जमशेदपुर। भारतीय आध्यात्मिक आकाश में बीसवीं सदी की शुरुआत एक ऐसे युग के अवसान और नए युग के उदय की साक्षी रही, जिसने सनातन धर्म के व्यावहारिक और मानवीय पक्ष को दुनिया के सामने रखा। इस पूरे वैचारिक और आध्यात्मिक आंदोलन के केंद्र में जहां युगपुरुष स्वामी विवेकानंद और उनके गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस थे, वहीं इस पूरे संघ को अपने वात्सल्य और मौन साधना से सींचने वाली एक महाशक्ति भी पृष्ठभूमि में सक्रिय थी। वे थीं—श्री शारदा देवी, जिन्हें पूरी दुनिया ‘मां शारदा’ या ‘श्री श्री मां’ के नाम से पूजती है।
सन् 1920 में आज ही के दिन (20 जुलाई) इस महान विभूति ने अपने नश्वर शरीर का त्याग किया था। मां शारदा का जीवन किसी चमत्कारिक दावों या बाहरी आडंबरों का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि वह रोजमर्रा के साधारण जीवन में असाधारण पवित्रता, अगाध करुणा और बिना किसी भेदभाव के सबको अपनाने वाले शुद्ध मातृभाव की एक ऐसी मिसाल था, जिसकी प्रासंगिकता आज के संघर्षपूर्ण और तनावग्रस्त समय में और भी अधिक बढ़ गई है।
मां शारदा का जन्म 22 दिसंबर 1853 को बंगाल के बांकुड़ा जिले के एक बेहद निर्धन लेकिन धार्मिक परिवार में हुआ था। जयरामबाटी नामक एक छोटे से गांव में पली-बढ़ीं शारदा देवी का बचपन ग्रामीण परिवेश के सीधे-सरल ढर्रे पर बीता। उस दौर की सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप, बेहद कम उम्र में ही उनका विवाह कामारपुकुर के गदाधर चट्टोपाध्याय (जो बाद में श्री रामकृष्ण परमहंस के नाम से विख्यात हुए) के साथ हो गया। जब वे विवाह के बाद दक्षिणेश्वर (कोलकाता) आईं, तब तक श्री रामकृष्ण ईश्वर-साधना की उस चरम अवस्था में पहुंच चुके थे जहां सांसारिक रिश्तों के पारंपरिक मायने पूरी तरह बदल जाते हैं।
यहीं से मां शारदा के जीवन की उस महान परीक्षा और साधना की शुरुआत हुई, जिसने उन्हें एक साधारण ग्रामीण वधू से जगतमाता के आसन पर प्रतिष्ठित कर दिया। श्री रामकृष्ण ने अपनी पत्नी में साक्षात् जगदम्बा के रूप को देखा और उनकी ‘षोडशी पूजा’ की। यह इतिहास की एक अनूठी घटना थी, जहां एक पति ने अपनी पत्नी के भीतर की दिव्य चेतना को जागृत कर उसे पूजनीय बनाया और पत्नी ने भी उस आध्यात्मिक गरिमा को आत्मसात् करते हुए जीवनभर उनके मिशन में एक सच्चे सहयात्री की भूमिका निभाई।
साधना का स्वरूप: गृहस्थी के बीच मौन तपस्या
मां शारदा का जीवन इस मायने में अनूठा है कि उन्होंने अपनी साधना के लिए किसी गुफा, कंदरा या हिमालय की शरण नहीं ली। उनका अधिकांश समय दक्षिणेश्वर मंदिर परिसर के एक बेहद छोटे और तंग कमरे (नहबत) में बीता। वहां वे सुबह के अंधेरे से लेकर देर रात तक व्यस्त रहती थीं। उनका मुख्य काम श्री रामकृष्ण और उनके पास आने वाले अनगिनत भक्तों, शिष्यों के लिए भोजन बनाना और उनकी देखभाल करना था।
लेकिन इस भारी शारीरिक श्रम और तंग जगह के बीच भी उनकी आंतरिक चेतना कभी अशांत नहीं हुई। वे भोर में तीन बजे उठकर घंटों ध्यान में लीन रहती थीं। उनका पूरा जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि कर्म और भक्ति में कोई अंतर्विरोध नहीं है। रसोई के धुएं और बर्तनों के बीच रहते हुए भी व्यक्ति सर्वोच्च आध्यात्मिक ऊंचाई को छू सकता है। मां शारदा ने सिखाया कि अध्यात्म कोई बाहरी वेशभूषा या पलायन नहीं है, बल्कि यह अपने कर्तव्यों को बिना किसी स्वार्थ और अपेक्षा के, पूरी पवित्रता के साथ निभाना है।
मां शारदा के जीवन का सबसे मुख्य तत्व था—उनका अगाध और सार्वभौमिक मातृभाव। उनके लिए कोई भी व्यक्ति अछूत, पापी या पराया नहीं था। उस दौर के रूढ़िवादी समाज में, जहां जातिवाद और छुआछूत चरम पर थी, मां शारदा ने रूढ़ियों की दीवारों को पूरी तरह ढहा दिया।
उनका एक प्रसिद्ध कथन आज भी मानवता का मार्गदर्शन करता है—
“यदि शांति चाहते हो, तो किसी का दोष मत देखो। दोष अपने भीतर देखो। दुनिया में कोई पराया नहीं है, पूरी दुनिया तुम्हारी अपनी है।”
इस विचार को उन्होंने केवल उपदेशों में नहीं, बल्कि अपने आचरण में जीकर दिखाया। चाहे समाज का कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति हो, या डकैत अमजद जैसा कोई अपराधी—मां शारदा ने सबको एक समान स्नेह दिया। वे अपने हाथों से अमजद को भोजन परोसती थीं और उसके खाने के बाद उस जगह को खुद साफ करती थीं, जिसे देखकर उनके सनातनी रिश्तेदार भी हैरान रह जाते थे। जब किसी ने उन पर सवाल उठाया, तो उन्होंने दृढ़ता से कहा, “अमजद भी मेरा उतना ही बेटा है, जितने मेरे शरद (स्वामी शरदानंद) हैं।” यह करुणा की वह पराकाष्ठा थी जिसने बड़े से बड़े अपराधियों के हृदय को परिवर्तित कर दिया।
सन् 1886 में श्री रामकृष्ण के महासमाधि लेने के बाद, युवा संन्यासियों (जिनमें स्वामी विवेकानंद भी शामिल थे) के सामने एक गहरा शून्य पैदा हो गया था। वे सभी युवा थे और समाज की रूढ़िवादिता तथा संसाधनों की कमी से जूझ रहे थे। ऐसे कठिन समय में मां शारदा इन संन्यासियों के लिए एक मजबूत स्तंभ की तरह खड़ी हुईं।
स्वामी विवेकानंद, जो पूरी दुनिया को अपने ज्ञान से चमत्कृत कर रहे थे, मां शारदा के सामने एक छोटे बालक की तरह शीश नवाते थे। शिकागो के विश्व धर्म संसद में जाने से पहले विवेकानंद ने मां शारदा से ही आशीर्वाद और आज्ञा मांगी थी। मां ने न केवल रामकृष्ण मिशन की स्थापना और उसके विस्तार को अपनी सहमति दी, बल्कि जब भी संघ के भीतर वैचारिक या व्यावहारिक मतभेद उभरे, उन्होंने एक कुशल मार्गदर्शक की तरह उनका समाधान किया। उन्होंने संन्यासियों को हमेशा सेवा कार्य में लगे रहने और गरीबों, पीड़ितों को ‘नारायण’ मानकर उनकी सेवा करने की प्रेरणा दी।
नारी सशक्तीकरण और शिक्षा की पुरोधा
मां शारदा का दृष्टिकोण अपने समय से बहुत आगे था। हालांकि वे स्वयं औपचारिक रूप से बहुत पढ़ी-लिखी नहीं थीं, लेकिन वे महिला शिक्षा की जबरदस्त समर्थक थीं। जब सिस्टर निवेदिता (मार्गरेट नोबल) ने कोलकाता में लड़कियों के लिए एक स्कूल शुरू करने का प्रयास किया, तो उस समय के रूढ़िवादी समाज ने इसका कड़ा विरोध किया। ऐसे समय में मां शारदा स्वयं उस स्कूल के उद्घाटन के लिए गईं और वहां उपस्थित होकर लड़कियों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उनके इस कदम ने समाज के विरोध की धार को कुंद कर दिया। वे मानती थीं कि जब तक समाज की आधी आबादी यानी महिलाएं शिक्षित और आत्मनिर्भर नहीं होंगी, तब तक देश और संस्कृति का वास्तविक उत्थान असंभव है।
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में शारीरिक रूप से अस्वस्थ होने के बावजूद, मां शारदा ने अपने पास आने वाले किसी भी दुखी व्यक्ति को निराश नहीं किया। वे अंत समय तक लोगों के कष्टों को सुनती रहीं और उन्हें शांति का मार्ग दिखाती रहीं। 20 जुलाई 1920 को उन्होंने इस नश्वर संसार से विदा ली, लेकिन अपने पीछे वे एक ऐसा वैचारिक और आध्यात्मिक साम्राज्य छोड़ गईं जो आज एक सदी बीत जाने के बाद भी पूरी दुनिया में मानवता की सेवा कर रहा है।
आज जब हम मां शारदा के महाप्रयाण दिवस पर उन्हें याद करते हैं, तो यह केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व को श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि उस करुणा, सहिष्णुता और निस्वार्थ प्रेम के मूल्यों को अपने भीतर पुनर्जीवित करने का संकल्प है जिसकी आज समाज को सबसे ज्यादा जरूरत है। एक ऐसे युग में जहां हर रिश्ता किसी न किसी स्वार्थ पर टिका है, मां शारदा का ‘जगतमाता’ का रूप हमें याद दिलाता है कि बिना किसी शर्त के प्रेम करना और सबको अपनाना ही मनुष्यता का सर्वोच्च शिखर है। उनका जीवन और विचार आने वाली कई सदियों तक भटकती हुई मानवता को शांति और सद्भाव की राह दिखाते रहेंगे।
मां शारदा के चरणों में कोटि-कोटि नमन।
— लेखक एवं कवि वरुण कुमार के सौजन्य से

