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आदिवासी संस्कृति में प्रकृति ही असली धन, पर्यावरण संरक्षण का दिया संदेश*

चक्रधरपुर: विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आदिवासी युवा मित्र मण्डल, चक्रधरपुर के सचिव रबिन्द्र गिलुवा ने पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी संस्कृति में प्रकृति के महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज में प्रकृति को सबसे बड़ी संपत्ति और जीवन का आधार माना जाता है।

रबिन्द्र गिलुवा ने कहा कि आधुनिक समाज जहां सोना, चांदी और हीरे को धन का प्रतीक मानता है, वहीं आदिवासी संस्कृति में पेड़-पौधे, जंगल, नदी और जमीन को वास्तविक संपदा माना जाता है। उनके अनुसार पेड़ केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और भविष्य की सुरक्षा के प्रतीक हैं।

उन्होंने कहा कि आदिवासियत का मूल दर्शन प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीवन जीना है। आदिवासी समुदाय सदियों से जंगल, जल और जमीन के संरक्षण को अपनी जीवनशैली का हिस्सा मानता आया है। वर्तमान समय में बढ़ते जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरणीय संकट के बीच आदिवासी जीवन पद्धति दुनिया के लिए प्रेरणा बन सकती है।

उन्होंने कहा कि इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस की थीम “Inspired by Nature. For Climate. For Our Future” (प्रकृति से प्रेरित, जलवायु के लिए, हमारे भविष्य के लिए) आदिवासी जीवन दर्शन के काफी करीब है। यह संदेश प्रकृति से सीख लेकर पर्यावरण संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए कार्य करने की प्रेरणा देता है।

रबिन्द्र गिलुवा ने कहा कि जंगल, नदियां और पहाड़ केवल प्राकृतिक धरोहर नहीं, बल्कि मानव जीवन के अस्तित्व का आधार हैं। यदि पर्यावरण सुरक्षित रहेगा तो ही भविष्य सुरक्षित रहेगा। उन्होंने लोगों से अधिक से अधिक पौधारोपण करने, जल स्रोतों की रक्षा करने और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने की अपील की।

उन्होंने कहा कि विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास नहीं होना चाहिए जिससे प्रकृति को नुकसान पहुंचे। पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन बनाकर ही धरती को सुरक्षित रखा जा सकता है। उन्होंने लोगों से पेड़ लगाने और उनके संरक्षण का संकल्प लेने का आह्वान किया।

रबिन्द्र गिलुवा ने कहा कि प्रकृति है तो जीवन है और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरियाली छोड़ना ही सबसे बड़ी विरासत है।

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