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संयुक्त जांच रिपोर्ट में साकची गुरुद्वारा के स्वतंत्र अस्तित्व पर मुहर, सीजीपीसी की शिकायत को झटका

निबंधन विभाग ने संस्था के स्वतंत्र निबंधन और संविधान को माना वैध, अधिकार संबंधी विवाद के लिए सिविल कोर्ट जाने की बात

जमशेदपुर: साकची गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के निबंधन को चुनौती देने की कोशिश को संयुक्त जांच प्रतिवेदन से बड़ा झटका लगा है। निबंधन विभाग की ओर से की गई संयुक्त जांच में साकची गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को स्वतंत्र रूप से निबंधित संस्था माना गया है। रिपोर्ट में संस्था के स्वतंत्र संविधान और उपनियमों को भी विधिक रूप से प्रभावी बताया गया है।

बुधवार को गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, साकची के प्रधान निशान सिंह और जमशेदपुर न्यायालय एवं उच्च न्यायालय के अधिवक्ता केएम सिंह ने प्रेस वार्ता कर संयुक्त जांच प्रतिवेदन के प्रमुख बिंदुओं की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि शिकायत के आधार पर दोनों पक्षों की सुनवाई, दस्तावेजों की जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के परीक्षण के बाद जांच समिति ने साकची गुरुद्वारा की स्वतंत्र वैधानिक स्थिति को स्पष्ट किया है।

केएम सिंह ने बताया कि संयुक्त जांच प्रतिवेदन में स्पष्ट किया गया है कि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, साकची एक स्वतंत्र रूप से निबंधित संस्था है। उसका निबंधन संख्या 33/2015-16 है। रिपोर्ट के अनुसार, किसी दूसरी संस्था के नियम, संविधान या आंतरिक निर्णय के आधार पर साकची गुरुद्वारा के स्वतंत्र निबंधन और उसकी वैधानिक स्थिति को प्रभावित नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि यदि किसी पक्ष को संस्था के अधिकार, परिसंपत्तियों या नियंत्रण को लेकर आपत्ति है तो उसका निस्तारण निबंधन विभाग के स्तर पर नहीं, बल्कि सक्षम सिविल कोर्ट में किया जाना चाहिए।

शिकायत के प्रमुख आधार पर भी उठे सवाल

सीजीपीसी की ओर से शिकायत में आरोप लगाया गया था कि वर्ष 2015-16 में साकची गुरुद्वारा प्रबंधन ने उसे विश्वास में लिए बिना निबंधन कराया और उपनियमों में संशोधन किया। संयुक्त जांच समिति ने इस संबंध में विभागीय प्रक्रिया को महत्वपूर्ण माना है।

रिपोर्ट के अनुसार, यदि किसी संस्था के संशोधित उपनियम निबंधन विभाग के पोर्टल पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपलोड नहीं किए गए हैं, तो उन्हें संबंधित संस्था के विधिवत स्वीकृत बाई-लॉ का हिस्सा नहीं माना जा सकता। जांच में इस बिंदु को भी शामिल किया गया, जिससे शिकायत के इस प्रमुख आधार को मजबूती नहीं मिल सकी।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि साकची गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का स्वतंत्र संविधान विधिक रूप से प्रभावी है और किसी अन्य संस्था के दावे या निर्णय मात्र से उसकी वैधता समाप्त नहीं की जा सकती।

सीजीपीसी को भी अपनानी होगी निर्धारित प्रक्रिया

संयुक्त जांच प्रतिवेदन में कहा गया है कि यदि सेंट्रल गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अपने पुराने जनरल बोर्ड से पारित नियमों या संशोधनों को प्रभावी कराना चाहती है, तो उसे निबंधन विभाग के समक्ष निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया के तहत अपने बाई-लॉ में संशोधन कराना होगा। केवल किसी नियम या पुराने निर्णय का हवाला देने से उसे स्वत: प्रभावी नहीं माना जा सकता।

जांच समिति ने संस्था की परिसंपत्तियों और नियंत्रण से जुड़े विवादों को भी अधिकार संबंधी विवाद माना है। ऐसे मामलों के समाधान के लिए सक्षम व्यवहार न्यायालय को उचित मंच बताया गया है।

25 मार्च को हुई थी दोनों पक्षों की सुनवाई

रिपोर्ट के अनुसार, उप निबंधन महानिरीक्षक के निर्देश पर शिकायत से जुड़े दोनों पक्षों को नोटिस जारी किया गया था। 25 मार्च 2026 को आयोजित सुनवाई में दोनों पक्ष उपस्थित हुए और लिखित एवं मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत किए।

शिकायतकर्ता की ओर से वर्ष 2003 के जनरल बोर्ड में पारित बताए गए नियम और उपनियम भी जांच समिति के समक्ष रखे गए। समिति ने दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों और दावों का परीक्षण करने के बाद अपना निष्कर्ष तैयार किया।

निशान सिंह ने कहा- सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं

प्रेस वार्ता में निशान सिंह ने संयुक्त जांच प्रतिवेदन को साकची गुरुद्वारा के स्वतंत्र अस्तित्व की पुष्टि बताया। उन्होंने कहा कि यह केवल साकची गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की नहीं, बल्कि पूरे सिख समाज की जीत है।

उन्होंने कहा, “सत्य परेशान हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं। सत्य के लिए संघर्ष आगे भी जारी रहेगा।”

उन्होंने कहा कि जांच रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो गया है कि साकची गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का अपना स्वतंत्र संवैधानिक और वैधानिक अस्तित्व है। संस्था अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आगे भी विधिक और लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रखेगी।

संयुक्त जांच प्रतिवेदन के निष्कर्षों के बाद साकची गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने इसे अपने स्वतंत्र निबंधन, संविधान और वैधानिक अधिकारों के पक्ष में महत्वपूर्ण आधार बताया है। वहीं, संस्था से जुड़े अधिकार और परिसंपत्ति संबंधी किसी भी विवाद के अंतिम समाधान के लिए न्यायालय का रास्ता खुला रहेगा।

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