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माँ कोई रिश्ता नहीं, एक एहसास है यह सुनते ही कई लोगों की आंखें नम हो गई जैन संत मुनि श्री 108 भाव सागर जी महाराज

कोडरमा ।। समाधिस्थ परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज से दीक्षित एवं परम पूज्य आचार्य श्री 108 समय सागर जी मुनीराज के आज्ञानुवर्ती शिष्य मुनि श्री 108 धर्म सागर जी महाराज,मुनि श्री 108 भाव सागर जी महाराज के सान्निध्य में 9 मई को प्रातः काल की बेला में श्री दिगंबर जैन नया मंदिर झुमरी तिलैया कोडरमा में विशेष श्री जी की बड़ी प्रतिमा पर अभिषेक ओर शांतिधारा गुरु मुख से किया गया।पश्चात पूजन की क्रियाएं संपन्न हुई,इसके बाद महिला वर्ग एवं पुरुष वर्ग ने गुरु के हाथों में शास्त्र अर्पण का सौभाग्य प्राप्त किया ।

इस अवसर पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए

मुनि श्री 108 भावसागर जी महाराज ने कहा कि

मां ही बच्चों को अच्छे संस्कार दे सकती है ।

माता मित्र हैं वे एक हित चिंतक कल्याण मित्र हैं जो संतानों को दोषो से बचाती हैं व्यसनो से बचाती हैं । जीवन में ऐसे जो भी अनिष्ट हैं उन से बचाती हैं । बच्चोे को अपने जीवन को पवित्र बनाना हो उत्तम बनाना हो आदर्श बनाना हो सुखी बनाना हो ऊर्ध्वगामी बनाना हो तो माता के द्वारा ही बन सकते हैं । मां जीवन भर गरीबी में रहकर अपने बच्चों को पढ़ाती है अपने से अच्छा बनाती है मां भूखी रहकर बच्चों को भोजन देती है ।

माँ शब्द सुनते ही आँखों के सामने एक ऐसी तस्वीर उभरती है जिसमें ममता है, त्याग है, और बिना शर्त प्यार है। माँ कोई रिश्ता नहीं, एक एहसास है। वो पहला स्पर्श है जिसने हमें दुनिया से मिलवाया, वो पहली लोरी है जिसने हमें सुलाया, और वो पहला आशीर्वाद है जिसने हमें जीना सिखाया।

माँ यानी बिना छुट्टी की नौकरी

एक माँ 24 घंटे ड्यूटी पर रहती है। न रविवार, न त्योहार, न बीमारी की छुट्टी। रात को बच्चा रोए तो नींद छोड़ देती है। खुद भूखी रहे पर बच्चे को पहले खिलाती है। स्कूल की कॉपी पर कवर चढ़ाने से लेकर जिंदगी के सबक सिखाने तक, माँ हर रोल निभाती है। डॉक्टर, टीचर, रसोइया, ड्राइवर, दोस्त सब एक ही इंसान में। और तनख्वाह सिर्फ बच्चे की एक मुस्कान।

माँ की ममता का हिसाब नहीं होता ।

विज्ञान कहता है कि बच्चे के जन्म के समय माँ को जो दर्द होता है, वो इंसान के शरीर की 20 हड्डियाँ एक साथ टूटने के बराबर है। फिर भी माँ बच्चे को देखते ही सारा दर्द भूल जाती है। ये कैसा जादू है,ये जादू है ममता का।

हम बड़े हो जाते हैं, शहर चले जाते हैं, व्यस्त हो जाते हैं। पर माँ के लिए हम हमेशा 5 साल के ही रहते हैं। फोन पर पहली बात पूछेगी ,बेटा खाना खाया, बीमार पड़ जाएं तो । हमारी सफलता पर सबसे धीरे ताली बजाएगी, पर आँखें सबसे पहले नम उसकी ही होंगी।

आज की माँ सिर्फ चूल्हे-चौके तक सीमित नहीं। वो ऑफिस भी संभालती है और घर भी। बच्चों का होमवर्क कराती है और अपनी मीटिंग भी अटेंड करती है। सीमा पर खड़े फौजी के हौसले की वजह भी एक माँ ही है।वृद्धाश्रमों के बढ़ते आंकड़े बताते हैं कि हम माँ के कर्ज को भूलते जा रहे हैं। जिस आँचल में हमने बरसों सुकून पाया, बुढ़ापे में वही आँचल हमें बोझ लगने लगा है। याद रखिए माँ के पैरों के नीचे जन्नत यूँ ही नहीं कही गई। महंगे तोहफे नहीं, आपके दो पल का साथ चाहिए। दिन में एक बार फोन कर के पूछ लीजिए,माँ, कैसी हो,

: पूरी जिंदगी उसने हमारी सुनी, अब हमारी बारी है। उसकी बातें, किस्से, शिकायतें सब सुनिए।

बच्चों के सामने माँ को डाँटिए मत। जिसने आपको बोलना सिखाया, उसे चुप मत कराइए।

माँ अपनी तबियत सबसे आखिर में रखती है। आप उसके डॉक्टर बन जाइए।

माँ और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।

माँ का कर्ज हम सात जन्म में भी नहीं चुका सकते। पर एक कोशिश तो कर सकते हैं कि जब तक वो हैं, उन्हें ये एहसास दिला दें कि वो हमारे लिए क्या हैं।क्योंकि माँ होती है तो सब होता है। और माँ नहीं तो कुछ भी नहीं। मदर्स डे सिर्फ एक दिन नहीं, हर दिन माँ का दिन है। अपनी माँ को वह दीजिए जो उसको जरूरत है आज ही। कल का क्या भरोसा।

मां ने जिस संतान को बचपन से कष्ट सहनकर बड़ा किया है उस संतान का कर्तव्य है कि जीवन के अंतिम समय तक के खर्च की व्यवस्था करें, उनके भोजन आदि की व्यवस्था का ध्यान रखें

यह सुनते ही कई लोगों की आंखें नम हो गई।

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