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घाटशिला उपचुनाव : सियासी प्रतिष्ठा, जनभावना और भविष्य की कसौटी पर खड़ी निर्णायक जंग

जमशेदपुर। पूर्वी सिंहभूम जिला स्थित घाटशिला विधानसभा उपचुनाव अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। 11 नवंबर को मतदान होना है, और 9 नवंबर की शाम प्रचार का शोर थम जाएगा। उसके बाद मतदाता तय करेंगे कि घाटशिला की बागडोर किसके हाथों में जाएगी। कुल 2,55,823 मतदाता इस बार अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे, और यह तय करेंगे कि सत्ता की डगर झामुमो की ओर मुड़ेगी या भाजपा के पक्ष में हवा बहेगी।

इस बार का चुनावी मुकाबला जितना सरल दिखता है, उतना ही पेचीदा है। मैदान में भले ही 13 प्रत्याशी हों, लेकिन असली जंग तीन के बीच सिमटी है — झारखंड मुक्ति मोर्चा, भारतीय जनता पार्टी और झारखंड लोक कल्याण मोर्चा के बीच। तीनों ही दल घाटशिला की जनता को साधने के लिए आखिरी दम तक जुटे हुए हैं।

झामुमो की ओर से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन की जोड़ी लगातार मैदान में सक्रिय है। पार्टी ने पूरे संगठन को एक्टिव मोड में डाल दिया है। बताया जाता है कि अंतिम दो दिनों के लिए पार्टी ने विशेष रणनीति तैयार की है, जिसके तहत हर पंचायत में “मिनी जनसंवाद” कार्यक्रम और महिला समूहों की बैठकों के जरिए मतदाताओं से सीधा जुड़ाव बनाया जा रहा है। झामुमो का फोकस इस बार ओबीसी और महिला मतदाताओं पर है, जिन्हें निर्णायक माना जा रहा है।

दूसरी ओर भाजपा ने घाटशिला उपचुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया है। पार्टी नेतृत्व ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि “घाटशिला जीतने के लिए बूथ स्तर पर पूरी ताकत झोंकनी होगी।” इसके लिए 42 कमजोर बूथों पर विशेष टीमें तैनात की गई हैं, जिनकी निगरानी सीधे प्रदेश स्तर से की जा रही है। भाजपा के दिग्गज नेता बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, रघुवर दास, आदित्य साहू, पूर्व मंत्री बड़कुल गगराई और बंगाल से सुवेंदु अधिकारी सहित अन्य भाजपा के बड़े नेता लगातार क्षेत्र में जनसभाएं कर रहे हैं। पार्टी अपने बूथ मैनेजमेंट और संगठन की मजबूती पर भरोसा जता रही है, हालांकि स्थानीय स्तर पर कुछ मतभेद अब भी बने हुए हैं जो परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं।

तीसरी ओर, झारखंड लोक कल्याण मोर्चा (जेएलकेएम) के सुप्रीमो जयराम महतो एक बार फिर चुनावी समीकरणों में हलचल पैदा कर चुके हैं। वे अकेले ही झामुमो और भाजपा दोनों के लिए चुनौती बन गए हैं। उनका जनाधार सीमित होते हुए भी प्रभावशाली है, और पिछली विधानसभा की तरह इस बार भी वे वोट बैंक में सेंध लगाने की स्थिति में हैं। यही वजह है कि दोनों बड़े दल उनके प्रभाव को नज़र अंदाज नहीं कर पा रहे हैं।

घाटशिला की इस जंग को राजनीतिक विश्लेषक “नेतृत्व बनाम नेटवर्क” की लड़ाई बता रहे हैं। झामुमो हेमंत-कल्पना के नेतृत्व और भावनात्मक जुड़ाव के सहारे मैदान में है, जबकि भाजपा बूथ प्रबंधन और स्थानीय कार्यकर्ताओं की ताकत पर भरोसा कर रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन चार दिनों से घाटशिला में कैंप कर रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि इस उपचुनाव को वे खुद की साख से जोड़कर देख रहे हैं।

इस चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन का राजनीतिक भविष्य भी दांव पर लगा है। भाजपा में शामिल होने के बाद वे अपने पुत्र सोमेश सोरेन के लिए टिकट पाने में सफल तो रहे, लेकिन अब उनकी राजनीतिक साख का फैसला मतदाता करेंगे। अगर सोमेश को जीत मिलती है, तो चंपाई सोरेन का कद भाजपा में और मज़बूत होगा, अन्यथा उनके विरोधियों को हमला बोलने का मौका मिल जाएगा।

उधर, चुनावी सरगर्मी के बीच जुबानी जंग भी तेज हो गई है। हेमंत सोरेन ने बयान दिया कि “बाबूलाल सोरेन को झामुमो का पैसा खाने वाला बैल कहा गया,भाजपा से चुनाव लड़ रहे हैं”, तो चंपाई सोरेन ने पलटवार करते हुए कहा कि “हेमंत सरकार ने संताल इलाके में 300 घुसपैठियों को पनाह दी है, जिन्हें अब तक बाहर नहीं निकाला गया।” इस तीखी बयानबाज़ी ने घाटशिला की हवा में नई गर्मी भर दी है।

अब सबकी निगाहें 11 नवंबर के मतदान और 14 नवंबर को आने वाले नतीजों पर टिक गई हैं। घाटशिला की जनता यह तय करेगी कि क्या हेमंत-कल्पना की जोड़ी फिर से जीत का परचम लहराएगी या भाजपा अपने पुराने किले पर भगवा फहराने में सफल होगी। इस चुनाव में हर पार्टी का भविष्य और कई नेताओं की साख दांव पर है।

घाटशिला की गलियों में अब बस एक ही सवाल गूंज रहा है — “कौन जीतेगा घाटशिला?”

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