जमशेदपुर। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने झारखंड की दो महत्वपूर्ण प्राकृतिक भूगर्भीय संरचनाओं को संरक्षित करने की दिशा में पहल करते हुए राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखा है। अपने पत्र में उन्होंने पूर्वी सिंहभूम के दलमा क्षेत्र और हजारीबाग जिले के मांडू प्रखंड स्थित दूधी नाला क्षेत्र को जियोलॉजिकल हैरिटेज (भूगर्भीय धरोहर) घोषित करने का आग्रह किया है।
सरयू राय ने कहा है कि ये दोनों स्थल केवल झारखंड ही नहीं, बल्कि देश की दुर्लभ भूगर्भीय संपदाओं में शामिल हैं। उन्होंने बताया कि दलमा क्षेत्र लगभग 160 करोड़ वर्ष पुराने महासागरीय ज्वालामुखीय गतिविधियों का जीवंत प्रमाण है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार यह क्षेत्र छोटानागपुर और सिंहभूम टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव से निर्मित हुआ था। इसी भूगर्भीय प्रक्रिया ने तांबा, यूरेनियम और सोना जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के निर्माण में भी भूमिका निभाई। दलमा अभयारण्य की ओर जाने वाले मार्ग पर पाई जाने वाली “पिलो लावा” संरचनाएं तथा सहरबेड़ा क्षेत्र में ज्वालामुखीय राख और आग्लोमरेट के अवशेष इस क्षेत्र के वैज्ञानिक महत्व को दर्शाते हैं।
उन्होंने पत्र में उल्लेख किया कि झारखंड खनिज प्रोग्रामिंग बोर्ड ने सैद्धांतिक रूप से दलमा क्षेत्र को भूगर्भीय धरोहर घोषित करने के प्रस्ताव का समर्थन किया है। वहीं भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) की रांची इकाई भी इसे संरक्षण योग्य स्थल मान चुकी है।
दूसरी ओर, हजारीबाग के मांडू स्थित दूधी नाला क्षेत्र को लेकर सरयू राय ने कहा कि यहां लगभग 30 करोड़ वर्ष पुराने महादेशीय हिमनदों के अवशेष आज भी सुरक्षित हैं। भूगर्भीय अध्ययनों से संकेत मिलता है कि यह क्षेत्र कभी समुद्री और हिमनदीय गतिविधियों का केंद्र रहा होगा। कुछ वर्ष पूर्व यहां प्रस्तावित चेक डैम निर्माण से इस अनमोल धरोहर के नष्ट होने का खतरा पैदा हो गया था, लेकिन भूवैज्ञानिकों की पहल से इसे बचा लिया गया।
सरयू राय ने अपने पत्र में चेतावनी दी है कि यदि ऐसी दुर्लभ प्राकृतिक संरचनाओं को सरकारी संरक्षण नहीं मिला तो अज्ञानतावश मानवीय हस्तक्षेप इनके अस्तित्व को समाप्त कर सकता है। उन्होंने कहा कि एक बार नष्ट होने के बाद प्रकृति इन्हें दोबारा नहीं बना सकती। इसलिए राज्य सरकार को शीघ्र पहल करते हुए दलमा महासागरीय ज्वालामुखी क्षेत्र और दूधी नाला हिमनद क्षेत्र को जियोलॉजिकल हैरिटेज घोषित करना चाहिए, ताकि झारखंड को वैश्विक भूगर्भीय मानचित्र पर एक विशिष्ट पहचान मिल सके और आने वाली पीढ़ियां भी इन प्राकृतिक धरोहरों से परिचित हो सकें।

