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अंगदान के लिए अस्पतालों की भूमिका अहम, डॉक्टरों और नर्सों के विशेष प्रशिक्षण की जरूरत: डॉ. अतुल मलिकराम

भोपाल: मध्य प्रदेश में अंगदान को बढ़ावा देने के लिए केवल जन-जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए अस्पतालों की तैयारियों, डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ के विशेष प्रशिक्षण, ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर की उपलब्धता और अंगदान की पूरी प्रक्रिया को प्रभावी बनाने पर समान रूप से ध्यान देने की जरूरत है। राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मलिकराम ने अंगदान की मौजूदा स्थिति पर चिंता जताते हुए अस्पताल-केंद्रित व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत बताई है।

अंगदान को लेकर आमतौर पर लोगों में जागरूकता बढ़ाने और अंगदान का संकल्प लेने पर जोर दिया जाता है, लेकिन ब्रेन-स्टेम डेथ की स्थिति सामने आने के बाद अस्पताल में होने वाली प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। गंभीर मरीज की निगरानी से लेकर संभावित ब्रेन-स्टेम डेथ की पहचान, चिकित्सकीय पुष्टि, परिवार से संवाद, अंगदान की सहमति और अंगों के प्रत्यारोपण तक पहुंचाने की प्रक्रिया में अस्पताल की भूमिका निर्णायक रहती है।

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2023 में देश में 16,542 अंग प्रत्यारोपण हुए थे। इनमें मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी करीब 1.6 प्रतिशत रही। कैडेवरिक यानी मृत व्यक्ति के अंगदान के मामले में स्थिति और चुनौतीपूर्ण नजर आती है। जनवरी 2018 से जून 2023 के बीच मध्य प्रदेश में केवल 25 कैडेवरिक अंगदान दर्ज किए गए, जबकि इसी अवधि में तेलंगाना में 883 और तमिलनाडु में 713 कैडेवरिक अंगदान हुए।

केवल जागरूकता की कमी से नहीं समझी जा सकती स्थिति

इन आंकड़ों को केवल जनता में जागरूकता की कमी के आधार पर देखना पर्याप्त नहीं है। अंगदान की वास्तविक प्रक्रिया अस्पताल से शुरू होती है। ऐसे में अस्पतालों में संभावित ब्रेन-स्टेम डेथ के मामलों की समय पर पहचान और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उनकी पुष्टि बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (NOTTO) के अनुसार ब्रेन-स्टेम डेथ ऐसी स्थिति है, जिसमें मस्तिष्क के आवश्यक कार्य, विशेष रूप से ब्रेन-स्टेम के कार्य स्थायी रूप से समाप्त हो जाते हैं। इसकी पुष्टि निर्धारित चिकित्सकीय प्रक्रिया और अधिकृत मेडिकल बोर्ड के माध्यम से की जाती है। इसलिए बड़े अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों तथा आईसीयू टीम को इस प्रक्रिया का पर्याप्त प्रशिक्षण दिया जाना जरूरी है।

परिवार से संवाद में ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर की भूमिका अहम

ब्रेन-स्टेम डेथ के बाद अंगदान को लेकर परिवार से बातचीत सबसे संवेदनशील चरणों में से एक होती है। परिवार उस समय अपने प्रियजन को खोने के गहरे सदमे से गुजर रहा होता है। ऐसे में अंगदान की जानकारी देना महज चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि बेहद संवेदनशील मानवीय संवाद का विषय बन जाता है।

इस स्थिति में प्रशिक्षित ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। NOTTO के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में काउंसलिंग, समन्वय, दस्तावेजीकरण और अंगदान की प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी को प्रमुखता दी जाती है। अस्पतालों में प्रशिक्षित ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर की उपलब्धता से परिवारों को सही जानकारी देने और पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

नर्सिंग स्टाफ को भी मिले विशेष प्रशिक्षण

अंगदान की व्यवस्था में नर्सिंग स्टाफ की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आईसीयू में गंभीर मरीजों की देखभाल के दौरान नर्सों का मरीज और उसके परिवार से लगातार संपर्क रहता है। ऐसे में उन्हें ब्रेन-स्टेम डेथ की मूलभूत जानकारी, अंगदान की प्रक्रिया, संबंधित कानूनी प्रावधानों और परिवार से संवेदनशील तरीके से संवाद का प्रशिक्षण दिया जाना जरूरी है।

हालांकि, प्रशिक्षण का उद्देश्य नर्सिंग स्टाफ को अंगदान से जुड़े निर्णय लेने की जिम्मेदारी देना नहीं होना चाहिए। उनकी भूमिका सही जानकारी को सही समय पर संबंधित चिकित्सक या प्रशिक्षित ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर तक पहुंचाने और परिवार के साथ संवेदनशील संवाद बनाए रखने में महत्वपूर्ण हो सकती है।

अस्पतालों का नेटवर्क मजबूत करने की जरूरत

मध्य प्रदेश में चुनौती सिर्फ मानव संसाधन के प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है। अंगदान के लिए अस्पतालों के पूरे नेटवर्क को मजबूत करने की जरूरत है। वर्ष 2023 में सामने आई रिपोर्टों में राज्य में NOTTO से पंजीकृत सुविधाओं की संख्या और अलग-अलग जिलों में उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं के बीच असमानता का मुद्दा सामने आया था।

अंगदान की व्यवस्था अगर कुछ चुनिंदा शहरों और अस्पतालों तक सीमित रहती है तो संभावित दाताओं की पहचान से लेकर अंगों को समय पर सुरक्षित तरीके से प्रत्यारोपण केंद्र तक पहुंचाने में मुश्किलें आ सकती हैं। ऐसे में राज्य के बड़े अस्पतालों और सरकारी मेडिकल कॉलेजों को अंगदान की व्यवस्था के मजबूत नेटवर्क से जोड़ना जरूरी है।

नियमित प्रशिक्षण और जवाबदेही पर जोर

अंगदान को लेकर अस्पताल-केंद्रित कार्ययोजना में सरकारी मेडिकल कॉलेजों और बड़े अस्पतालों में नियमित प्रशिक्षण, संभावित ब्रेन-स्टेम डेथ मामलों की पहचान और रिपोर्टिंग की प्रभावी व्यवस्था, प्रशिक्षित ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर की उपलब्धता और अस्पतालों के प्रदर्शन की नियमित समीक्षा को शामिल किया जा सकता है।

इसके अलावा अंगों के सुरक्षित और समयबद्ध परिवहन के लिए बेहतर लॉजिस्टिक व्यवस्था तथा जरूरत पड़ने पर ग्रीन कॉरिडोर की व्यवस्था को भी मजबूत करने की आवश्यकता है।

तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे राज्यों से मध्य प्रदेश के लिए सीख लेने का मतलब उनकी व्यवस्था की हूबहू नकल करना नहीं है। जरूरी यह समझना है कि अंगदान केवल भावनात्मक अपील या जागरूकता अभियान से नहीं बढ़ता। इसके लिए अस्पतालों में संस्थागत तैयारी, प्रशिक्षित मानव संसाधन, बेहतर समन्वय और जवाबदेही की मजबूत व्यवस्था भी जरूरी है।

डॉ. अतुल मलिकराम के मुताबिक, अंगदान को सिर्फ सामाजिक जागरूकता के मुद्दे के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे स्वास्थ्य नीति की प्राथमिकताओं में शामिल करने की जरूरत है। उनका कहना है कि यदि प्रशिक्षित डॉक्टर समय पर ब्रेन-स्टेम डेथ की पहचान करें, प्रशिक्षित कोऑर्डिनेटर परिवार से संवेदनशील संवाद करें और अस्पताल की पूरी व्यवस्था समय पर सक्रिय हो, तो एक परिवार का दुख कई दूसरे परिवारों के लिए जीवन की उम्मीद में बदल सकता है।

मध्य प्रदेश में अंगदान की स्थिति सुधारने के लिए अब जागरूकता से आगे बढ़कर अस्पतालों की तैयारी, डॉक्टरों-नर्सों का प्रशिक्षण, बेहतर समन्वय और संस्थागत जवाबदेही पर ध्यान देने की जरूरत है।

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