जमशेदपुर। भारतीय धार्मिक और साहित्यिक परंपरा में कुछ रचनाकार ऐसे हैं, जिनकी कृतियां समय की सीमाओं को पार कर जनजीवन का हिस्सा बन जाती हैं। पंडित श्रद्धाराम शर्मा ‘फिलौरी’ ऐसे ही बहुआयामी व्यक्तित्व थे, जिनका नाम सुनते ही देश के करोड़ों घरों में गूंजने वाली प्रसिद्ध आरती ‘ओम जय जगदीश हरे’ स्मरण में आती है। हालांकि उनकी पहचान केवल आरती के रचयिता के रूप में सीमित नहीं है। वे कथावाचक, साहित्यकार, समाजचिंतक, धार्मिक उपदेशक और हिंदी-पंजाबी गद्य के प्रारंभिक विकास से जुड़े महत्वपूर्ण व्यक्तित्व थे।
पंडित श्रद्धाराम शर्मा का जन्म 30 सितंबर 1837 को पंजाब के फिलौर में हुआ था। इसी कारण उनके नाम के साथ ‘फिलौरी’ जुड़ा। उनके पिता पंडित जयदयाल शर्मा ज्योतिष के विद्वान थे। पारिवारिक वातावरण में धार्मिक और शास्त्रीय अध्ययन का अवसर मिलने के कारण श्रद्धाराम ने कम उम्र में ही विभिन्न विषयों में रुचि विकसित कर ली थी। उन्होंने गुरुमुखी, संस्कृत, हिंदी और फारसी का अध्ययन किया। धार्मिक ग्रंथों, ज्योतिष और तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों की उनकी समझ ने आगे चलकर उनके व्यक्तित्व को व्यापक बनाया।
श्रद्धाराम की सबसे बड़ी विशेषताओं में उनकी प्रभावशाली वक्तृत्व क्षमता शामिल थी। वे धार्मिक कथाओं और आख्यानों को इस तरह प्रस्तुत करते थे कि सामान्य व्यक्ति भी उनसे आसानी से जुड़ जाता था। महाभारत सहित विभिन्न धार्मिक प्रसंगों की व्याख्या करते हुए वे नैतिकता, सामाजिक जिम्मेदारी और सांस्कृतिक चेतना जैसे विषयों को भी सामने रखते थे। उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई और उनके प्रवचन केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि जनजागरण का माध्यम भी बने।
1857 के बाद के दौर में ब्रिटिश शासन राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों को लेकर काफी सतर्क था। श्रद्धाराम की बढ़ती लोकप्रियता और उनके प्रभाव के कारण उनके जीवन में प्रशासनिक परेशानियों का भी उल्लेख मिलता है। उपलब्ध जीवन-वृत्तांतों के अनुसार उन्हें जालंधर जिले से निष्कासित किया गया तथा फिलौर में उनके प्रवेश पर भी प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बावजूद उन्होंने अपनी धार्मिक और साहित्यिक गतिविधियां जारी रखीं और विभिन्न स्थानों पर लोगों से संवाद करते रहे।
श्रद्धाराम शर्मा की सबसे स्थायी पहचान ‘ओम जय जगदीश हरे’ से बनी। सरल हिंदी, सहज लय और आत्मीय भक्तिभाव से युक्त इस आरती ने उन्हें जनमानस में अमर कर दिया। आरती में ईश्वर को माता-पिता, अंतर्यामी और शरणदाता के रूप में संबोधित किया गया है। ‘मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी, तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतरयामी’ जैसी पंक्तियां भक्त और ईश्वर के बीच आत्मीय संबंध को व्यक्त करती हैं। इसकी भाषा इतनी सहज थी कि यह विद्वानों तक सीमित न रहकर सामान्य परिवारों और मंदिरों की दैनिक पूजा परंपरा का हिस्सा बन गई।
लेकिन श्रद्धाराम का साहित्यिक महत्व केवल आरती तक सीमित नहीं है। उनकी चर्चित कृति ‘भाग्यवती’ हिंदी के आरंभिक सामाजिक उपन्यासों के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। हिंदी का पहला उपन्यास कौन सा माना जाए, इस विषय पर साहित्य इतिहास में लंबे समय से चर्चा होती रही है। लाला श्रीनिवास दास का ‘परीक्षा गुरु’ 1882 में प्रकाशित हुआ और उसे हिंदी के आरंभिक उपन्यासों में प्रमुख स्थान प्राप्त है। वहीं श्रद्धाराम की ‘भाग्यवती’ इससे पहले की रचना मानी जाती है और हिंदी उपन्यास के विकासक्रम में इसका उल्लेख महत्वपूर्ण रूप से किया जाता है।
‘भाग्यवती’ की खासियत यह है कि इसमें तत्कालीन सामाजिक जीवन और पारिवारिक व्यवस्था से जुड़े प्रश्नों को कथा के माध्यम से सामने लाया गया। स्त्री शिक्षा, विवाह और महिलाओं की सामाजिक स्थिति जैसे विषयों को रचना में स्थान मिला। उस समय भारतीय समाज में बाल विवाह, स्त्री शिक्षा की कमी और महिलाओं की स्थिति को लेकर सामाजिक सुधार की बहस तेज हो रही थी। ऐसे वातावरण में साहित्य के माध्यम से इन विषयों को उठाना श्रद्धाराम के सामाजिक सरोकारों को दर्शाता है।
श्रद्धाराम शर्मा की साहित्यिक गतिविधियां हिंदी तक सीमित नहीं थीं। पंजाब की बहुभाषी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में पले-बढ़े श्रद्धाराम ने पंजाबी में भी लेखन किया। ‘सिखां दे राज दी विथिया’ और ‘पंजाबी बातचीत’ जैसी रचनाओं का उल्लेख पंजाबी गद्य के आरंभिक विकास के संदर्भ में किया जाता है। इस तरह उनका व्यक्तित्व हिंदी और पंजाबी साहित्यिक परंपराओं के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में भी देखा जाता है।
उनका समय भारतीय भाषाओं में आधुनिक गद्य के विकास का दौर था। मुद्रण तकनीक के विस्तार के साथ पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं तेजी से पाठकों तक पहुंच रही थीं। मौखिक कथा परंपरा और मुद्रित साहित्य के बीच एक नया संबंध बन रहा था। श्रद्धाराम इसी परिवर्तन के दौर में सक्रिय थे। उनकी भाषा में धार्मिक और पारंपरिक संस्कारों के साथ आम जन की बोलचाल की सहजता दिखाई देती है। यही कारण है कि उनके लेखन को हिंदी के आरंभिक आधुनिक गद्य के विकास की व्यापक प्रक्रिया से जोड़कर देखा जाता है।
श्रद्धाराम की रचनात्मक प्रतिभा का एक पक्ष उनकी आशुकविता से भी जुड़ा था। धार्मिक आयोजनों और सभाओं में तत्काल पद या छंद रचने की उनकी क्षमता का उल्लेख मिलता है। उनके लेखन और वक्तृत्व में भक्ति, नैतिकता तथा सामाजिक चेतना के तत्व दिखाई देते हैं। हालांकि वर्तमान समय में इंटरनेट और सोशल मीडिया पर उनके नाम से अनेक भजन, दोहे और कविताएं प्रसारित होती हैं, लेकिन प्रत्येक रचना को प्रमाणित रूप से उनका मान लेना उचित नहीं है। किसी रचना की प्रामाणिकता के लिए मूल ग्रंथ, प्रकाशित संस्करण अथवा विश्वसनीय साहित्यिक शोध का आधार आवश्यक है।
श्रद्धाराम शर्मा के लिए धर्म केवल पूजा-पद्धति तक सीमित विषय नहीं था। उनके प्रवचनों और लेखन में नैतिक जीवन, आत्मसंयम, सामाजिक जिम्मेदारी और सांस्कृतिक चेतना के विचार भी दिखाई देते हैं। वे कठिन धार्मिक अवधारणाओं को सामान्य लोगों की समझ में आने वाली भाषा में समझाने के लिए जाने जाते थे। यही विशेषता उनकी आरती में भी दिखाई देती है। संस्कृतनिष्ठ कठिन शब्दावली के बजाय सरल हिंदी के प्रयोग ने ‘ओम जय जगदीश हरे’ को व्यापक जनस्वीकृति दिलाई।
24 जून 1881 को अमृतसर में उनका निधन हुआ। उस समय उनकी आयु करीब 43 वर्ष थी। जीवन अपेक्षाकृत छोटा रहा, लेकिन उनकी रचनात्मक विरासत लंबे समय तक जीवित रही। एक ओर उनकी आरती भारतीय धार्मिक जीवन का स्थायी हिस्सा बन गई, वहीं दूसरी ओर ‘भाग्यवती’ और उनकी अन्य रचनाओं ने हिंदी तथा पंजाबी साहित्य के इतिहास में उनका नाम दर्ज कराया।
पंडित श्रद्धाराम शर्मा ‘फिलौरी’ की विरासत को केवल एक प्रसिद्ध आरती तक सीमित करके देखना उनके व्यापक योगदान को छोटा करना होगा। उन्होंने भक्ति को जनभाषा से, कथा को सामाजिक चेतना से और साहित्य को आम जीवन के प्रश्नों से जोड़ने का प्रयास किया। 19वीं शताब्दी के परिवर्तनशील भारत में उनका लेखन और वक्तृत्व उस दौर की धार्मिक, सामाजिक और भाषाई हलचलों को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है।
आज जब किसी मंदिर या घर में संध्या आरती के समय ‘ओम जय जगदीश हरे’ की धुन सुनाई देती है, तो उसके साथ अनायास ही श्रद्धाराम शर्मा ‘फिलौरी’ का स्मरण हो उठता है। उनकी रचनाएं यह प्रमाणित करती हैं कि साहित्य की शक्ति केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहती। सरल भाषा में कही गई रचना जब लोकजीवन से जुड़ती है तो वह पीढ़ियों तक जीवित रहती है। श्रद्धाराम शर्मा ने अपने छोटे से जीवनकाल में इसी स्थायी साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत की नींव रखी।
वरुण कुमार,लेखक एवं कवि के सौजन्य से

