियाँ देना लोकतांत्रिक प्रतिरोध नहीं, बल्कि संवाद की पराजय का प्रतीक है।

यदि विरोध के बाद उसी पक्ष के लोगों को सोशल मीडिया पर माफी मांगनी पड़े, तो यह भी आत्ममंथन का विषय है। कोई भी आंदोलन अपनी नैतिक शक्ति से बड़ा बनता है, आक्रामकता से नहीं। लोकतंत्र में नैतिक ऊँचाई ही सबसे प्रभावी हथियार होती है।

सरयू राय को केवल चार बार के विधायक के रूप में देखना उनके सार्वजनिक जीवन का अधूरा आकलन होगा। वे उन नेताओं में हैं जिन्होंने लंबे समय तक वित्तीय पारदर्शिता, पर्यावरण संरक्षण, प्रशासनिक जवाबदेही और भ्रष्टाचार जैसे विषयों पर लगातार काम किया है। वे भाजपा और जनता दल (यूनाइटेड) जैसे दलों से जुड़े रहे, लेकिन उनकी पहचान केवल दलगत राजनीति तक सीमित नहीं रही। जनहित के अनेक मुद्दों पर उन्होंने अपनी स्वतंत्र राय रखी और आवश्यकता पड़ने पर अपनी ही सरकारों से असहमति जताने का साहस भी दिखाया।

रेल यात्रियों की समस्याओं को लेकर उनका धरना हो, जमशेदपुर से गुजरने वाली ट्रेनों की समयपालन व्यवस्था पर रेलवे प्रशासन को जवाबदेह बनाने का प्रयास हो, या दामोदर नदी के प्रदूषण और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर अध्ययन यात्राएँ—उन्होंने ऐसे मुद्दे उठाए जिन पर तत्काल राजनीतिक लाभ की संभावना बहुत कम थी। यही कारण है कि उनके समर्थक उन्हें केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि जनहित के प्रश्नों को प्राथमिकता देने वाला सार्वजनिक व्यक्तित्व मानते हैं।

लगभग 76 वर्ष की आयु में भी उनकी सक्रियता उल्लेखनीय है। सुबह-सुबह लोगों की समस्याएँ सुनना, विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेना और लगातार सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहना उनकी कार्यशैली का हिस्सा रहा है। राजनीतिक विरोधियों से भी व्यक्तिगत संबंध बनाए रखना उनके व्यक्तित्व की एक विशेषता मानी जाती है।

मेरी जानकारी में इस पूरे प्रकरण पर श्री राय की कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। संभव है कि वे आगे भी मौन रहें या फिर उचित समय आने पर अपनी शैली में प्रतिक्रिया दें। सार्वजनिक जीवन का लंबा अनुभव रखने वाले लोग अक्सर तत्काल प्रतिक्रिया देने की बजाय परिस्थितियों का आकलन कर निर्णय लेते हैं। यह उनका अधिकार भी है और उनकी राजनीतिक शैली भी।

इस पूरे घटनाक्रम में मीडिया की भूमिका अपेक्षाकृत संतुलित दिखाई दी। अधिकांश समाचार माध्यमों ने शीर्षकों में “कथित” जैसे शब्दों का प्रयोग किया। पत्रकारिता का दायित्व केवल घटनाओं का प्रसारण करना नहीं, बल्कि तथ्यों और भाषा के बीच संतुलन बनाए रखना भी है। लोकतंत्र में मीडिया तभी विश्वसनीय बनता है जब वह उत्तेजना नहीं, बल्कि प्रमाण और संयम को महत्व देता है।

यह घटना केवल एक विधायक के सम्मान का प्रश्न नहीं है। यह उस राजनीतिक संस्कृति का आईना है जिसे हम आने वाली पीढ़ियों को सौंपना चाहते हैं। यदि हम असहमति को अपमान में बदल देंगे तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी—संवाद—कमजोर पड़ जाएगी। लोकतंत्र की रक्षा केवल चुनावों से नहीं होती; उसकी रक्षा नागरिकों की भाषा, व्यवहार, मर्यादा और राजनीतिक संस्कृति से भी होती है।

मतभेद लोकतंत्र की शक्ति हैं, लेकिन मर्यादा उसकी आत्मा है। यदि आत्मा ही घायल हो जाए, तो लोकतंत्र केवल एक व्यवस्था बनकर रह जाएगा, एक संस्कृति नहीं।

पत्रकार आनंद सिंह के सौजन्य से

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