कोडरमा। बदलती जीवनशैली और स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती जागरूकता के बीच लोगों की खानपान की आदतों में बड़ा बदलाव आया है। खासकर उम्रदराज लोग अब ऐसी चीजों को अपने भोजन में प्राथमिकता दे रहे हैं जो स्वाद के साथ सेहत के लिए भी फायदेमंद हों। ऐसे दौर में कोडरमा का कटहल एक बार फिर लोगों की पहली पसंद बनता जा रहा है। कोलेस्ट्रॉल फ्री माने जाने वाली कटहल की सब्जी न केवल ग्रामीण रसोई की पहचान है, बल्कि यह अब स्वास्थ्यवर्धक भोजन के रूप में भी तेजी से लोकप्रिय हो रही है।
कोडरमा जिले के बाजारों में इन दिनों कटहल की अच्छी आवक देखी जा रही है। शहर से लेकर गांव तक लोग बड़े चाव से इसकी खरीदारी कर रहे हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार कटहल की सब्जी वर्षों से यहां के भोजन संस्कृति का हिस्सा रही है। खासकर बुजुर्ग वर्ग इसे बेहद पसंद करता है, क्योंकि यह हल्का, पौष्टिक और स्वास्थ्य के लिहाज से सुरक्षित माना जाता है।
कोडरमा और आसपास के इलाकों में कटहल की खेती और पैदावार का इतिहास काफी पुराना रहा है। वर्ष 1936 से 1940 के दशक के दौरान, जब देश में अंग्रेजी हुकूमत थी, तब कोडरमा, हजारीबाग रोड, सरिया और आसपास के ग्रामीण इलाकों में बड़े पैमाने पर कटहल के पेड़ हुआ करते थे। उस समय यहां अभ्रक कारोबार अपने चरम पर था और कई अंग्रेज कंपनियां इस क्षेत्र में सक्रिय थीं। बताया जाता है कि यहां रहने वाले अंग्रेज परिवार भी कटहल के स्वाद के दीवाने थे।
स्थानीय जानकारों और पुराने लोगों की मानें तो उस दौर में कोडरमा और हजारीबाग क्षेत्र से कटहल बड़ी मात्रा में रेल मार्ग के जरिए कोलकाता भेजा जाता था। वहां से समुद्री जहाजों के माध्यम से इसे लंदन तक पहुंचाया जाता था। अंग्रेज परिवार अपने परिजनों को यहां का कटहल विशेष तौर पर भेजते थे। कहा जाता है कि वहां भी लोग इसे काफी पसंद करते थे और भारतीय व्यंजन के रूप में इसका उपयोग किया जाता था।
कटहल की खासियत केवल इसका स्वाद ही नहीं, बल्कि इसके पोषक तत्व भी हैं। इसमें फाइबर, विटामिन ए, विटामिन सी, पोटैशियम और कई जरूरी मिनरल्स पाए जाते हैं। ग्रामीण इलाकों में इसे शाकाहारी लोगों के लिए “प्राकृतिक मीट” भी कहा जाता है, क्योंकि इसकी बनावट और स्वाद काफी हद तक मांसाहारी व्यंजन जैसा अहसास कराता है। यही वजह है कि शादी-ब्याह से लेकर सामान्य घरेलू भोजन तक में कटहल की सब्जी विशेष स्थान रखती है।
हालांकि समय के साथ बेतरतीब पेड़ों की कटाई और शहरीकरण ने कटहल के अस्तित्व पर असर डाला है। पहले जहां गांव-गांव में बड़े-बड़े कटहल के पेड़ दिखाई देते थे, वहीं अब उनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है। बावजूद इसके कोडरमा क्षेत्र में आज भी अच्छी मात्रा में कटहल की पैदावार होती है और लोग इसे बड़े शौक से खाते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर सरकार और कृषि विभाग गंभीर पहल करें तो कटहल आधारित उद्योगों के जरिए बड़े स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं। कटहल से अचार, चिप्स, पाउडर और प्रोसेस्ड फूड उत्पाद तैयार कर बाजार में उतारे जा सकते हैं। कुछ वर्षों पहले इस दिशा में योजनाओं की चर्चा जरूर हुई थी, लेकिन जमीनी स्तर पर अब तक कोई बड़ी पहल नजर नहीं आई है।
कोडरमा का कटहल आज भी अपने स्वाद और गुणवत्ता के कारण अलग पहचान रखता है। यहां की मिट्टी और मौसम में तैयार होने वाला कटहल स्वाद में खास माना जाता है। एक बार इसकी सब्जी खाने वाला व्यक्ति इसके स्वाद को लंबे समय तक भूल नहीं पाता। स्वास्थ्य और स्वाद का अनोखा मेल बना कोडरमा का कटहल आज भी लोगों की थाली और दिल दोनों में अपनी जगह बनाए हुए है।

