जमशेदपुर। बिष्टुपुर स्थित गुजराती सनातन समाज में नवरात्रि के अवसर पर आयोजित गरबा महोत्सव में भक्ति, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है। प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी बड़ी संख्या में महिलाएं शाम से लेकर देर रात तक गरबा नृत्य के माध्यम से मां दुर्गा की आराधना कर रही हैं। पारंपरिक गीतों और आधुनिक वाद्य यंत्रों के साथ आयोजित इस महोत्सव में पांच वर्ष की बच्चियों से लेकर 80 वर्ष तक की महिलाएं उत्साहपूर्वक भाग ले रही हैं।
गुजराती सनातन समाज के सह सचिव एवं प्रेस प्रवक्ता प्रकाश मेहता ने बताया कि नवरात्रि महोत्सव का यह 99वां वर्ष है। समाज की ओर से अगले वर्ष महोत्सव के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर विशेष आयोजन की तैयारी की जा रही है। उन्होंने कहा कि यहां प्राचीन संस्कृति, परंपरा और संस्कारों को प्राथमिकता दी जाती है। गरबा में पारंपरिक गुजराती गीतों का अनुसरण किया जाता है, जबकि वाद्य यंत्रों में आधुनिकता का समावेश किया गया है। इस वर्ष गरबा आयोजन में भाग लेने के लिए गुजरात से भी एक टीम जमशेदपुर पहुंची है।
प्रकाश मेहता के अनुसार, गरबा में प्रतिदिन लगभग 400 महिलाएं हिस्सा ले रही हैं। महिलाओं को अलग-अलग समूहों में बांटा गया है। कुल 10 टीमों में प्रत्येक टीम में 15 से 18 महिलाएं शामिल हैं। विजयादशमी के दिन गुजरात से आई टीम और यहां की विजेता टीम को पुरस्कृत किया जाएगा। उन्होंने कहा कि गरबा केवल नृत्य नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों, धार्मिक आस्था और पारंपरिक संस्कारों को जीवित रखने का माध्यम है।
महाराष्ट्र से विवाह के बाद जमशेदपुर आईं जागृति टांक ने बताया कि गुजराती सनातन समाज में गरबा का माहौल बेहद खास होता है। गरबा का संबंध मां के गर्भ से माना जाता है। गोलाकार रूप में घूमकर किया जाने वाला यह नृत्य जन्म से मृत्यु तक जीवन चक्र का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि इस आयोजन के जरिए महिलाएं धार्मिक आस्था के साथ अपनी संस्कृति से भी जुड़ी रहती हैं।
श्रीनाथ राजा ने बताया कि नवरात्रि के पहले दिन सुबह गणपति बप्पा की पूजा के साथ मां दुर्गा की आराधना की जाती है। इसके बाद शाम को गरबा का आयोजन होता है, जिसमें महिलाएं पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ शामिल होती हैं।
बिंदु जोशी ने कहा कि समाज में परंपरागत गरबा का आयोजन पूरी पवित्रता के साथ किया जाता है। वह पहले स्वयं गरबा सिखाती थीं और इसमें भाग भी लेती थीं। उन्होंने कहा कि यहां गरबा के दौरान धार्मिक मर्यादा और सांस्कृतिक परंपराओं का विशेष ध्यान रखा जाता है तथा अश्लीलता के लिए कोई स्थान नहीं है।
जया बेन ने कहा कि उन्हें हर वर्ष इस आयोजन का बेसब्री से इंतजार रहता है। वहीं प्रिया जोशी ने बताया कि गरबा के माध्यम से नई पीढ़ी अपनी प्राचीन संस्कृति और परंपराओं की जड़ों से जुड़ी रहती है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ऑस्ट्रेलिया में रह रहीं मीना पारीख पिछले दो वर्षों से इस अवसर पर जमशेदपुर आ रही हैं। उन्होंने कहा कि विदेश में रहने के बावजूद अपनी संस्कृति और परंपराओं को सहेजकर रखना उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इतनी दूर रहने के बाद भी इस तरह के आयोजन उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखते हैं।
गुजरात से जमशेदपुर आईं पायल आहूजा ने बताया कि उनकी शादी जमशेदपुर में हुई है। वह मां दुर्गा का आशीर्वाद सभी पर बना रहे, इसी कामना के साथ गरबा में भाग लेती हैं। उनके लिए यह आयोजन धार्मिक आस्था और सामूहिक उल्लास का प्रतीक है।
भक्ति दबे ने बताया कि वह पिछले 30 वर्षों से गुजराती सनातन समाज में गरबा आयोजन कराने के साथ स्वयं भी इसमें भाग ले रही हैं। उन्होंने कहा कि पहले वह पांच समूहों को गरबा करवाती थीं और खुद भी नृत्य करती थीं। अब नई पीढ़ी के बच्चे बड़े हो गए हैं और अपने बच्चों के साथ गरबा करने पहुंचते हैं। उन्होंने कहा कि परिवार की कई पीढ़ियों को एक साथ अपनी परंपरा से जुड़ते देखना बेहद आनंददायक अनुभव है।
गुजराती सनातन समाज का यह आयोजन धार्मिक श्रद्धा के साथ सांस्कृतिक एकता और पीढ़ियों के बीच परंपराओं के हस्तांतरण का भी उदाहरण बन रहा है। 99वें वर्ष में पहुंचा यह महोत्सव अगले वर्ष शताब्दी समारोह की ओर बढ़ रहा है, जिसे लेकर समाज के सदस्यों में खासा उत्साह है।

