प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल इलेक्ट्रोहोम्योपैथी का सर्टिफिकेट या डिप्लोमा रखने वाला कोई भी व्यक्ति एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति का अभ्यास नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि मान्यता प्राप्त मेडिकल डिग्री और वैध पंजीकरण के बिना एलोपैथी करना अवैध है तथा ऐसे लोगों को मरीजों का इलाज करने की अनुमति देना जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।
यह फैसला जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने एटा निवासी संतोष कुमार शर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने अपने निजी अस्पताल को फिर से संचालित करने और एलोपैथिक चिकित्सा करने की अनुमति देने की मांग की थी। उनका कहना था कि उन्होंने वर्ष 2005 में राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआईओएस) से सामुदायिक स्वास्थ्य का व्यावसायिक प्रमाणपत्र प्राप्त किया है, जिसके आधार पर उन्हें आधुनिक चिकित्सा पद्धति से इलाज करने का अधिकार मिलना चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ), एटा की जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। रिपोर्ट में बताया गया कि अस्पताल में बिना वैध पंजीकरण के एलोपैथिक चिकित्सा की जा रही थी। निरीक्षण में यह भी पाया गया कि अस्पताल में बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट, अग्निशमन विभाग का अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) और संक्रमण नियंत्रण जैसी अनिवार्य व्यवस्थाओं का पालन नहीं किया गया था। साथ ही अस्पताल में ऐसे लोगों द्वारा भी एलोपैथिक उपचार किया जा रहा था, जिनके पास इसके लिए आवश्यक मान्यता प्राप्त योग्यता नहीं थी।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि एलोपैथिक चिकित्सा का अभ्यास केवल वही व्यक्ति कर सकता है, जिसके पास इस पद्धति की मान्यता प्राप्त शैक्षणिक योग्यता और विधिसम्मत पंजीकरण हो। किसी अन्य चिकित्सा पद्धति का प्रमाणपत्र रखने वाले व्यक्ति को एलोपैथी की अनुमति देना कानून और संबंधित अधिनियमों के विपरीत होगा।
अदालत ने यह भी कहा कि लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य सरकार की प्रमुख जिम्मेदारी है। ऐसे में बिना वैध योग्यता वाले लोगों को चिकित्सा करने की अनुमति देना सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ गंभीर खिलवाड़ होगा और इसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
खंडपीठ ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के Poonam Verma v. Ashwin Patel तथा Dr. Mukhtiar Chand v. State of Punjab मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि एक चिकित्सा पद्धति में पंजीकृत चिकित्सक आवश्यक योग्यता और कानूनी अनुमति के बिना दूसरी चिकित्सा पद्धति, विशेष रूप से एलोपैथी, का अभ्यास नहीं कर सकता।
सभी तथ्यों और उपलब्ध अभिलेखों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने संतोष कुमार शर्मा की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता एलोपैथिक चिकित्सा करने की वैध योग्यता साबित करने में असफल रहा और उसका अस्पताल भी निर्धारित सरकारी मानकों के अनुरूप संचालित नहीं पाया गया।

