जमशेदपुर।22 अक्टूबर 1947 भारतीय इतिहास का वह निर्णायक दिन था, जब पाकिस्तान समर्थित कबायली हमलावरों और पाकिस्तानी सैनिकों ने जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया। मुजफ्फराबाद पर कब्जा करने के बाद हमलावर तेजी से श्रीनगर की ओर बढ़ रहे थे। उस समय जम्मू-कश्मीर राज्य की सुरक्षा के सामने अत्यंत गंभीर संकट खड़ा हो गया था। इसी कठिन घड़ी में जम्मू-कश्मीर स्टेट फोर्सेस के चीफ ऑफ स्टाफ ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह ने अपने अदम्य साहस, सैन्य कौशल और सर्वोच्च बलिदान से इतिहास की दिशा बदल दी।
ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह का जन्म 14 जून 1899 को हुआ था। वे सैन्य अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और नेतृत्व क्षमता के लिए प्रसिद्ध थे। अक्टूबर 1947 में जब जम्मू-कश्मीर पर बाहरी आक्रमण हुआ, तब महाराजा हरि सिंह ने राज्य की रक्षा के लिए उन्हें तत्काल मोर्चे पर जाने का आदेश दिया। आदेश मिलते ही उन्होंने किसी बड़े सैन्य दल की प्रतीक्षा नहीं की। वे लगभग 130 जवानों को लेकर बादामी बाग से स्वयं अग्रिम मोर्चे की ओर रवाना हो गए।23 अक्टूबर की सुबह उनकी छोटी-सी टुकड़ी उड़ी क्षेत्र के महत्वपूर्ण मार्गों पर तैनात हुई। ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह ने समझ लिया था कि यदि हमलावरों को कुछ समय के लिए भी रोका गया, तो राज्य को अपनी सुरक्षा मजबूत करने और आवश्यक राजनीतिक-सैन्य निर्णय लेने का अवसर मिल सकता है। उन्होंने गढ़ी क्षेत्र में मोर्चा संभाला और दुश्मन की बड़ी संख्या के बावजूद उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया।यह मुकाबला सैन्य दृष्टि से बेहद असमान था। एक ओर सीमित संख्या में जम्मू-कश्मीर स्टेट फोर्सेस के जवान थे, दूसरी ओर बड़ी संख्या में हथियारबंद हमलावर। फिर भी ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह ने पीछे हटने के बजाय प्रतिरोध को प्राथमिकता दी। उन्होंने अपने सैनिकों का नेतृत्व अग्रिम पंक्ति से किया। उनका उद्देश्य केवल लड़ाई जीतना नहीं, बल्कि दुश्मन की गति को अधिक से अधिक समय तक रोकना था।अगले कई दिनों तक लगातार संघर्ष चलता रहा। ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह और उनके जवानों ने उड़ी तथा आसपास के क्षेत्रों में हमलावरों का डटकर मुकाबला किया। वे घायल भी हुए, लेकिन उनका संकल्प नहीं टूटा। अत्यंत विषम परिस्थितियों में उन्होंने दुश्मन को श्रीनगर की दिशा में तेजी से बढ़ने से रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका प्रतिरोध उस समय जम्मू-कश्मीर की रक्षा के लिए अमूल्य सिद्ध हुआ।
27 अक्टूबर को सेरी पुल के निकट संघर्ष के दौरान ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह वीरगति को प्राप्त हुए। उन्होंने अंतिम क्षण तक अपने सैनिक कर्तव्य का निर्वहन किया। उनका बलिदान केवल एक सैनिक की शहादत नहीं था, बल्कि संकट की घड़ी में नेतृत्व, साहस और राष्ट्रधर्म की अद्वितीय मिसाल था।ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह के प्रतिरोध ने हमलावरों को महत्वपूर्ण समय तक रोके रखा। इसी दौरान भारतीय सैन्य सहायता जम्मू-कश्मीर तक पहुंचने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरि सिंह द्वारा भारत में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए गए और 27 अक्टूबर को भारतीय सेना की पहली टुकड़ियां श्रीनगर पहुंचीं। इस व्यापक ऐतिहासिक घटनाक्रम में ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह और उनके साथियों के शुरुआती प्रतिरोध का महत्व अत्यंत बड़ा था।
उनकी असाधारण वीरता और सर्वोच्च बलिदान के सम्मान में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया। वे भारतीय सैन्य इतिहास में इस सम्मान के प्रथम प्राप्तकर्ता माने जाते हैं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि युद्ध में केवल हथियारों की संख्या निर्णायक नहीं होती; साहस, नेतृत्व, रणनीति और मातृभूमि के प्रति अटूट निष्ठा भी इतिहास की धारा बदल सकती है।1947 के उस संघर्ष को याद करते हुए ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह का नाम विशेष श्रद्धा से लिया जाता है। उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद असाधारण धैर्य दिखाया और अपने प्राणों की परवाह किए बिना अपने कर्तव्य को सर्वोच्च स्थान दिया। उनके साथ लड़ने वाले जवानों का बलिदान भी इसी गौरवपूर्ण अध्याय का हिस्सा है।ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह की गाथा आने वाली पीढ़ियों को यह प्रेरणा देती रहेगी कि जब देश और मातृभूमि पर संकट आए, तब कर्तव्य से पीछे नहीं हटना चाहिए। उनका जीवन सैनिक नेतृत्व का आदर्श और बलिदान की अमर मिसाल है। जम्मू-कश्मीर की रक्षा के उस निर्णायक संघर्ष में उन्होंने अपने प्राण न्योछावर कर यह सिद्ध किया कि सच्चा सैनिक अपने राष्ट्र की सुरक्षा को सर्वोपरि मानता है।
महावीर चक्र विजेता ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह को शत्-शत् नमन। उनका अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान भारतीय सैन्य इतिहास में सदैव अमर रहेगा।
वरुण कुमार,लेखक एवं कवि के सौजन्य से

