नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति (SC) के दर्जे को लेकर एक महत्वपूर्ण और स्पष्ट निर्णय सुनाते हुए कहा है कि यह दर्जा केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों तक सीमित है। अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई या किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो वह स्वतः ही अनुसूचित जाति का कानूनी दर्जा खो देता है और ऐसे में वह SC/ST अत्याचार निवारण कानून के तहत सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता।
यह फैसला जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ द्वारा सुनाया गया, जिसमें चिंथाडा आनंद नामक एक पादरी की अपील पर विचार किया गया। आनंद ने आंध्र प्रदेश में कुछ लोगों पर जातिगत दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया था। हालांकि, आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने मई 2025 में इस एफआईआर को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि आनंद ईसाई धर्म अपना चुके हैं, इसलिए वे अनुसूचित जाति के सदस्य नहीं माने जा सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस निर्णय को सही ठहराते हुए आनंद की अपील को खारिज कर दिया। अपने विस्तृत आदेश में अदालत ने कहा कि भारतीय संविधान के तहत अनुसूचित जातियों की सूची (Presidential Order, 1950) में केवल हिंदू धर्म के अनुयायियों को ही प्रारंभ में शामिल किया गया था, जिसे बाद में संशोधित कर सिख (1956) और बौद्ध (1990) धर्म के लोगों को भी इसमें शामिल किया गया। लेकिन ईसाई और मुस्लिम धर्म के अनुयायियों को इस दायरे में नहीं लाया गया है।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि कोई व्यक्ति जन्म से अनुसूचित जाति का है लेकिन बाद में धर्म परिवर्तन कर लेता है, तो उसका SC दर्जा समाप्त हो जाता है। भले ही उसके पास जारी किया गया जाति प्रमाण पत्र हो, लेकिन धर्म परिवर्तन के बाद वह SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत मिलने वाले कानूनी संरक्षण और लाभों का हकदार नहीं रहेगा।
अपने फैसले में कोर्ट ने यह कानूनी तर्क भी दिया कि ईसाई धर्म जैसे अन्य धर्मों में सैद्धांतिक रूप से जाति व्यवस्था को मान्यता नहीं दी जाती, इसलिए वहां अनुसूचित जाति के आधार पर संरक्षण का प्रश्न नहीं उठता। इसी आधार पर अदालत ने स्पष्ट किया कि SC का दर्जा धर्म-आधारित कानूनी व्यवस्था से जुड़ा हुआ है, न कि केवल सामाजिक पृष्ठभूमि से।
इस निर्णय को सामाजिक और कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह धर्म परिवर्तन और आरक्षण/कानूनी सुरक्षा के अधिकारों के बीच संबंध को स्पष्ट करता है। साथ ही, यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक स्पष्ट न्यायिक दिशा भी प्रदान करेगा, जहां धर्म परिवर्तन के बाद SC दर्जे को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं।

