जमशेदपुर।भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल युद्धों, संधियों और राजनीतिक आंदोलनों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह उन महान आत्माओं के त्याग, तपस्या और वैचारिक क्रांति की गाथा भी है जिन्होंने अपने लहू और कलम से स्वाधीनता की इबारत लिखी। बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में जब भारत पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था और औपनिवेशिक सत्ता का दमन चक्र अपने चरम पर था, तब देश के क्षितिज पर कुछ ऐसे देदीप्यमान नक्षत्रों का उदय हुआ जिन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभा से संपूर्ण राष्ट्र को आलोकित किया। ऐसे ही एक विलक्षण, अद्वितीय और कालजयी व्यक्तित्व का नाम था—देशबंधु गुप्त।वर्ष 1900 में जन्में देशबंधु गुप्त का जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि कैसे एक व्यक्ति अपनी अटूट राष्ट्रभक्ति, निर्भीक पत्रकारिता और निस्वार्थ जनसेवा के बल पर इतिहास की धारा को मोड़ सकता है। वे केवल एक स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं थे, बल्कि वे एक दूरद्रष्टा पत्रकार, कुशल संगठनकर्ता, समाज सुधारक और स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के प्रमुख शिल्पकारों में से एक थे। आज उनकी जन्म जयंती के इस पावन अवसर पर, जब हम एक स्वतंत्र और संप्रभु भारत में सांस ले रहे हैं, उनके योगदान का पुनर्मूल्यांकन करना न केवल प्रासंगिक है, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक भी है।
देशबंधु गुप्त का जन्म तत्कालीन पंजाब प्रांत के पानीपत क्षेत्र (जो वर्तमान में हरियाणा राज्य का हिस्सा है) में हुआ था। यह वह दौर था जब भारत में ब्रिटिश विरोधी भावनाएं धीरे-धीरे पनप रही थीं और सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों ने बुद्धिजीवियों को झकझोरना शुरू कर दिया था। पानीपत की ऐतिहासिक भूमि, जिसने भारत के भाग्य का फैसला करने वाले कई युद्ध देखे थे, ने इस बालक के भीतर एक अदम्य साहस और जुझारूपन का संचार किया।उनके परिवार का परिवेश धार्मिक, सामाजिक रूप से जागरूक और राष्ट्रभक्त था। यही कारण था कि बचपन से ही लाला देशबंधु गुप्त के मानस पटल पर देशभक्ति, सामाजिक न्याय, समानता और जनसेवा के गहरे संस्कार अंकित हो गए। शिक्षा के प्रति उनका दृष्टिकोण केवल साक्षर होना नहीं था, बल्कि वे शिक्षा को चेतना जागृति का माध्यम मानते थे। जैसे-जैसे वे बड़े हुए, देश की पराधीनता और देशवासियों पर हो रहे अत्याचारों ने उनके संवेदनशील मन को गहरे तक उद्वेलित किया।जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के पटल पर अवतरित हुए और उन्होंने सत्य, अहिंसा तथा असहयोग का मंत्र फूंकना शुरू किया, तब युवा देशबंधु गुप्त उनके विचारों से गहराई से प्रभावित हुए। गांधी जी के एक आह्वान पर उन्होंने अपने उज्ज्वल भविष्य की सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया और स्वयं को पूरी तरह से भारत माता की मुक्ति के महायज्ञ में समिधा के रूप में अर्पित कर दिया।देशबंधु गुप्त का स्वतंत्रता आंदोलन में प्रवेश एक साधारण कार्यकर्ता के रूप में हुआ था, लेकिन अपनी अद्भुत संगठन क्षमता और अडिग संकल्प के कारण वे शीघ्र ही राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की अग्रिम पंक्ति में शामिल हो गए। उन्होंने २०वीं सदी के पूर्वार्ध में कांग्रेस द्वारा संचालित हर छोटे-बड़े आंदोलन में सक्रिय और नेतृत्वकारी भूमिका निभाई।गांधी जी द्वारा शुरू किए गए असहयोग आंदोलन में युवाओं को जोड़ने में देशबंधु गुप्त ने रात-दिन एक कर दिया। उन्होंने विदेशी कपड़ों की होली जलाने, सरकारी उपाधियों का त्याग करने और ब्रिटिश शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार करने के अभियान में पंजाब और दिल्ली के क्षेत्रों में अभूतपूर्व नेतृत्व प्रदान किया। इस आंदोलन के दौरान उन्हें पहली बार ब्रिटिश दमन का सामना करना पड़ा और जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा, लेकिन जेल की कालकोठरी भी उनके हौसलों को पस्त नहीं कर सकी।जब गांधी जी ने दांडी यात्रा के माध्यम से नमक कानून तोड़ा, तब देशबंधु गुप्त ने दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में इस आंदोलन की कमान संभाली। उन्होंने जन-जन को यह समझाया कि नमक पर टैक्स लगाना किस प्रकार ब्रिटिश हुकूमत की क्रूरता का प्रतीक है। उनके ओजस्वी भाषणों से प्रेरित होकर हजारों की संख्या में महिलाएं और युवा सड़कों पर उतर आए। ब्रिटिश पुलिस की लाठियां और कठोर कारावास भी उनके संकल्प को डिगा नहीं पाए।1942 का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अंतिम और सबसे भीषण संघर्ष था। ‘करो या मरो’ के नारे के साथ जब देश का बच्चा-बच्चा उठ खड़ा हुआ, तब देशबंधु गुप्त ने भूमिगत रहकर और सार्वजनिक रूप से आंदोलन को दिशा देने का काम किया। इस आंदोलन के दौरान उन्हें लंबे समय तक कठोर कारावास में रखा गया। जेल में खराब स्वास्थ्य और यातनाओं के बावजूद वे देश की आजादी के सपने को बुनते रहे। उनका पूरा जीवन एक जेल से दूसरी जेल की यात्राओं और संघर्षों के बीच बीता, लेकिन उनका मस्तक हमेशा ऊंचा रहा।
*निर्भीक पत्रकारिता: कलम को बनाया राष्ट्रसेवा का अस्त्र*
देशबंधु गुप्त का सबसे ऐतिहासिक, युगांतरकारी और चिरस्थायी योगदान पत्रकारिता के क्षेत्र में रहा। वे उस स्वर्ण युग के पत्रकार थे जब पत्रकारिता कोई व्यवसाय, उद्योग या टीआरपी बटोरने का साधन नहीं थी, बल्कि वह राष्ट्र निर्माण, जन-जागरण और औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ संघर्ष का एक पवित्र माध्यम थी। उनका स्पष्ट मानना था कि:
”एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता ही किसी भी जीवंत समाज और लोकतंत्र की वास्तविक आधारशिला होती है। यदि कलम सत्ता के दबाव में झुक जाए, तो समाज का पतन निश्चित है।”’तेज’ और ‘प्रताप’ के माध्यम से वैचारिक क्रांति है।देशबंधु गुप्त भारत के दो अत्यंत प्रतिष्ठित और प्रभावशाली समाचार पत्रों—’तेज’ और ‘प्रताप’ से गहराई से जुड़े रहे। ये समाचार पत्र केवल सूचनाएं देने के माध्यम नहीं थे, बल्कि ये ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ वैचारिक बारूद के डिब्बे थे। लाला जी के संपादन और दिशा-निर्देशन में इन अखबारों ने राष्ट्रीय चेतना को धार देने का काम किया।उनके लेखों की भाषा अत्यंत सरल, मर्मस्पर्शी लेकिन साथ ही तीखी और तार्किक होती थी। वे एक ओर जहां ब्रिटिश सरकार की आर्थिक शोषण की नीतियों, दमनकारी कानूनों और जलियांवाला बाग जैसे जघन्य कांडों की कड़े शब्दों में निंदा करते थे, वहीं दूसरी ओर वे आम जनता के भीतर छिपे स्वाभिमान को जगाने का प्रयास करते थे।ब्रिटिश सेंसरशिप और दमन के खिलाफ संघर्ष है।अंग्रेज सरकार देशबंधु गुप्त की लेखनी की मारक क्षमता से भली-भांति परिचित थी और उनसे अत्यधिक भयभीत रहती थी। उनकी निर्भीक रिपोर्टिंग के कारण ब्रिटिश सरकार ने कई बार ‘तेज’ और ‘प्रताप’ अखबारों पर भारी जुर्माना लगाया, उनकी प्रेस की संपत्तियों को कुर्क करने की धमकियां दीं और अंततः कई बार अखबार के प्रकाशन पर पूर्ण प्रतिबंध तक लगा दिया। उन पर राजद्रोह के मुकदमे चलाए गए।परंतु, देशबंधु गुप्त एक ऐसे पत्रकार थे जिन्होंने कभी भी औपनिवेशिक सत्ता के सामने घुटने नहीं टेके। जब भी उनके अखबार पर प्रतिबंध लगाया जाता, वे नए जोश के साथ वैकल्पिक माध्यमों से जनता तक अपनी बात पहुंचाते। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि सत्य को दबाया जा सकता है, लेकिन उसे पराजित नहीं किया जा सकता। उनकी लेखनी ने स्वदेशी आंदोलन को लोकप्रिय बनाने और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार को एक जन-आंदोलन का रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सामाजिक समरसता, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय एकता के मसीहा
देशबंधु गुप्त केवल एक राजनीतिक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, बल्कि वे समाज के भीतर फैली कुरीतियों को दूर करने वाले एक महान समाज सुधारक भी थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि जब तक भारत आंतरिक रूप से मजबूत, एकजुट और सामाजिक बुराइयों से मुक्त नहीं होगा, तब तक राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं होगा।
*स्वतंत्रता के बाद का जीवन: नए भारत और लोकतंत्र के शिल्पकार*
15 अगस्त 1947 को जब भारत को आजादी मिली, तो देशबंधु गुप्त के सामने एक नए भारत के निर्माण की विशाल चुनौती थी। वे उन गिने-चुने नेताओं में से थे जिन्होंने स्वाधीनता के बाद सत्ता सुख भोगने के बजाय राष्ट्र के नव-निर्माण को प्राथमिकता दी।
संविधान सभा और संसद में भूमिका
देशबंधु गुप्त भारत की संविधान सभा के एक सक्रिय और सम्मानित सदस्य रहे। उन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण में, विशेष रूप से प्रेस की स्वतंत्रता, मौलिक अधिकारों और नागरिक सुविधाओं से जुड़े मुद्दों पर अत्यंत महत्वपूर्ण सुझाव दिए। उनका मानना था कि स्वतंत्र भारत का संविधान ऐसा होना चाहिए जो समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी न्याय और गरिमा प्रदान कर सके।
बाद में, वे स्वतंत्र भारत की संसद के सदस्य (सांसद) बने। संसद के भीतर उन्होंने एक कुशल नीति-निर्माता और जननेता के रूप में अपनी अमिट छाप छोड़ी। वे सत्ता पक्ष में होते हुए भी रचनात्मक आलोचना से पीछे नहीं हटते थे। जनहित से जुड़े मुद्दों, किसानों की समस्याओं और शिक्षा के विस्तार के लिए वे संसद में सदैव मुखर रहे।
दिल्ली के आधुनिक स्वरूप के सूत्रधार
देशबंधु गुप्त का दिल्ली से गहरा लगाव था। दिल्ली के विकास, वहां की नागरिक सुविधाओं के विस्तार, विस्थापितों के पुनर्वास और दिल्ली को एक आधुनिक, लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में स्थापित करने में उनका योगदान अतुलनीय है। उन्होंने दिल्ली के प्रशासनिक ढांचे को सुधारने और यहां के नागरिकों को उनके लोकतांत्रिक अधिकार दिलाने के लिए अथक प्रयास किए। यही कारण है कि आज भी दिल्ली के इतिहास में उनका नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज है।व्यक्तित्व के अनुकरणीय मूल्य: सादगी, ईमानदारी और नैतिकता है।हम देशबंधु गुप्त के व्यक्तिगत जीवन का अध्ययन करें, तो हमें एक ऐसा चरित्र दिखाई देता है जो सादगी, विनम्रता, अनुशासन और उच्च नैतिक मूल्यों से ओत-प्रोत था। वे महात्मा गांधी के ‘ट्रस्टीशिप’ के सिद्धांत में विश्वास रखते थे, जिसके अनुसार सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्ति को समाज की संपत्ति का केवल एक ट्रस्टी होना चाहिए, मालिक नहीं।उन्होंने अपने पूरे सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और वित्तीय शुचिता का पालन किया। भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद से वे कोसों दूर थे।
इतने बड़े पद और प्रतिष्ठा पर होने के बावजूद, कोई भी साधारण नागरिक उनसे सीधे मिल सकता था। वे हमेशा जनता के बीच रहकर काम करना पसंद करते थे।एक संपादक के रूप में उन्होंने कभी भी सनसनीखेज पत्रकारिता या पीत पत्रकारिता को प्रश्रय नहीं दिया। उनके लिए समाचार की सत्यता और उसका राष्ट्रहित में होना ही सबसे बड़ी कसौटी थी।आज 21वीं सदी के तीसरे दशक में, जब हम देशबंधु गुप्त की जन्म जयंती मना रहे हैं, हमें यह आत्मविश्लेषण करने की आवश्यकता है कि उनके विचार आज के समय में कितने प्रासंगिक हैं।
आधुनिक मीडिया के लिए एक लाइटहाउस (प्रकाश स्तंभ) है।वर्तमान समय में जब सूचना तकनीक का अभूतपूर्व विकास हुआ है, मीडिया का दायरा बढ़ा है, वहीं दूसरी ओर मीडिया की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि:
”पत्रकार का पहला और अंतिम दायित्व केवल और केवल सत्य, न्याय, निष्पक्षता और राष्ट्रहित के प्रति होना चाहिए। पत्रकारिता कोई कॉरपोरेट व्यवसाय नहीं, बल्कि समाज का आईना है।”आज का युवा जो तकनीकी रूप से अत्यंत सक्षम है, उसे देशबंधु गुप्त के साहस, वैचारिक दृढ़ता और राष्ट्र के प्रति समर्पण से सीख लेनी चाहिए। लाला जी ने यह सिद्ध करके दिखाया कि एक व्यक्ति यदि ठान ले, तो अपनी लेखनी, अपने विचारों और अपने निस्वार्थ कर्मों के बल पर पूरे समाज में एक युगांतरकारी परिवर्तन ला सकता है। युवाओं को उनके जीवन से यह सीखना होगा कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकारी पदों या राजनीति से नहीं होता, बल्कि यह समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाने से होता है।
*अमूल्य विरासत और कृतज्ञ राष्ट्र का नमन*
देशबंधु गुप्त एक ऐसे युगपुरुष थे जिन्होंने भारत के अतीत के गौरव को समझा, वर्तमान के संघर्षों को जिया और भविष्य के एक सशक्त, समृद्ध और लोकतांत्रिक भारत का सपना देखा। उन्होंने अपना तन, मन, धन और अपनी मेधा पूरी तरह से राष्ट्र के चरणों में समर्पित कर दी।उनकी जन्म जयंती के इस गौरवशाली अवसर पर संपूर्ण देश उनके प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता व्यक्त करता है। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में, राष्ट्रवादी पत्रकारिता के आकाश में और लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना के महायज्ञ में एक ऐसे ध्रुवतारे की तरह चमकते रहेंगे जो हमेशा आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति, सत्यनिष्ठा, निर्भीकता और निस्वार्थ जनसेवा के मार्ग पर चलने की निरंतर प्रेरणा देता रहेगा।आइए, हम सब मिलकर इस महान राष्ट्रनायक के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें और एक ऐसे भारत का निर्माण करें जिसका सपना देशबंधु गुप्त ने देखा था—एक ऐसा भारत जो समृद्ध हो, शिक्षित हो, जहां न्याय का राज हो और जहां हर नागरिक का मस्तक स्वाभिमान से ऊंचा हो।
शताब्दी पुरुष देशबंधु गुप्त को कोटि-कोटि नमन!
- लेखक एवं कवि वरुण कुमार के सौजन्य से

