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Fri. May 29th, 2026

सरयू राय की पहल से बदली तस्वीर, 50 दिनों में रेलवे को झुकना पड़ा

जमशेदपुर।जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय एक बार फिर अपने अलग अंदाज और आक्रामक जनसंघर्ष को लेकर चर्चा में हैं। इस बार मुद्दा था टाटानगर से गुजरने वाली ट्रेनों की लगातार लेटलतीफी और यात्री ट्रेनों की तुलना में मालगाड़ियों को दी जा रही प्राथमिकता। लंबे समय से यात्रियों की परेशानी बनी इस समस्या को जिस तेजी से उन्होंने आंदोलन का रूप दिया, उसने रेलवे प्रशासन को महज 50 दिनों के भीतर समाधान की दिशा में कदम उठाने को मजबूर कर दिया।

27 मई को दक्षिण पूर्व रेलवे जोन के महाप्रबंधक अनिल कुमार जैन के साथ हुई बैठक में सरयू राय ने बेहद स्पष्ट और तीखे अंदाज में यात्रियों की समस्याएं उठाईं। उन्होंने यह सवाल प्रमुखता से रखा कि आखिर क्यों यात्री ट्रेनों को विभिन्न स्टेशनों पर रोककर मालगाड़ियों को लगातार आगे बढ़ाया जाता है। बैठक में जीएम ने तत्काल निर्देश जारी करते हुए कहा कि अब यात्री ट्रेनों को प्राथमिकता दी जाएगी और मालगाड़ियां उनके बाद ही रवाना होंगी। यह निर्णय रेलवे यात्रियों के लिए बड़ी राहत माना गया।

बैठक के दौरान रेल यात्री संघर्ष समिति के संयोजक शिव शंकर सिंह ने यह सवाल भी उठाया कि आम लोगों को कैसे पता चलेगा कि रेलवे वास्तव में इस व्यवस्था का पालन कर रहा है। इसके बाद महाप्रबंधक ने एक और महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए ऐसे अधिकारी की नियुक्ति का निर्देश दिया, जो ट्रेनों की लेटलतीफी की निगरानी करेगा और यह भी सुनिश्चित करेगा कि यात्री ट्रेनों की कीमत पर मालगाड़ियों को वरीयता न मिले। साथ ही यह अधिकारी प्रतिदिन समिति और मीडिया के साथ जानकारी साझा करेगा।

इस आंदोलन की शुरुआत 7 अप्रैल 2026 को टाटानगर रेलवे स्टेशन परिसर में आयोजित धरने से हुई थी। उस दिन से ही सरयू राय ने साफ संकेत दे दिया था कि यह आंदोलन लंबा और व्यापक होने वाला है। उन्होंने उसी दिन रेल यात्री संघर्ष समिति के गठन की घोषणा की और शिव शंकर सिंह को उसका संयोजक बनाया गया। इसके बाद आंदोलन लगातार संगठित रूप लेता गया। साकची, बर्मामाइंस और मानगो में हस्ताक्षर अभियान चलाया गया और फिर आंदोलन जमशेदपुर से निकलकर घाटशिला तक पहुंच गया। घाटशिला में लोगों की भारी भागीदारी ने इस आंदोलन को और अधिक धार दी।

आंदोलन के दौरान यात्रियों में गहरी नाराजगी साफ दिखाई दी। लोगों का कहना था कि वर्षों से वे ट्रेनों की देरी से परेशान हैं लेकिन उनकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं था। सरयू राय के नेतृत्व में जब यह मुद्दा मजबूती से उठा तो आम यात्रियों का भरोसा भी आंदोलन से जुड़ता चला गया। आंदोलन के दौरान कई सभाओं में यह चेतावनी भी दी गई कि यदि रेलवे प्रशासन ने समाधान नहीं निकाला तो रेल पटरियों पर उतरने तक का निर्णय लिया जा सकता है।

7 अप्रैल का पहला धरना भी काफी चर्चा में रहा। रेलवे प्रशासन ने पहले से तय स्थल पर आंदोलन की अनुमति नहीं दी थी और वहां आरपीएफ के जवानों की तैनाती कर दी गई थी। बाद में पार्किंग क्षेत्र के पास धरना आयोजित हुआ। तेज धूप और गर्मी के बावजूद 76 वर्षीय सरयू राय लगातार तीन घंटे तक वहीं बैठे रहे। उनके साथ कई आंदोलनकारी भी डटे रहे। उस दिन मौजूद लोगों के बीच यह चर्चा थी कि इतनी उम्र में भी जिस दृढ़ता के साथ वह संघर्ष कर रहे हैं, वह सामान्य बात नहीं है। यहां तक कि कुछ रेलवे कर्मचारियों ने भी निजी तौर पर आंदोलन के प्रति सहानुभूति जताई।

लगातार बढ़ते जनदबाव और आंदोलन की व्यापकता के बाद रेलवे प्रशासन को अंततः समाधान की दिशा में कदम बढ़ाने पड़े। अब दक्षिण पूर्व रेलवे के चक्रधरपुर मंडल के कमर्शियल इंस्पेक्टर अबीर मिश्रा को टाटानगर में पूर्णकालिक पीआरआई यानी पब्लिक रिलेशन इंस्पेक्टर नियुक्त किया गया है। उनकी जिम्मेदारी ट्रेनों की लेटलतीफी की निगरानी करना और यात्रियों को नियमित जानकारी उपलब्ध कराना होगी। खास बात यह रही कि महाप्रबंधक के निर्देश के महज 48 घंटे के भीतर यह नियुक्ति कर दी गई।

हालांकि रेल यात्री संघर्ष समिति अभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। समिति का कहना है कि फिलहाल यह परीक्षण का दौर है और आने वाले दिनों में देखा जाएगा कि रेलवे अपने वादों को जमीन पर कितनी गंभीरता से लागू करता है। सरयू राय ने भी स्पष्ट किया है that आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है। यदि सुधार स्थायी रूप से नहीं दिखा तो आगे दिल्ली तक आंदोलन ले जाने का विकल्प खुला रहेगा।

करीब डेढ़ महीने तक चले इस आंदोलन ने यह साबित किया कि संगठित जनदबाव और लगातार संघर्ष से वर्षों पुरानी समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है। टाटानगर के रेल यात्रियों के लिए यह सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि लंबे इंतजार के बाद मिली राहत के रूप में देखा जा रहा है।

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