जमशेदपुर।भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में 1857 के गदर को अक्सर अंग्रेजों के खिलाफ पहला संगठित विद्रोह माना जाता है, किंतु इस जनक्रांति से करीब तीन दशक पहले ही महाराष्ट्र की सह्याद्रि पहाड़ियों में एक वीर योद्धा ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी। वह महानायक थे आद्यक्रांतिकारी उमाजी नाईक। 7 सितंबर 1791 को पुणे के पुरंदर किले की तलहटी में स्थित भिवंडी गाँव में जन्मे उमाजी नाईक ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ उस दौर में बिगुल फूंका था, जब देश का बड़ा हिस्सा ईस्ट इंडिया कंपनी के दमन चक्र को खामोशी से सहने पर मजबूर था।
उमाजी नाईक का जन्म रामोशी-बेराड समुदाय में हुआ था। यह समाज ऐतिहासिक रूप से मराठा साम्राज्य के किलों और खजानों की रक्षा का दायित्व निभाता था। छत्रपति शिवाजी महाराज के समय से ही रामोशी योद्धा अपनी वीरता और निष्ठा के लिए विख्यात थे। 1818 में मराठा साम्राज्य के पतन के बाद जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने सत्ता पर कब्जा जमाया, तो उन्होंने इन पारंपरिक रक्षकों के अधिकार, जमीनें और आजीविका छीन लीं। अंग्रेजों के अमानवीय करों और दमनकारी नीतियों ने किसानों और स्थानीय जातियों को भुखमरी के कगार पर ला खड़ा किया। उमाजी नाईक ने इस अन्याय को स्वीकार करने के बजाय ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का मार्ग चुना।
उमाजी नाईक ने सह्याद्रि की दुर्गम पहाड़ियों और जंगलों को अपना केंद्र बनाया। उन्होंने स्थानीय युवाओं और किसानों को संगठित कर ‘रामोशी सेना’ का गठन किया। शिवाजी महाराज की ‘गनिमी कावा’ (छापामार युद्ध प्रणाली) को अपनाते हुए उन्होंने ब्रिटिश खजाने, छावनियों और रसद गाड़ियों पर सुनियोजित हमले किए।उमाजी की खास बात यह थी कि वे लूटे गए धन और अनाज को अंग्रेजी हुकूमत से त्रस्त गरीब किसानों, दबे-कुचले वर्गों और अकाल पीड़ितों में बांट देते थे। इसी कारण आम जनता में उनका स्थान एक मसीहा के रूप में स्थापित हो गया और वे ‘राजा उमाजी’ के नाम से पुकारे जाने लगे। स्थानीय जनता के सहयोग के कारण ब्रिटिश पुलिस और सेना कई वर्षों तक उनके करीब भी नहीं फटक सकी।
उमाजी नाईक केवल एक छापामार योद्धा नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी राजनैतिक रणनीतिकार थे। उन्होंने महसूस किया कि अंग्रेजों को केवल स्थानीय विद्रोहों से नहीं हराया जा सकता, इसके लिए पूरे देश को एकजुट होना होगा। 16 फरवरी 1831 को उन्होंने एक ऐतिहासिक शाही घोषणापत्र (डिक्री) जारी किया। इस घोषणापत्र में उन्होंने:
देश के सभी राजाओं, जागीरदारों, जमींदारों और सैनिकों से अंग्रेजों की सेवा छोड़ने का आह्वान किया।
जनता से अंग्रेजों को किसी भी प्रकार का कर (लगान) न देने की अपील की।ब्रिटिश अधिकारियों और उनके समर्थकों का बहिष्कार करने तथा उन्हें देश से खदेड़ने का खुला आदेश दिया।इतिहासकारों के अनुसार, यह भारत का पहला ऐसा दस्तावेज़ था जिसने ब्रिटिश हुकूमत को अवैध घोषित करते हुए विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंकने का राष्ट्रव्यापी आह्वान किया था।
उमाजी के बढ़ते प्रभाव से घबराकर ब्रिटिश सरकार ने उन पर 10,000 रुपये का भारी इनाम और 400 बीघा जमीन देने की घोषणा की। विश्वासघात और छल-कपट के जाल में फंसकर दिसंबर 1831 में उन्हें आवळस गाँव के पास धोखे से बंदी बना लिया गया। पुणे की अदालत में उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला और 3 फरवरी 1832 को पुणे की केंद्रीय जेल में इस वीर सपूत को फाँसी दे दी गई। अंग्रेजों ने खौफ पैदा करने के लिए उनके पार्थिव शरीर को कई दिनों तक एक पीपल के पेड़ पर लटकाए रखा, किंतु उनका यह बलिदान देशप्रेम की अमर ज्वाला बन गया।वीर उमाजी नाईक की जयंती केवल एक तिथि नहीं, बल्कि स्वाभिमान, साहस और मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वाले उस अदम्य संकल्प का स्मरण है, जिसने आने वाले समय में 1857 के महाविद्रोह की वैचारिक जमीन तैयार की। ऐसे महान क्रांतिकारी को कोटि-कोटि नमन।
वरुण कुमार,
लेखक एवं कवि के सौजन्य से

