जमशेदपुर ।जन्माष्टमी से पूर्व श्रावण पूर्णिमा के आसपास मनाई जाने वाली हयग्रीव जयंती भगवान विष्णु के उस दिव्य अवतार का स्मरण कराती है, जिन्हें ज्ञान, विद्या, बुद्धि और वेदों की रक्षा का प्रतीक माना गया है। भारतीय सनातन परंपरा में भगवान हयग्रीव का स्वरूप अत्यंत विशिष्टहै।अश्वमुखी और दिव्य तेज से युक्त उनका स्वरूप इस बात का संदेश देता है कि मानव जीवन में शक्ति से अधिक महत्वपूर्ण उसका विवेक, ज्ञान और सद्बुद्धि है।
भारतीय संस्कृति में ज्ञान को केवल सांसारिक उन्नति का साधन नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाली शक्ति माना गया है। इसी कारण भगवान हयग्रीव की उपासना विद्या और बुद्धि की साधना से जुड़ी हुई है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु ने हयग्रीव अवतार धारण कर वेदों की रक्षा की और उन्हें पुनः स्थापित किया। इसीलिए वेदों की परंपरा और ज्ञान की निरंतरता के रक्षक के रूप में उनका विशेष महत्व माना जाता है।
पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार एक समय असुरों ने वेदों को चुरा लिया था। वेदों के लुप्त हो जाने से सृष्टि में ज्ञान और धर्म की व्यवस्था प्रभावित होने लगी। तब भगवान विष्णु ने हयग्रीव रूप धारण किया और वेदों को पुनः प्राप्त कर उनकी रक्षा की। इस कथा का आध्यात्मिक संदेश अत्यंत गहरा है। जब अज्ञान, अहंकार और अधर्म का प्रभाव बढ़ता है, तब ज्ञान और सत्य की पुनर्स्थापना ही समाज को सही दिशा प्रदान करती है।भगवान हयग्रीव का स्वरूप भी अपने भीतर अनेक प्रतीक समेटे हुए है। अश्व को भारतीय परंपरा में गति, ऊर्जा, सामर्थ्य और चेतना का प्रतीक माना गया है। वहीं भगवान विष्णु संरक्षण और व्यवस्था के अधिष्ठाता माने जाते हैं। इस प्रकार हयग्रीव अवतार ज्ञान की रक्षा के साथ-साथ उसे समाज और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी का भी संदेश देता है।
भारतीय शिक्षा परंपरा में गुरु, शिष्य और ज्ञान के बीच संबंध को अत्यंत पवित्र माना गया है। वेदों से लेकर उपनिषदों और विभिन्न शास्त्रों तक ज्ञान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखने की समृद्ध परंपरा रही है। मौखिक परंपरा के माध्यम से हजारों वर्षों तक वैदिक मंत्रों का संरक्षण भारतीय सभ्यता की अद्भुत उपलब्धि है। भगवान हयग्रीव की आराधना इसी ज्ञान-परंपरा के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत करती है।हयग्रीव जयंती के अवसर पर श्रद्धालु भगवान विष्णु के इस स्वरूप का पूजन करते हैं। विशेष रूप से विद्यार्थी, शिक्षक, विद्वान और शिक्षा से जुड़े लोग ज्ञान तथा सफलता की कामना से भगवान हयग्रीव का स्मरण करते हैं। कई स्थानों पर भगवान हयग्रीव की विशेष पूजा, मंत्र-जप और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। दक्षिण भारत में भगवान हयग्रीव की उपासना की विशिष्ट परंपरा देखने को मिलती है। वहां उन्हें विशेष रूप से विद्या और शिक्षा के देवता के रूप में श्रद्धापूर्वक पूजा जाता है।
भगवान हयग्रीव की आराधना का महत्व आज के समय में और भी बढ़ जाता है। आधुनिक युग सूचना और तकनीक का युग है। आज मनुष्य के पास ज्ञान के साधन पहले की तुलना में कहीं अधिक हैं, लेकिन सूचनाओं की अधिकता अपने आप में ज्ञान नहीं है। सही और गलत में अंतर करने की क्षमता, प्राप्त जानकारी का विवेकपूर्ण उपयोग और समाजहित में उसका प्रयोग ही वास्तविक ज्ञान है। भगवान हयग्रीव का संदेश इसी विवेकपूर्ण ज्ञान की ओर प्रेरित करता है।आज शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। शिक्षा व्यक्ति के चरित्र, विचार और व्यवहार को भी बेहतर बनाए, तभी उसका वास्तविक उद्देश्य पूरा होता है। ज्ञान के साथ विनम्रता, बुद्धि के साथ विवेक और सफलता के साथ जिम्मेदारी का भाव आवश्यक है। हयग्रीव जयंती हमें इसी संतुलित जीवन-दृष्टि की प्रेरणा देती है।
यह पर्व यह भी स्मरण कराता है कि किसी भी सभ्यता की वास्तविक शक्ति उसके ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत में होती है। जिस समाज ने अपने ज्ञान, साहित्य, विज्ञान, दर्शन और परंपराओं को सुरक्षित रखा, वही दीर्घकाल तक अपनी पहचान बनाए रखने में सफल रहा। इसलिए आज आवश्यकता है कि हम आधुनिक शिक्षा और तकनीकी विकास के साथ अपनी प्राचीन ज्ञान-परंपरा को भी समझें और नई पीढ़ी तक पहुंचाएं।
भगवान हयग्रीव की कथा हमें यह संदेश देती है कि अज्ञान का अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, ज्ञान का प्रकाश उसे दूर करने में सक्षम है। वेदों की रक्षा का उनका स्वरूप सत्य, धर्म और ज्ञान की रक्षा के संकल्प का प्रतीक है। उनकी उपासना केवल व्यक्तिगत सफलता की कामना तक सीमित न रहकर समाज में शिक्षा, संस्कार और विवेक के विस्तार का माध्यम बने, यही इस पर्व की सार्थकता है।
हयग्रीव जयंती पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि ज्ञान को केवल अपने तक सीमित नहीं रखेंगे, बल्कि उसे समाज के हित में उपयोग करेंगे। बच्चों और युवाओं में शिक्षा के प्रति रुचि जगाना, भारतीय ज्ञान परंपरा से उन्हें परिचित कराना और सत्य तथा विवेक के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना ही भगवान हयग्रीव के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।भगवान हयग्रीव से प्रार्थना है कि वे समस्त मानव समाज को ज्ञान, विवेक, सद्बुद्धि और सत्य के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें। उनके आशीर्वाद से अज्ञान का अंधकार दूर हो और ज्ञान का प्रकाश प्रत्येक जीवन को आलोकित करे।
वरुण कुमार,
लेखक एवं कवि के सौजन्य से

