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सियासत के बीच सुरों की गूंज: खरसावां विधायक दशरत गागराई का म्यूजिक वीडियो बना बहस का केंद्र

खरसावां।झारखंड की राजनीति इन दिनों एक अलग ही रंग में नजर आ रही है। खरसावां से विधायक दशरत गागराई का हाल ही में रिलीज हुआ म्यूजिक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और इसके साथ ही सियासी गलियारों में भी चर्चा तेज हो गई है। वीडियो में विधायक गागराई न सिर्फ अभिनय करते दिखाई दे रहे हैं, बल्कि उन्होंने अपनी आवाज़ भी दी है, जिससे यह साफ हो गया है कि यह प्रोजेक्ट पूरी तरह एक मनोरंजक और रचनात्मक प्रस्तुति के तौर पर तैयार किया गया है।

वीडियो में कोल्हान की लोक-संस्कृति, संगीत और आधुनिक फिल्मी अंदाज़ का अनोखा मेल देखने को मिलता है। साउथ फिल्मों के हीरो की तर्ज पर दमदार एंट्री, आत्मविश्वास से भरी स्क्रीन प्रेजेंस और स्टाइलिश अंदाज़ ने दर्शकों का ध्यान खींचा है। समर्थकों का कहना है कि विधायक ने राजनीति से इतर अपनी कला और संस्कृति के प्रति प्रेम को सामने लाने का प्रयास किया है, जो क्षेत्रीय पहचान को मजबूती देता है।

हालांकि, जैसे-जैसे वीडियो की लोकप्रियता बढ़ी, वैसे-वैसे विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगीं। भाजपा सहित अन्य विपक्षी नेताओं ने सोशल मीडिया पर तंज कसते हुए सवाल उठाए कि जब खरसावां क्षेत्र में सड़क, सिंचाई और रोजगार जैसी बुनियादी समस्याएं बनी हुई हैं, तब विधायक का ध्यान म्यूजिक वीडियो और शूटिंग पर क्यों है। विपक्ष का आरोप है कि जनता के मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए सांस्कृतिक गतिविधियों को आगे किया जा रहा है।

वहीं, विधायक गागराई के समर्थकों ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि कला और राजनीति को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करना सही नहीं है। विधायक अपने जनप्रतिनिधि के दायित्वों का निर्वहन करते हुए निजी समय में कला और संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं, जो किसी भी तरह से गलत नहीं है। समर्थकों के अनुसार, लोक-संस्कृति का संरक्षण और प्रचार भी समाज के प्रति एक जिम्मेदारी है।

कुल मिलाकर, दशरत गागराई का यह म्यूजिक वीडियो अब सिर्फ एक मनोरंजन का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीति, संस्कृति और जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर एक नई बहस की वजह बन गया है। जहां एक ओर समर्थक इसे सांस्कृतिक अभिव्यक्ति मान रहे हैं, वहीं विपक्ष इसे सियासी मुद्दा बनाकर सवाल उठा रहा है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में यह ‘सुरों वाली सियासत’ किस दिशा में जाती है।

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