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विजयादशमी पर अधर्म और अहंकार के प्रतीक रावण का अंत, प्रभु श्रीराम की विजय का शाश्वत संदेश

जमशेदपुर। अश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला विजयादशमी का पर्व सत्य, धर्म और न्याय की अधर्म पर विजय का प्रतीक है। इसी पावन दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध कर संसार को संदेश दिया था कि अन्याय, अहंकार और अत्याचार चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों, अंततः विजय सत्य और धर्म की ही होती है। विजयादशमी केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि मानव जीवन को सही दिशा दिखाने वाला ऐसा पर्व है, जिसकी प्रासंगिकता हर युग में बनी रहती है।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के लंकाकांड में भगवान श्रीराम और रावण के अंतिम युद्ध का अत्यंत भावपूर्ण और अद्भुत वर्णन मिलता है। रावण की विशाल सेना के विनाश के बाद युद्धभूमि में उसकी स्थिति कमजोर हो चुकी थी। इसके बावजूद अहंकार में डूबा लंकापति अपनी पराजय स्वीकार करने को तैयार नहीं था। उसने अपनी मायावी शक्तियों से युद्धभूमि में भ्रम पैदा करने का प्रयास किया, लेकिन प्रभु श्रीराम ने सहजता से उसकी समस्त माया को समाप्त कर दिया।

इसी बीच देवराज इंद्र ने भगवान श्रीराम की सहायता के लिए अपना दिव्य रथ भेजा। सारथी मातलि उस रथ को लेकर उपस्थित हुए। दिव्य रथ पर सवार होकर प्रभु श्रीराम रावण के साथ निर्णायक युद्ध के लिए आगे बढ़े। दूसरी ओर रावण क्रोध में आकर लगातार तीक्ष्ण बाणों की वर्षा करने लगा। उसने शक्ति, चक्र और त्रिशूल जैसे घातक अस्त्रों का प्रयोग किया, लेकिन प्रभु श्रीराम ने अपने अद्भुत पराक्रम से उसके प्रत्येक प्रहार का उत्तर दिया।

युद्ध लगातार भीषण होता गया। श्रीराम ने रावण के दसों सिरों को अपने बाणों से काट गिराया, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से उसके सिर फिर से उत्पन्न हो जाते थे। रावण की भुजाएं भी बार-बार कटने के बाद वापस आ जाती थीं। इस असाधारण दृश्य को देखकर देवता भी चिंतित हो उठे। तब रावण के भाई विभीषण ने भगवान श्रीराम को उसके रहस्य से अवगत कराया। रावण की नाभि में अमृतकुंड होने के कारण उसके कटे हुए सिर और भुजाएं फिर से जीवित हो जाते थे।

गोस्वामी तुलसीदास ने इस निर्णायक प्रसंग को चौपाई में वर्णित किया है—

खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस। रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस॥

अर्थात प्रभु श्रीराम ने धनुष को कानों तक खींचकर इकतीस बाण छोड़े। उनके बाण कालसर्प के समान तीव्र गति से रावण की ओर बढ़े। एक बाण ने उसकी नाभि में स्थित अमृत को सोख लिया, जबकि शेष तीस बाणों ने उसके दसों सिर और बीसों भुजाओं को काटकर धरती पर गिरा दिया। अमृत का प्रभाव समाप्त होते ही रावण की शक्ति भी समाप्त हो गई और अंततः उसका विशाल शरीर युद्धभूमि में धराशायी हो गया।

रावण के गिरने से पृथ्वी कांप उठी और समूची युद्धभूमि में विजय का उद्घोष गूंजने लगा। तुलसीदास जी इस दृश्य का वर्णन करते हुए लिखते हैं—

डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर॥

अर्थात दस सिरों वाले रावण के धरती पर गिरते ही पृथ्वी हिल उठी। समुद्र, नदियां, दिशाओं के दिग्गज और पर्वत तक विचलित हो गए। देवताओं और ऋषि-मुनियों ने आकाश से पुष्पवर्षा कर भगवान श्रीराम की विजय का अभिनंदन किया। संपूर्ण ब्रह्मांड में प्रभु श्रीराम की जय-जयकार गूंज उठी।

जय जय धुनि पूरी ब्रह्मंडा। जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा॥

रावण वध की यह कथा केवल एक शक्तिशाली राजा के अंत का वर्णन नहीं करती, बल्कि मनुष्य के जीवन से जुड़ी गहरी सीख भी देती है। रावण अत्यंत विद्वान था, भगवान शिव का परम भक्त था और उसके पास अपार शक्ति तथा वैभव था। इसके बावजूद उसका अहंकार, अन्याय और मर्यादा का उल्लंघन उसके विनाश का कारण बना। उसका जीवन इस बात का प्रमाण है कि केवल ज्ञान, शक्ति और संपत्ति से महानता प्राप्त नहीं होती। इसके लिए विवेक, विनम्रता, सदाचार और धर्म के प्रति निष्ठा भी आवश्यक है।

विजयादशमी का पर्व हमें अपने भीतर मौजूद अहंकार, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और अन्याय जैसी बुराइयों को समाप्त करने की प्रेरणा देता है। रावण के पुतले का दहन तभी सार्थक होगा, जब हम अपने आचरण में सत्य, मर्यादा, करुणा और न्याय को स्थान देंगे। भगवान श्रीराम का जीवन सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए और शक्ति का उपयोग सदैव सत्य तथा जनकल्याण के लिए करना चाहिए।

इसी पावन भावना के साथ रामायण संदेश परिवार की ओर से सभी बंधुजनों, माताओं, बहनों और पूज्य बुजुर्गों को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं। प्रभु श्रीराम की कृपा सभी पर बनी रहे और प्रत्येक परिवार में सुख, शांति, समृद्धि तथा सद्बुद्धि का वास हो। जीवन से निराशा और नकारात्मकता दूर हो, अन्याय के स्थान पर न्याय स्थापित हो तथा हर व्यक्ति सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प ले। प्रभु श्रीराम के श्रीचरणों में कोटि-कोटि प्रणाम के साथ यही मंगलकामना है कि समाज में प्रेम, सद्भाव और मर्यादा की स्थापना हो तथा हर व्यक्ति के जीवन में सत्य की विजय हो।

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