जमशेदपुर। देशभर में पर्वत शृंखलाओं और नदियों पर बढ़ते संकट को लेकर जमशेदपुर में सोमवार को आयोजित एक योजनाबद्ध सम्मेलन में पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गंभीर चिंता जताई। सम्मेलन में कहा गया कि अवैध खनन, अतिक्रमण, अनियंत्रित औद्योगिक विस्तार और जल संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण पहाड़ों और नदियों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान में भारत में पहाड़ों और नदियों के संरक्षण एवं पुनर्जनन के लिए कोई समर्पित और सशक्त कानून नहीं है, जिसके कारण इनके संरक्षण का कार्य प्रभावी रूप से नहीं हो पा रहा है।
सम्मेलन में जानकारी दी गई कि इसी विषय पर व्यापक राष्ट्रीय विमर्श के लिए 22 और 23 मई 2026 को जमशेदपुर के मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल सभागार में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जाएगी। इस संगोष्ठी का आयोजन जलपुरुष राजेंद्र सिंह और जमशेदपुर पूर्वी के विधायक सरयू राय के संरक्षण में किया जा रहा है। कार्यक्रम के संयोजक दिनेश मिश्र ने बताया कि देशभर से पर्यावरणविद, जल विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, विधि विशेषज्ञ और सामाजिक प्रतिनिधि इसमें भाग लेंगे।
दिनेश मिश्र ने कहा कि संगोष्ठी में “भारतीय पर्वत संरक्षण एवं संवर्धन अधिनियम” तथा “नदियों के संरक्षण एवं पुनर्जनन अधिनियम” का प्रारूप तैयार किया जाएगा, जिसे बाद में भारत सरकार को सौंपा जाएगा ताकि संसद में कानून बन सके। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 48ए और 51ए(ग) में पर्यावरण संरक्षण का स्पष्ट दायित्व निर्धारित है, लेकिन पहाड़ों और नदियों की वैधानिक परिभाषा और संरक्षित क्षेत्र तय नहीं होने के कारण इनके संरक्षण में कठिनाइयाँ आ रही हैं।
सम्मेलन में यह भी कहा गया कि हिमालय, पश्चिमी घाट, अरावली, विंध्य और सतपुड़ा जैसी पर्वत श्रृंखलाएँ जलवायु परिवर्तन, खनन और वनों की कटाई से प्रभावित हो रही हैं, जबकि अधिकांश नदियाँ प्रदूषण और अतिक्रमण के कारण नालों में बदलती जा रही हैं। वक्ताओं ने “नदी पंचायत” जैसी स्थानीय व्यवस्था लागू करने, अवैध खनन पर रोक लगाने, जल स्रोतों के अतिक्रमण को समाप्त करने और पारंपरिक जल संरचनाओं के पुनर्जीवन की आवश्यकता पर बल दिया।

