जमशेदपुर।भारत के सैन्य इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो केवल वीरता के लिए ही नहीं, बल्कि असंभव परिस्थितियों में धैर्य, नेतृत्व और कर्तव्यनिष्ठा की अनुपम मिसाल बनने के कारण सदैव स्मरण किए जाते हैं। ऐसे ही अमर योद्धाओं में लेफ़्टिनेंट रामा राघोबा राणे का नाम अत्यंत सम्मान और गौरव के साथ लिया जाता है। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम परमवीर चक्र अलंकरण प्राप्त करने वाले सैनिकों में शामिल थे। 1947–48 के भारत-पाक युद्ध में जम्मू-कश्मीर के राजौरी क्षेत्र में उन्होंने जो अद्भुत साहस, सूझबूझ और नेतृत्व क्षमता प्रदर्शित की, उसने भारतीय सेना की विजय का मार्ग प्रशस्त किया।
11 जुलाई 1994 को उनके निधन के साथ भारत ने एक महान सैनिक को खो दिया, किंतु उनका पराक्रम और राष्ट्रसेवा आज भी भारतीय सेना तथा देशवासियों के लिए प्रेरणा का अमिट स्रोत है।रामा राघोबा राणे का जन्म 26 जून 1918 को तत्कालीन बॉम्बे प्रेसीडेंसी (वर्तमान कर्नाटक) के धारवाड़ ज़िले के हवेली गाँव में हुआ था। उनके पिता सरकारी सेवा में थे, इसलिए बार-बार स्थानांतरण के कारण उनकी प्रारम्भिक शिक्षा विभिन्न स्थानों पर हुई। बचपन से ही उनमें अनुशासन, परिश्रम और देशभक्ति के संस्कार थे।
1930 के दशक में जब देश स्वतंत्रता आंदोलन की लहर से गुजर रहा था, तब युवा रामा भी उससे गहराई से प्रभावित हुए। यद्यपि परिस्थितियों के कारण वे प्रत्यक्ष रूप से आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सके, किंतु राष्ट्रसेवा का भाव उनके मन में स्थायी रूप से स्थापित हो गया।
सेना में प्रवेश और उत्कृष्ट प्रदर्शन
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने 10 जुलाई 1940 को बॉम्बे इंजीनियर्स में भर्ती होकर सैन्य जीवन की शुरुआत की। प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने अपने अद्वितीय अनुशासन, तकनीकी दक्षता और नेतृत्व क्षमता से सभी को प्रभावित किया। वे अपने बैच के सर्वश्रेष्ठ रिक्रूट घोषित किए गए और उन्हें कमांडेंट की छड़ी प्रदान की गई।प्रशिक्षण के बाद उनकी नियुक्ति 26वीं इन्फैंट्री डिवीजन की 28वीं फील्ड कंपनी में हुई, जिसने बर्मा मोर्चे पर जापानी सेना के विरुद्ध महत्वपूर्ण अभियानों में भाग लिया।
बर्मा अभियान में साहसिक कार्य
बर्मा अभियान के दौरान राणे को एक अत्यंत जोखिमपूर्ण दायित्व सौंपा गया। उन्हें अपने साथियों के साथ जापानी सेना के गोला-बारूद के भंडार को नष्ट करना था। उन्होंने इस अभियान को सफलतापूर्वक पूरा किया और दुश्मन के संसाधनों को भारी क्षति पहुँचाई।
वापसी के समय परिस्थितियाँ अत्यंत कठिन थीं। जापानी सेना की कड़ी निगरानी के बावजूद उन्होंने अपने साथियों सहित नदी पार कर सुरक्षित अपने मुख्यालय तक पहुँचने में सफलता प्राप्त की। इस साहसिक अभियान के लिए उन्हें तत्काल हवलदार पद पर पदोन्नत किया गया।
कमीशन प्राप्त कर अधिकारी बने
युद्ध के दौरान उनके नेतृत्व और उत्कृष्ट सैन्य कौशल को देखते हुए उन्हें कमीशन प्रदान किया गया और वे सेकेंड लेफ़्टिनेंट बने। इसके बाद उनकी नियुक्ति जम्मू-कश्मीर मोर्चे पर हुई, जहाँ भारत अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए पाकिस्तान समर्थित कबायली हमलावरों और पाकिस्तानी सेना से संघर्ष कर रहा था।1948 में भारतीय सेना ने केवल रक्षात्मक रणनीति छोड़कर आक्रामक कार्रवाई का निर्णय लिया। उद्देश्य था झांगर, बारवाली रिज, चिंगास और राजौरी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को मुक्त कराना।लेकिन नौशेरा से राजौरी जाने वाला मार्ग दुश्मन द्वारा पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया गया था। सड़क पर विशाल पेड़ गिरा दिए गए थे, पुल उड़ाए जा चुके थे, जगह-जगह बारूदी सुरंगें बिछी थीं और चारों ओर से मशीनगनों की गोलाबारी हो रही थी। जब तक यह मार्ग साफ़ नहीं होता, भारतीय टैंक और सैनिक आगे नहीं बढ़ सकते थे।ऐसे समय यह अत्यंत कठिन दायित्व सेकेंड लेफ़्टिनेंट रामा राघोबा राणे और उनकी इंजीनियर टुकड़ी को सौंपा गया।
गोलियों की वर्षा में भी नहीं डिगे कदम है।
8 अप्रैल 1948 को अभियान आरंभ होते ही दुश्मन ने भीषण गोलाबारी शुरू कर दी। प्रारंभिक हमले में राणे की टुकड़ी के दो सैनिक शहीद हो गए और पाँच घायल हो गए। स्वयं राणे भी घायल हुए।
किन्तु उन्होंने उपचार कराने या पीछे हटने से इनकार कर दिया। वे अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाते हुए स्वयं सबसे आगे रहे। लगातार मशीनगनों, मोर्टार और तोपों की आग के बीच उन्होंने बारूदी सुरंगों को निष्क्रिय किया और विशाल अवरोध हटाने का कार्य जारी रखा।रात दस बजे तक वे बिना विश्राम किए अपने साथियों के साथ रास्ता साफ़ करते रहे।
9 अप्रैल को उन्होंने पुनः सुबह से कार्य आरंभ किया। रास्ते में दुश्मन द्वारा गिराए गए विशाल चीड़ के पेड़ों को विस्फोटकों से हटाया। टूटी पुलिया की मरम्मत की। नई वैकल्पिक सड़क तैयार की, जिससे भारतीय टैंक सुरक्षित आगे बढ़ सकें।शाम तक दुश्मन ने फिर से मशीनगनों से जबरदस्त हमला किया, किंतु राणे ने सूझबूझ से रास्ता बदलकर अभियान जारी रखा।रात होने पर भी उन्होंने कार्य नहीं छोड़ा।10 अप्रैल की सुबह उन्होंने पुनः अभियान प्रारंभ किया। दुश्मन के टैंक, मशीनगन और मोर्टार लगातार उन पर हमला करते रहे, लेकिन वे बिना भोजन, बिना विश्राम और घायल अवस्था में कार्य करते रहे।
उन्होंने केवल रास्ता ही साफ़ नहीं किया बल्कि भारतीय सेना के लिए आगे बढ़ने का सुरक्षित मार्ग तैयार कर दिया।
चिंगास और राजौरी की विजय का मार्ग है।
11 अप्रैल तक रामा राघोबा राणे और उनकी टुकड़ी ने चिंगास तक का मार्ग पूरी तरह खोल दिया। इसके बाद भारतीय सेना के टैंक और पैदल सैनिक तीव्र गति से आगे बढ़े।यही अभियान आगे चलकर राजौरी की मुक्ति का आधार बना।सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राणे समय पर मार्ग साफ़ नहीं कर पाते, तो भारतीय सेना की प्रगति कई दिनों तक रुक सकती थी और अभियान की सफलता संकट में पड़ सकती थी।
रामा राघोबा राणे केवल एक साहसी सैनिक ही नहीं थे, बल्कि उत्कृष्ट सैन्य नेता भी थे।उनकी नेतृत्व क्षमता की विशेषताएँ थीं—सबसे आगे रहकर नेतृत्व करना।स्वयं जोखिम उठाकर अधीनस्थ सैनिकों का मनोबल बढ़ाना।कठिन परिस्थितियों में भी शांत निर्णय लेना।तकनीकी दक्षता और युद्ध कौशल का अद्भुत समन्वय।व्यक्तिगत सुरक्षा से अधिक मिशन को महत्व देना।इसी कारण उनके साथी सैनिक उन पर पूर्ण विश्वास करते थे।
उनकी अद्वितीय वीरता, धैर्य और नेतृत्व को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें परमवीर चक्र से सम्मानित किया।
वे स्वतंत्र भारत के प्रारंभिक परमवीर चक्र विजेताओं में शामिल हुए। यह सम्मान उन्होंने स्वयं राष्ट्रपति के हाथों प्राप्त किया।यह केवल उनके व्यक्तिगत साहस का सम्मान नहीं था, बल्कि भारतीय सैन्य इंजीनियरों की असाधारण भूमिका की भी राष्ट्रीय स्वीकृति थी।
सैन्य इंजीनियरों की भूमिका का गौरव है।
युद्ध केवल बंदूक और टैंकों से नहीं जीते जाते।सड़कें बनाना, पुल तैयार करना, बारूदी सुरंगें हटाना, मार्ग खोलना और रसद व्यवस्था सुनिश्चित करना—ये सभी कार्य सैन्य इंजीनियरों के जिम्मे होते हैं।
रामा राघोबा राणे ने सिद्ध किया कि इंजीनियर सैनिक भी मोर्चे पर उतने ही वीर होते हैं जितने अग्रिम पंक्ति के लड़ाकू सैनिक।उनकी वीरता भारतीय सेना की कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स की गौरवशाली परंपरा का सर्वोच्च उदाहरण है।सेवा काल के दौरान राणे ने अनेक महत्वपूर्ण दायित्व निभाए। वे अत्यंत अनुशासित, विनम्र और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी माने जाते थे।
उन्होंने कभी अपने पराक्रम का प्रदर्शन नहीं किया। उनका विश्वास था कि सैनिक का सबसे बड़ा सम्मान राष्ट्र की सुरक्षा है।यही सादगी उन्हें महान बनाती है।
आज जब युवा सफलता के आसान मार्ग खोजते हैं, तब रामा राघोबा राणे का जीवन बताता है कि महान उपलब्धियाँ कठिन परिश्रम, अनुशासन और साहस से ही प्राप्त होती हैं।
उनका जीवन हमें सिखाता है—
कठिन परिस्थितियों में धैर्य नहीं खोना चाहिए।नेतृत्व का अर्थ सबसे आगे चलना है।राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए।सच्चा सैनिक कभी कर्तव्य से पीछे नहीं हटता।साहस केवल युद्धभूमि में नहीं, बल्कि हर जिम्मेदारी निभाने में आवश्यक है।
11 जुलाई 1994 को लेफ़्टिनेंट रामा राघोबा राणे इस संसार से विदा हो गए, लेकिन उनका नाम भारतीय सेना के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।
आज भारतीय सैन्य अकादमियों में उनके साहस का अध्ययन किया जाता है। उनकी वीरगाथा नई पीढ़ी के सैनिकों को प्रेरित करती है कि राष्ट्ररक्षा केवल शस्त्रबल नहीं, बल्कि संकल्प, नेतृत्व और त्याग का भी नाम है।
लेफ़्टिनेंट रामा राघोबा राणे का जीवन भारतीय सैनिक के सर्वोच्च आदर्शों का सजीव उदाहरण है। उन्होंने घायल होने के बावजूद तीन दिनों तक निरंतर दुश्मन की गोलाबारी के बीच मार्ग साफ़ किया और भारतीय सेना की विजय सुनिश्चित की। उनका साहस, धैर्य, तकनीकी कौशल और नेतृत्व आज भी हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है।
उनकी पुण्यतिथि पर राष्ट्र उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता है। ऐसे अमर वीरों के कारण ही भारत की सीमाएँ सुरक्षित हैं और तिरंगा शान से लहराता है। लेफ़्टिनेंट रामा राघोबा राणे का जीवन आने वाली पीढ़ियों को सदैव यह प्रेरणा देता रहेगा कि कर्तव्य, साहस और राष्ट्रभक्ति ही सच्चे सैनिक की सबसे बड़ी पहचान है।
वरुण कुमार,लेखक एव कवि के सौजन्य से।

