12 अगस्त, जन्मदिवस विशेष
जमशेदपुर।भारत के वैज्ञानिक इतिहास में डॉ. विक्रम साराभाई का नाम उन महान विभूतियों में लिया जाता है, जिन्होंने विज्ञान को राष्ट्र निर्माण और समाज कल्याण से जोड़ने का अद्भुत कार्य किया। स्वतंत्रता के बाद जब भारत गरीबी, अशिक्षा, औद्योगिक पिछड़ेपन और सीमित तकनीकी संसाधनों जैसी चुनौतियों से जूझ रहा था, तब साराभाई ने वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता का सपना देखा। उनका विश्वास था कि विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए। यही दृष्टि आगे चलकर भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की आधारशिला बनी।
डॉ. विक्रम अंबालाल साराभाई का जन्म 12 अगस्त 1919 को अहमदाबाद में हुआ था। उनके पिता अंबालाल साराभाई प्रसिद्ध उद्योगपति और माता सरला देवी सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ी थीं। परिवार का वातावरण शिक्षा, कला, विज्ञान और राष्ट्रीय चेतना से समृद्ध था। बचपन से ही साराभाई की रुचि गणित और विज्ञान में थी। उच्च शिक्षा के लिए वे इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गए और प्राकृतिक विज्ञान का अध्ययन किया।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत लौटने पर उन्होंने बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान में महान वैज्ञानिक सर सी. वी. रमन के मार्गदर्शन में कॉस्मिक किरणों पर शोध किया। युद्ध के बाद वे कैम्ब्रिज लौटे और 1947 में कॉस्मिक किरणों पर शोध के लिए पीएचडी प्राप्त की। उनका वैज्ञानिक जीवन अनुसंधान के साथ-साथ संस्थान निर्माण की दिशा में भी आगे बढ़ा।
स्वतंत्र भारत को वैज्ञानिक अनुसंधान की मजबूत संस्थागत व्यवस्था देने के उद्देश्य से साराभाई ने अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह संस्था आगे चलकर अंतरिक्ष विज्ञान और वायुमंडलीय अनुसंधान का प्रमुख केंद्र बनी।
साराभाई की सबसे बड़ी विशेषता उनकी दूरदर्शिता थी। उन्होंने अंतरिक्ष तकनीक को केवल राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का माध्यम नहीं माना, बल्कि इसे शिक्षा, संचार, मौसम पूर्वानुमान, प्राकृतिक संसाधनों के अध्ययन और ग्रामीण विकास का साधन माना। उनका विचार था कि विशाल भौगोलिक और सामाजिक विविधता वाले भारत में उपग्रह तकनीक दूरदराज के क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ सकती है।
1962 में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति के गठन के बाद साराभाई उसके अध्यक्ष बने। उनके नेतृत्व में केरल के थुम्बा में भूमध्यरेखीय रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र की स्थापना हुई। 21 नवंबर 1963 को थुम्बा से पहला साउंडिंग रॉकेट प्रक्षेपित किया गया। सीमित संसाधनों के बावजूद यह उपलब्धि भारतीय अंतरिक्ष यात्रा की ऐतिहासिक शुरुआत बनी।
1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की स्थापना हुई और साराभाई उसके प्रथम अध्यक्ष बने। उन्होंने अंतरिक्ष कार्यक्रम को स्पष्ट सामाजिक उद्देश्य दिया। उनका मानना था कि भारत को अंतरिक्ष विज्ञान में आगे बढ़ते हुए संचार, शिक्षा और विकास की आवश्यकताओं को प्राथमिकता देनी चाहिए। उनकी इसी सोच ने आगे चलकर उपग्रह संचार, दूरदर्शन प्रसारण, मौसम विज्ञान और दूरसंचार के विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया।
साराभाई केवल अंतरिक्ष वैज्ञानिक नहीं, बल्कि महान संस्थान-निर्माता भी थे। अहमदाबाद टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज रिसर्च एसोसिएशन, भारतीय प्रबंधन संस्थान अहमदाबाद और कम्युनिटी साइंस सेंटर जैसी संस्थाओं के विकास में उनका योगदान रहा। वे युवाओं की प्रतिभा पर गहरा विश्वास करते थे और वैज्ञानिक सोच को समाज में फैलाने के पक्षधर थे।
उनका जीवन विज्ञान और कला के सुंदर संगम का भी उदाहरण था। उनका विवाह प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई से हुआ। साराभाई ने अनेक प्रतिभाशाली युवा वैज्ञानिकों को अवसर दिया। डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम सहित कई वैज्ञानिकों के कार्यजीवन पर उनके नेतृत्व और दृष्टि का प्रभाव पड़ा।
उन्हें 1966 में पद्म भूषण और मरणोपरांत 1972 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। 30 दिसंबर 1971 को केरल के कोवलम में उनका निधन हुआ। उनका जीवन भले ही अपेक्षाकृत छोटा रहा, लेकिन उनकी वैज्ञानिक दृष्टि और संस्थागत विरासत ने भारत की कई पीढ़ियों को प्रभावित किया।
आज भारत चंद्रमा, मंगल और अंतरिक्ष अनुसंधान के अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल कर रहा है। इस यात्रा की प्रारंभिक नींव रखने वालों में डॉ. विक्रम साराभाई का स्थान सर्वोपरि है। उन्होंने भारतीय वैज्ञानिकों में आत्मविश्वास जगाया और यह विश्वास दिया कि सीमित संसाधनों वाला भारत भी विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में विश्वस्तरीय उपलब्धियां हासिल कर सकता है।
12 अगस्त को उनके जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करना केवल एक महान वैज्ञानिक को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस वैज्ञानिक दृष्टिकोण को सम्मान देना है, जिसने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. विक्रम साराभाई भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के शिल्पकार होने के साथ-साथ वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता, संस्थान निर्माण और राष्ट्रहित में विज्ञान के उपयोग के प्रेरणास्रोत हैं। उनकी विरासत आज भी युवाओं को बड़े सपने देखने और अपनी प्रतिभा को राष्ट्र निर्माण में लगाने की प्रेरणा देती है।
वरुण कुमार,
लेखक एवं कवि के सौजन्य से

