चाईबासा: पूर्व सांसद सह झारखंड प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष गीता कोड़ा द्वारा परिसीमन के मुद्दे पर झामुमो-कांग्रेस पर आदिवासी समाज को भ्रमित करने का आरोप लगाए जाने के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। झामुमो जिला प्रवक्ता बुधराम लागुरी और कांग्रेस जिला प्रवक्ता त्रिशानु राय ने संयुक्त रूप से गीता कोड़ा के बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि भाजपा को आदिवासी समाज को राजनीतिक पाठ पढ़ाने के बजाय पहले केंद्र सरकार से परिसीमन को लेकर स्पष्ट और ठोस गारंटी दिलानी चाहिए।
दोनों नेताओं ने कहा कि परिसीमन सामान्य राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि झारखंड के आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक अधिकारों और लोकतांत्रिक हिस्सेदारी से जुड़ा गंभीर विषय है। ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर सामान्य राजनीतिक आश्वासनों के आधार पर आदिवासी समाज की आशंकाओं को खारिज नहीं किया जा सकता।
बुधराम लागुरी और त्रिशानु राय ने कहा कि यदि भाजपा को विश्वास है कि आगामी परिसीमन के बाद आदिवासी आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ेगी और झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुरक्षित रहेगा, तो केंद्र सरकार को राज्यवार और क्षेत्रवार स्पष्ट रोडमैप सार्वजनिक करना चाहिए। भाजपा नेताओं को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि परिसीमन के बाद झारखंड में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित लोकसभा और विधानसभा सीटों का स्वरूप क्या होगा तथा आदिवासी बहुल क्षेत्रों के राजनीतिक हितों की सुरक्षा किस प्रकार सुनिश्चित की जाएगी।
नेताद्वय ने भाजपा से सवाल किया कि यदि परिसीमन को लेकर वह इतनी आश्वस्त है तो केंद्र सरकार से लिखित और स्पष्ट गारंटी दिलाने में परेशानी क्यों हो रही है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के सवालों का जवाब राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि ठोस संवैधानिक आश्वासन से दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि झारखंड का आदिवासी समाज लंबे संघर्ष के बाद अपने अधिकारों और राजनीतिक पहचान के इस मुकाम तक पहुंचा है। ऐसे में परिसीमन के कारण आदिवासी क्षेत्रों के राजनीतिक प्रभाव और प्रतिनिधित्व में संभावित बदलाव को लेकर सवाल उठाना भ्रम फैलाना नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूकता है।
बुधराम लागुरी और त्रिशानु राय ने कहा कि झामुमो-कांग्रेस आदिवासी समाज में भय पैदा नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन्हें उनके अधिकारों के प्रति सजग कर रहे हैं। भाजपा यदि आदिवासी हितैषी होने का दावा करती है तो उसे इस बहस से बचने के बजाय केंद्र सरकार के समक्ष झारखंड के आदिवासी हितों की स्पष्ट पैरवी करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि झारखंड की जनता अब केवल राजनीतिक दावों और आश्वासनों पर भरोसा नहीं करेगी। जनता जानना चाहती है कि परिसीमन के बाद उसके राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों की वास्तविक स्थिति क्या होगी। केंद्र सरकार को इस विषय पर अस्पष्टता समाप्त करते हुए स्पष्ट नीति, संवैधानिक सुरक्षा और सार्वजनिक रोडमैप सामने रखना चाहिए।
अंत में दोनों नेताओं ने भाजपा को चुनौती देते हुए कहा कि यदि परिसीमन के बाद आदिवासी आरक्षित सीटें बढ़ने की बात स्पष्ट है तो केंद्र सरकार से इसका राज्यवार और क्षेत्रवार रोडमैप सार्वजनिक करवाया जाए। उन्होंने कहा कि राजनीतिक बयान के बजाय लिखित गारंटी मिलने पर ही आदिवासी समाज भाजपा के दावों पर विश्वास करेगा।

