जमशेदपुर।भारतीय साहित्य का इतिहास उन महान विभूतियों से समृद्ध है जिन्होंने अपनी लेखनी से न केवल भाषा को नई ऊर्जा दी, बल्कि समकालीन समाज की वैचारिक दिशा भी बदली। उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्ध भारतीय नवजागरण का वह संक्रांति काल था जब पाश्चात्य संपर्क, आधुनिक शिक्षा और औपनिवेशिक दबाव के बीच पारंपरिक भारतीय भाषाओं में नई चेतना का संचार हो रहा था। ओड़िया साहित्य के क्षितिज पर इस युगांतरकारी परिवर्तन के सबसे सशक्त हस्ताक्षर के रूप में कविबर राधानाथ राय का आविर्भाव हुआ। 27 सितंबर 1848 को बालेश्वर (बालासोर) जिले के केदारपुर ग्राम में जन्मे राधानाथ राय ने मध्यकालीन ओड़िया कविता की सीमाओं को तोड़कर उसे आधुनिकता, प्रकृति-प्रेम और राष्ट्रीय अस्मिता के नए आयाम प्रदान किए। उन्हें फकीर मोहन सेनापति और मधुसूदन राव के साथ आधुनिक ओड़िया साहित्य की अमर ‘त्रयी’ का शीर्षस्थ स्तंभ माना जाता है।
उन्नीसवीं शताब्दी का ओडिशा कई त्रासदियों और चुनौतियों से जूझ रहा था। 1866 का विनाशकारी ‘न-अंक दुर्भिक्ष’ (महाअकाल) जनजीवन को झकझोर चुका था। इसी दौर में औपनिवेशिक प्रशासनिक नीतियों और कुछ संकीर्ण भाषाई विवादों के कारण ओड़िया भाषा के अस्तित्व पर भी संकट मंडराने लगा था। कुछ हल्कों से यह तर्क दिया जाने लगा था कि ओड़िया कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है।ऐसे संवेदनशील समय में ओड़िया अस्मिता की रक्षा और भाषाई स्वाभिमान को पुनर्स्थापित करने का बीड़ा जिन मनीषियों ने उठाया, उनमें राधानाथ राय अग्रणी थे। राधानाथ ने एक प्रखर शिक्षाविद, प्रशासक और कवि के रूप में ओड़िया समाज की बौद्धिक रीढ़ को मजबूत किया। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि ओड़िया भाषा केवल पारंपरिक भक्ति काव्य या रीतिवादी चौपाइयों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक चिंतन, मानवीय संवेदनाओं, सौंदर्यशास्त्र और विश्वस्तरीय कथा-शिल्प को अभिव्यक्त करने में पूरी तरह समर्थ है।
राधानाथ राय का जन्म एक सुसंस्कृत परिवार में हुआ था। उनके पिता सुंदर नारायण राय शिक्षा और संस्कारों के प्रति समर्पित व्यक्ति थे। राधानाथ बचपन से ही मेधावी छात्र थे। उन्होंने बालेश्वर जिला स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद कोलकाता (कलकत्ता) के प्रेसीडेंसी कॉलेज में उच्च शिक्षा प्राप्त की। यद्यपि स्वास्थ्य संबंधी कारणों से वे अपनी औपचारिक कॉलेज की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए, लेकिन उनका स्वाध्याय आजीवन चलता रहा।
राधानाथ राय बहुभाषाविद थे। ओड़िया उनकी मातृभाषा थी, परंतु संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी, हिंदी और फारसी पर भी उनका असाधारण अधिकार था। उन्होंने शेक्सपियर, मिल्टन, बायरन, शैली और कीट्स जैसे पश्चिमी रचनाकारों के साथ-साथ कालिदास, भवभूति और भारवि के क्लासिकल संस्कृत साहित्य का गहन अध्ययन किया।उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में की और अपनी कार्यकुशलता व सत्यनिष्ठा के बल पर शिक्षा विभाग में ‘इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स’ के उच्च पद तक पहुंचे। प्रशासनिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए उन्होंने ओडिशा के दुर्गम क्षेत्रों की यात्राएं कीं। इन यात्राओं ने उन्हें ओडिशा की भौगोलिक बनावट, लोकसंस्कृति, नदियों, वनों और ऐतिहासिक धरोहरों से सीधे रूबरू कराया, जो आगे चलकर उनकी अमर कविताओं की प्राणवायु बनीं। उनके साहित्यिक अवदान को मान्यता देते हुए ब्रिटिश प्रशासन ने उन्हें ‘राय बहादुर’ की उपाधि दी, जबकि ओड़िया जनमानस ने उन्हें सादर ‘कविबर’ (कवियों में श्रेष्ठ) की उपाधि से विभूषित किया।
राधानाथ राय के आगमन से पूर्व ओड़िया कविता मुख्यतः उपेंद्र भंज और दीनकृष्ण दास जैसे मध्यकालीन रीतिकालीन कवियों के प्रभाव में थी। उस दौर की कविता में यमक, अनुप्रास, चमत्कार-प्रदर्शन, आलंकारिक बोझिलता और राधा-कृष्ण के प्रेम के पारंपरिक रूप का आधिक्य था। आम बोलचाल की संवेदना और यथार्थवादी दृष्टि से यह काव्य कुछ दूर था।राधानाथ राय ने कविता को इस रूढ़िवादी ढांचे से बाहर निकाला। उन्होंने ओड़िया कविता को कड़े तुकांत नियमों के बंधन से मुक्त किया और माइकेल मधुसूदन दत्त की तरह ओड़िया में भी प्रवहमान ‘अमित्राक्षर छंद’ को प्रतिष्ठा दिलाई।शब्दों के चमत्कारिक खेल के बजाय उन्होंने आंतरिक भाव, मनोवैज्ञानिक द्वंद्व और मानवीय अनुभूतियों को प्राथमिकता दी।
काव्य-रूपों में विविधता: उन्होंने ओड़िया में आधुनिक महाकाव्य आख्यानपरक खंडकाव्य प्रकृति-गीत और व्यंग्यात्मक काव्य विधाओं का सफल बीजारोपण किया।भारतीय साहित्य में प्रकृति का चित्रण प्रायः उद्दीपन रूप में या पृष्ठभूमि के तौर पर किया जाता रहा है। किंतु राधानाथ राय ने प्रकृति को एक सजीव, संवेदनशील और स्वतंत्र चरित्र के रूप में स्थापित किया। वे सही अर्थों में ओड़िया के ‘वर्ड्सवर्थ’ कहे जा सकते हैं, हालांकि उनकी दृष्टि में भारतीय अद्वैत और स्थानिक प्रेम का गहरा पुट था।उनका खंडकाव्य ‘चिलिका’ (1891) ओड़िया साहित्य का एक मील का पत्थर है। एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झील ‘चिलिका’ के सौंदर्य का जो सजीव, विहंगम और दार्शनिक चित्रण राधानाथ ने किया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। कवि ने चिलिका को केवल एक जलराशि नहीं देखा, बल्कि उसे ओडिशा की सांस्कृतिक चेतना और प्रकृति की दिव्य
चिलिका के बदलते रंग, सांझ के समय लौटती मछुआरों की नावें, दूर पहाड़ियों पर ढलते सूर्य की लालिमा और जलचर पक्षियों का कलरव—राधानाथ की कलम से निकलकर चित्रकला के किसी जीवंत कैनवास की भांति साकार हो उठते हैं।
’चिलिका’ केवल सौंदर्य का वर्णन नहीं है, बल्कि उसमें जीवन की नश्वरता, राजनीतिक पराधीनता की टीस और अपनी माटी के प्रति गहरी कृतज्ञता का दर्शन भी समाहित है।
राधानाथ राय की काव्य-प्रतिभा का एक विलक्षण पक्ष था—पश्चिमी और ग्रीक-रोमन आख्यानों का ऐसा देशीकरण कि वे पूरी तरह ओडिशा की मिट्टी की उपज लगने लगें। उन्होंने ओविड की ‘मेटामॉर्फोसिस’ और प्राचीन यूरोपीय कथाओं के ढांचों को लिया और उन्हें ओडिशा के इतिहास, भूगोल और किंवदंतियों में इस तरह पिरो दिया कि पाठक यह भेद ही नहीं कर पाता कि यह मूलतः कोई विदेशी कथा थी।
*’महायात्रा’: अधूरा होकर भी पूर्ण महाकाव्य*
राधानाथ राय की साहित्यिक महत्वाकांक्षा का सर्वोच्च शिखर उनका अधूरा महाकाव्य ‘महायात्रा’ है। यह ओड़िया साहित्य में अमित्र छंद में रचित पहला उच्चकोटि का महाकाव्य माना जाता है। इसकी कथा महाभारत के अंतिम पर्व से प्रेरित है, जहां पांडव द्रौपदी सहित सदेह स्वर्गारोहण के लिए हिमालय की ओर प्रस्थान करते हैं।किंतु राधानाथ ने इस पारंपरिक कथा में एक अप्रत्याशित और युगांतरकारी मोड़ दिया। उन्होंने पांडवों को उत्तर की ओर न ले जाकर अमरकंटक पर्वत और विंध्य के रास्ते ओडिशा के सह्याद्रि क्षेत्रों की ओर मोड़ दिया। वहां अग्निदेव प्रकट होते हैं और पांडवों को भारत के भावी इतिहास, आंतरिक कलह, नैतिक क्षरण और अंततः विदेशी (मुगल और ब्रिटिश) आक्रांताओं की दासता के दुश्चक्र का भविष्य-दर्शन कराते हैं।’महायात्रा’ में कवि की राष्ट्रीय पीड़ा और देशभक्ति अपनी पराकाष्ठा पर है। कवि यह चेतावनी देता है कि जब-जब भारतीय समाज अपने आंतरिक मतभेदों, स्वार्थ और चरित्रहीनता का शिकार हुआ है, तब-तब उसे गुलामी की जंजीरें पहननी पड़ी हैं। ब्रिटिश सरकार के कोपभाजन की आशंका से यह महाकाव्य पूरा नहीं हो सका, फिर भी इसके उपलब्ध सात सर्ग अपनी ओजस्वी भाषा, उदात्त कल्पना और दार्शनिक गंभीरता के कारण विश्व साहित्य के समकक्ष ठहरते हैं।राधानाथ राय केवल प्रकृति और प्रेम के ही कवि नहीं थे; वे अपने समय के एक सजग और निर्भीक आलोचक भी थे। उनका काव्य ‘दरबार’ (1897) ओड़िया साहित्य का एक अप्रतिम व्यंग्य काव्य है।
1894 में बामंडा रियासत में तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर के स्वागत में आयोजित एक शाही दरबार की पृष्ठभूमि पर यह काव्य लिखा गया था। इसमें कवि ने उन सामंतों, जमींदारों और नवाबों पर निर्मम प्रहार किया जो ब्रिटिश हुकूमत की चापलूसी में लगे थे, पदवियों के लिए लालायित थे और अपनी प्रजा के शोषण पर अपनी विलासिता का महल खड़ा कर रहे थे। राधानाथ ने उन्हें स्मरण कराया:भौतिक वैभव, अंग्रेजों द्वारा दी गई पदवियां और अहंकार सब धूल में मिल जाएंगे। मृत्यु के समक्ष राजा और रंक सब समान हैं। इतिहास केवल उन्हीं को याद रखता है जिन्होंने जनकल्याण और सत्य के मार्ग पर अपने प्राण न्योछावर किए।यह काव्य उस काल में औपनिवेशिक तंत्र और सामंती मानसिकता पर किया गया एक अत्यंत साहसिक वैचारिक प्रहार था। राष्ट्रीय चेतना जब अंगड़ाई ले रही थी, तब राधानाथ ने अपनी कविताओं के माध्यम से प्रांतीय संकीर्णता से ऊपर उठकर अखिल भारतीय दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उनका प्रसिद्ध गीत “सर्वेशाम नो जननी भारत धरणी कल्पलतेयं” (संस्कृत-ओड़िया मिश्रित) भारत माता के प्रति समर्पित एक अप्रतिम वंदना है।राधानाथ की दृष्टि में ओडिशा की पहचान भारत की समग्र चेतना से अलग नहीं थी। वे उत्कल (ओडिशा) को भारत का हृदयस्थल मानते थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में देशवासियों को आह्वान किया कि वे अकर्मण्यता, कुरीतियों और पराधीनता की निद्रा का त्याग करें। उनकी पंक्तियां आज भी ओड़िया जनमानस में गूंजती हैं:
”निज मातृभाषा, निज जन्मभूमि, ए दुइटी जेहुं जने,
नोहिचि पूज्य, तार जनम वृथा ए संसारे गणे।”
(जिसके मन में अपनी मातृभाषा और अपनी जन्मभूमि के प्रति पूज्य भाव नहीं है, उसका इस संसार में जन्म लेना ही व्यर्थ माना जाता है।)
*समकालीन त्रयी और ओड़िया नवजागरण का पोषण*
राधानाथ राय का योगदान केवल उनकी अपनी रचनाओं तक सीमित नहीं था। वे एक संस्था के समान थे। उन्होंने अपने समकालीनों को प्रेरित किया और ओड़िया भाषा के संरक्षण के आंदोलन को संगठनात्मक शक्ति दी।व्यासकवि फकीर मोहन सेनापति के साथ उनका प्रगाढ़ संबंध था। फकीर मोहन, जिन्होंने आधुनिक ओड़िया गद्य और उपन्यास विधा की नींव रखी, राधानाथ के अभिन्न मित्र और बौद्धिक सहयात्री थे।भक्तकवि मधुसूदन राव के साथ मिलकर राधानाथ ने विद्यालयीन स्तर के लिए पाठ्यपुस्तकें और बाल-साहित्य तैयार किया। ‘कवितावली’ संग्रह के माध्यम से इन दोनों साहित्यकारों ने नई पीढ़ी को शुद्ध, परिष्कृत और संस्कारवान भाषा से परिचित कराया।
उन्होंने उस समय की प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं, विशेषकर ‘उत्कल दीपिका’ और ‘उत्कल प्रभा’ को वैचारिक संरक्षण दिया, जिससे तत्कालीन ओडिशा में एक नए लेखक वर्ग का उदय हुआ।एक युगांतकारी परिवर्तनकर्ता होने के नाते राधानाथ राय को अपने समय में तीव्र साहित्यिक विरोध का भी सामना करना पड़ा। पारंपरिक रीतिकालीन धारा के समर्थकों ने उन पर ‘विदेशी तत्वों के अनुकरण’ और ‘संस्कृति-विरोधी’ होने के आरोप लगाए। उनके द्वारा प्रयुक्त अमित्र छंद और मुक्त कल्पना को लेकर समकालीन पत्र-पत्रिकाओं में तीखे वाद-विवाद हुए।विशेष रूप से उनके काव्य ‘पार्वती’ में दर्शाई गई नैतिक विसंगतियों को लेकर पारंपरिक समाज ने प्रश्न उठाए। किंतु राधानाथ ने इन आलोचनाओं का उत्तर कभी कटुता से नहीं दिया। वे मानते थे कि साहित्य का उद्देश्य केवल मीठी लोरियां सुनाना नहीं है, बल्कि जीवन के कड़वे सत्यों, नैतिक संकटों और मानवीय कमजोरियों का यथार्थवादी अन्वेषण करना भी है। समय ने सिद्ध किया कि राधानाथ के आलोचक विस्मृत हो गए, किंतु राधानाथ के प्रयोग ओड़िया भाषा की आधारशिला बन गए।
राधानाथ राय का व्यक्तिगत जीवन संघर्षों, पारिवारिक त्रासदियों और स्वास्थ्य संबंधी व्याधियों से भरा रहा। जीवन के अंतिम वर्षों में वे आध्यात्मिक चिंतन की ओर अधिक उन्मुख हो गए थे। 17 अप्रैल 1908 को कटक में इस महान साहित्यकार ने अपनी नश्वर देह त्याग दी, किंतु तब तक वे ओड़िया साहित्य को वह स्वरूप और ऊंचाई दे चुके थे, जो किसी भी समृद्ध विश्व-भाषा के समकक्ष गर्व से खड़ी हो सकती थी।
उन्होंने साहित्य को राजाओं की प्रशंसा और रूढ़ धार्मिक कर्मकांडों से मुक्त कर आम मनुष्य, प्रकृति और राष्ट्र-प्रेम के साथ जोड़ा।उन्होंने ओडिशा के चप्पे-चप्पे को साहित्यिक अमरता प्रदान की। आज भी जब कोई चिलिका झील को देखता है, तो उसे राधानाथ के छंद स्वतः स्मरण हो आते हैं।उन्होंने संस्कृत के तत्सम गांभीर्य और जनसाधारण की ओड़िया बोली का एक ऐसा संतुलन साधा जिसने मानक ओड़िया के स्वरूप को स्थायित्व दिया।27 सितंबर को जब हम राधानाथ राय की जयंती का स्मरण करते हैं, तो यह केवल एक ऐतिहासिक तिथि या किसी एक क्षेत्र के कवि का उत्सव नहीं होता। यह वास्तव में भारतीय नवजागरण की उस चेतना का उत्सव है, जिसने औपनिवेशिक दासता और मानसिक जड़ता के अंधकार में अपनी जड़ों से जुड़ते हुए आधुनिकता का स्वागत करना सिखाया। कविबर राधानाथ राय एक ऐसे साहित्यिक युगदृष्टा थे, जिन्होंने सिद्ध किया कि अपनी भाषा से प्रेम किए बिना कोई भी समाज अपनी आत्मा को जीवित नहीं रख सकता। जब तक ओड़िया भाषा में कविता का एक भी छंद पढ़ा जाएगा और जब तक चिलिका के जल में चंद्रमा का प्रतिबिंब चमकेगा, कविबर राधानाथ राय की कालजयी लेखनी भारतीय जनमानस को प्रेरित करती रहेगी।
वरुण कुमार,
लेखक एवं कवि के सौजन्य से

