जमशेदपुर: कारगिल विजय दिवस केवल भारतीय सेना की ऐतिहासिक जीत का स्मरण नहीं, बल्कि उन वीर सैनिकों के अदम्य साहस और बलिदान को नमन करने का अवसर है, जिन्होंने राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। इस अवसर पर जमशेदपुर के तीन पूर्व सैनिक—भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी नवेंदु गांगुली, भारतीय थल सेना के हवलदार बिरजू कुमार और बिहार रेजिमेंट के वीर योद्धा हवलदार माणिक वारदा—की शौर्यगाथा युवाओं के लिए प्रेरणा बनकर सामने आती है।
बिरसानगर निवासी नवेंदु गांगुली ने वर्ष 1989 में भारतीय नौसेना जॉइन की और आईएनएस राणा तथा आईएनएस कुकरी जैसे युद्धपोतों पर नेविगेशन विभाग में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। उन्होंने श्रीलंका के निकट धनुषकोडी क्षेत्र में ऑपरेशन ताशा के दौरान समुद्री घुसपैठ रोकने और एलटीटीई की गतिविधियों पर निगरानी रखने में अहम भूमिका निभाई। बाद में ऑपरेशन विजय के दौरान गुजरात तट पर समुद्री सुरक्षा में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही। उनका कहना है कि देशभक्ति का वास्तविक अर्थ सीमा और समुद्र में कठिन परिस्थितियों में कर्तव्य निभाने से समझ आता है।
गोविंदपुर निवासी हवलदार बिरजू कुमार ने 1995 में भारतीय सेना की एयर डिफेंस कोर में भर्ती होकर राष्ट्र सेवा का संकल्प लिया। कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने दुर्गम बर्फीली चोटियों पर दुश्मन के खिलाफ अभियान में हिस्सा लिया। वे बताते हैं कि कठिन मौसम, ऑक्सीजन की कमी और लगातार गोलाबारी के बावजूद भारतीय सैनिकों का मनोबल कभी नहीं टूटा और एक-एक कर कई महत्वपूर्ण चोटियों पर दोबारा तिरंगा फहराया गया। उनके अनुसार कारगिल विजय भारतीय सेना के साहस, अनुशासन और रणनीतिक क्षमता का प्रतीक है।
गदरा निवासी हवलदार माणिक वारदा की कहानी असाधारण साहस की मिसाल है। कारगिल युद्ध के दौरान पहाड़ी धंसने से वे 18 घंटे तक बर्फ में दबे रहे। गंभीर रूप से घायल होने के कारण उन्होंने अपने दोनों हाथ और एक पैर गंवा दिए, लेकिन उनका हौसला कभी नहीं टूटा। लंबे इलाज और कृत्रिम अंग लगने के बाद भी उन्होंने देश सेवा के अपने संकल्प को सर्वोपरि माना। वे कहते हैं कि सैनिक के लिए मातृभूमि की रक्षा सबसे बड़ा सम्मान है और भारतीय सेना हर चुनौती का मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम है। उनका संघर्ष आज भी नई पीढ़ी को राष्ट्रभक्ति, साहस और समर्पण का संदेश देता है।

