जमशेदपुर। भारतीय संत परंपरा में कुछ ऐसे संत हुए हैं, जिन्होंने अध्यात्म को केवल आत्मिक साधना का विषय नहीं माना, बल्कि उसे समाज के जरूरतमंद लोगों की सेवा का माध्यम बनाया। स्वामी आत्मानंद ऐसे ही संत थे, जिन्होंने शिक्षा, आध्यात्मिक जागरण, सामाजिक सेवा और वनवासी समाज के उत्थान को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया। रामकृष्ण मिशन से जुड़े स्वामी आत्मानंद का जीवन त्याग, अनुशासन, साधना और मानव सेवा का प्रेरक उदाहरण है। उनकी जयंती पर उनका स्मरण समाज में सेवा और संवेदना की भावना को मजबूत करता है।
स्वामी आत्मानंद का जन्म 6 अक्तूबर 1929 को छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के कपसदा गांव में धनीराम वर्मा और भाग्यवती देवी के घर हुआ था। उनका बचपन सामान्य परिवेश में बीता, लेकिन आगे चलकर उनके जीवन की दिशा आध्यात्मिकता और समाजसेवा की ओर मुड़ गई। उनके पिता शिक्षक थे और भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा था। इसके बाद परिवार को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
उच्च शिक्षा के लिए वे नागपुर पहुंचे, जहां रामकृष्ण मिशन के छात्रावास में रहने का अवसर मिला। मिशन के अनुशासित और आध्यात्मिक वातावरण ने उनके मन पर गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने मंत्र दीक्षा ली और संन्यास का संकल्प किया। गुरु के निर्देश पर उन्होंने एमएससी की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने प्रतिष्ठित आईसीएस परीक्षा भी उत्तीर्ण की, लेकिन प्रशासनिक सेवा को अपना जीवन लक्ष्य नहीं माना और मौखिक परीक्षा में शामिल नहीं हुए।
आध्यात्मिक जीवन की दिशा में निर्णायक कदम उन्होंने 1960 में बुद्ध पूर्णिमा के दिन अमरकंटक में उठाया। नर्मदा तट पर रामकृष्ण परमहंस के चित्र के सामने उन्होंने संन्यास ग्रहण कर अपना नाम आत्मानंद रखा। बाद में बेलूड़ मठ में ब्रह्मचर्य दीक्षा प्राप्त की और ब्रह्मचारी तेज चैतन्य के रूप में आध्यात्मिक जीवन को आगे बढ़ाया। ऋषिकेश में उन्होंने स्वामी पुरुषोत्तमानंद से योगवशिष्ठ का अध्ययन किया। साधना के साथ-साथ समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी की भावना भी लगातार मजबूत होती गई।
स्वामी आत्मानंद के मन में रायपुर में स्वामी विवेकानंद की स्मृति को स्थायी रूप देने की प्रबल इच्छा थी। बेलूड़ मठ से अनुमति नहीं मिलने के बाद उन्होंने स्वयं पहल करते हुए रामकृष्ण सेवा समिति का गठन किया। आर्थिक संसाधनों की कमी के बावजूद उन्होंने इस कार्य को आगे बढ़ाया। स्वामी विवेकानंद की जन्मशती वर्ष 1963 तक स्मारक निर्माण पूरा करने के संकल्प के साथ उन्होंने रायपुर नगरपालिका भवन में प्रत्येक रविवार गीता पर प्रवचन देना शुरू किया। इन प्रवचनों से प्राप्त राशि और समाज के सहयोग से धीरे-धीरे यह अभियान गति पकड़ता गया। बाद में शासन ने भी स्मारक के लिए भूमि उपलब्ध कराई।
समय के साथ यह स्थान एक व्यापक सेवा केंद्र के रूप में विकसित हुआ। यहां छात्रावास, मंदिर, पुस्तकालय, चिकित्सालय सहित विभिन्न सेवा गतिविधियां शुरू हुईं। 14 नवंबर 1969 को रामकृष्ण मंदिर का शिलान्यास हुआ और 2 फरवरी 1976 को उसका उद्घाटन किया गया। उनके जीवन की सेवा भावना का एक उल्लेखनीय उदाहरण उस समय सामने आया, जब अकाल के दौरान मंदिर निर्माण के लिए जुटाई गई राशि का बड़ा हिस्सा उन्होंने पीड़ित लोगों की सहायता में लगा दिया। उनके लिए मानव सेवा किसी भी भवन या संस्था के निर्माण से अधिक महत्वपूर्ण थी।
वर्ष 1968 में उनके प्रयासों से संस्था बेलूड़ मठ से जुड़ी और इसका स्वरूप रामकृष्ण मिशन विवेकानंद आश्रम के रूप में विकसित हुआ। इसी वर्ष उन्हें विधिवत संन्यास की दीक्षा भी प्राप्त हुई। स्वामी आत्मानंद अध्ययनशील संत थे। उन्होंने हिन्दी, अंग्रेजी और बांग्ला के अनेक ग्रंथों का अध्ययन किया तथा कई महत्वपूर्ण रचनाओं का अनुवाद भी किया। गीता और रामचरितमानस पर उनके प्रवचन लोगों के बीच काफी लोकप्रिय रहे और बाद में प्रकाशित भी हुए।
स्वामी आत्मानंद शिक्षा को समाज परिवर्तन का प्रभावी माध्यम मानते थे। उनका मानना था कि समाज के वंचित वर्ग तक शिक्षा, संस्कार और सेवा की पहुंच बनाकर ही वास्तविक परिवर्तन संभव है। वनवासी समाज के बीच शिक्षा और सेवा गतिविधियों को बढ़ावा देने में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़ी गतिविधियों में उनका सहयोग इसी व्यापक सोच का हिस्सा था। उन्होंने वनवासी समाज को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए शिक्षा और संस्कार को विशेष महत्व दिया।
आध्यात्मिकता के साथ उनका व्यक्तित्व सहज और बहुआयामी भी था। उन्हें खेलों में रुचि थी और वे टेनिस, वॉलीबाल तथा शतरंज खेलना पसंद करते थे। आश्रम में वे आरती और भजन भी गाते थे। कठोर साधना, गहन अध्ययन और समाजसेवा के साथ उनका व्यवहार मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा रहा।
27 अगस्त 1989 को रायपुर जाते समय राजनांदगांव के समीप उनकी जीप एक पुलिया से टकरा गई। दुर्घटना में वे वाहन से नीचे गिर गए और जीप पलटने से गंभीर रूप से घायल हो गए। इस हादसे में उनका निधन हो गया। इसके साथ ही सेवा, साधना और सामाजिक जागरण के लिए समर्पित उनके जीवन की यात्रा का अंत हुआ।
स्वामी आत्मानंद का जीवन इस बात का उदाहरण है कि संन्यास केवल सांसारिक जीवन से दूरी बनाने का नाम नहीं है। वास्तविक संन्यास अपने अहंकार और निजी स्वार्थ का त्याग कर समाज के लिए स्वयं को समर्पित करने में है। उच्च शिक्षा और प्रतिष्ठित प्रशासनिक अवसर मिलने के बावजूद उन्होंने व्यक्तिगत सफलता के बजाय अध्यात्म और जनसेवा का रास्ता चुना। शिक्षा, आध्यात्मिक जागरण, संस्थागत सेवा और वनवासी समाज के उत्थान के क्षेत्र में उनके कार्य आज भी प्रेरणा देते हैं।
उनकी जयंती पर स्वामी आत्मानंद का स्मरण केवल एक संत को श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस विचार को याद करना है जिसमें मानव सेवा को ही साधना का सर्वोच्च स्वरूप माना गया। उनका जीवन समाज के अंतिम व्यक्ति तक शिक्षा, संस्कार और सेवा पहुंचाने की प्रेरणा देता है।
— वरुण कुमार
लेखन एवं कवि के सौजन्य से

