जमशेदपुर। देश में तेजी से बढ़ रहे बैटरी कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन और मूल्यवान धातुओं की पुनर्प्राप्ति की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए सीएसआईआर-राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला (एनएमएल), जमशेदपुर और नई दिल्ली स्थित आरटूई ग्रीनटेक प्राइवेट लिमिटेड के बीच पुरानी एवं उपयोग समाप्त लिथियम-आयन बैटरियों के पुनर्चक्रण के लिए विकसित स्वदेशी तकनीक के हस्तांतरण और व्यावसायीकरण को लेकर समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। यह समझौता 18 जून 2026 को संपन्न हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल भारत में बैटरी कचरा प्रबंधन, संसाधन संरक्षण और सर्कुलर अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है।
कार्यक्रम में सीएसआईआर-एनएमएल के निदेशक डॉ. संदीप घोष चौधुरी की उपस्थिति में समझौते को औपचारिक रूप दिया गया। इस अवसर पर मुख्य वैज्ञानिक एवं परियोजना प्रमुख डॉ. मनीष कुमार झा, धातु निष्कर्षण एवं पुनर्चक्रण प्रभाग के प्रमुख डॉ. संजय कुमार, नियंत्रक प्रशासन जय शंकर शरण, अनुसंधान योजना एवं व्यवसाय विकास प्रमुख डॉ. एस.के. पाल, डॉ. अंकुर शर्मा, डॉ. वीणा कुमारी, डॉ. अंजनी कुमार साहू सहित कई वरिष्ठ वैज्ञानिक और अधिकारी मौजूद रहे। आरटूई ग्रीनटेक की ओर से कंपनी के निदेशक अखिलेश नंदकिशोर दुबे और हरीश कुमार पांडेय ने भाग लिया।
सीएसआईआर-एनएमएल द्वारा विकसित तकनीक का उद्देश्य उपयोग समाप्त लिथियम-आयन बैटरियों से लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, मैंगनीज, तांबा, एल्युमिनियम और ग्रेफाइट जैसे महत्वपूर्ण पदार्थों को पुनः प्राप्त करना है। ये पदार्थ विद्युत वाहन, ऊर्जा भंडारण प्रणाली, मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के निर्माण में व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं। भारत में लिथियम और कोबाल्ट जैसी रणनीतिक धातुओं के सीमित भंडार होने के कारण इनकी बड़ी मात्रा विदेशों से आयात करनी पड़ती है। ऐसे में पुरानी बैटरियों का पुनर्चक्रण देश के लिए एक वैकल्पिक संसाधन स्रोत बन सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले वर्षों में भारत में लिथियम-आयन बैटरियों का उपयोग कई गुना बढ़ने वाला है। विद्युत वाहनों, सौर ऊर्जा आधारित भंडारण प्रणालियों और डिजिटल उपकरणों की बढ़ती मांग के कारण बड़ी संख्या में बैटरियां उपयोग की अवधि पूरी करने के बाद कचरे में बदलेंगी। अनुमान है कि वर्ष 2035 तक भारत में लगभग 20 लाख टन लिथियम-आयन बैटरी कचरा उत्पन्न हो सकता है। यदि इसका वैज्ञानिक तरीके से निपटान नहीं किया गया तो पर्यावरण प्रदूषण, आग लगने की घटनाएं और स्वास्थ्य संबंधी गंभीर जोखिम पैदा हो सकते हैं।
डॉ. संदीप घोष चौधुरी ने कहा कि अनुसंधान संस्थानों में विकसित तकनीकों को उद्योगों तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है। इससे प्रयोगशाला में विकसित वैज्ञानिक उपलब्धियां समाज और उद्योग के लिए उपयोगी बनती हैं। उन्होंने कहा कि यह साझेदारी आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को भी मजबूती देगी तथा महत्वपूर्ण खनिजों की आयात निर्भरता कम करने में मददगार साबित होगी।
आरटूई ग्रीनटेक के निदेशक अखिलेश नंदकिशोर दुबे और हरीश कुमार पांडेय ने विश्वास जताया कि सीएसआईआर-एनएमएल की तकनीक को औद्योगिक स्तर पर लागू कर सुरक्षित, पर्यावरण अनुकूल और आर्थिक रूप से व्यवहार्य बैटरी पुनर्चक्रण व्यवस्था विकसित की जा सकेगी। उन्होंने कहा कि इससे न केवल संसाधनों का संरक्षण होगा, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता केवल तकनीक हस्तांतरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश में बैटरी कचरा प्रबंधन के औपचारिक और वैज्ञानिक ढांचे को मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। इससे शोध संस्थानों और उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ेगा, स्वच्छ तकनीकों को बढ़ावा मिलेगा और सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। कुल मिलाकर यह पहल दर्शाती है कि उपयोग समाप्त लिथियम-आयन बैटरियां केवल कचरा नहीं, बल्कि भविष्य के लिए मूल्यवान द्वितीयक संसाधन हैं, जिनका वैज्ञानिक पुनर्चक्रण देश की आर्थिक और पर्यावरणीय सुरक्षा दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

