जमशेदपुर।भारतीय जनजीवन में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनका योगदान किसी एक संस्था या विचारधारा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे अपने संगठन कौशल, दूरदृष्टि और अदम्य संकल्प के कारण राष्ट्रीय जीवन में स्थायी छाप छोड़ जाते हैं। ऐसे ही व्यक्तित्व थे एकनाथ रानडे। उन्हें प्रायः कन्याकुमारी स्थित विवेकानंद शिला स्मारक के शिल्पी के रूप में याद किया जाता है, किंतु उनका जीवन केवल एक स्मारक के निर्माण तक सीमित नहीं था। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुशल संगठनकर्ता, दूरदर्शी योजनाकार, प्रभावशाली वक्ता और स्वामी विवेकानंद के विचारों के समर्पित साधक थे।
19 नवंबर 1914 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के टिमटाला गांव में जन्मे एकनाथ रानडे का बचपन आर्थिक चुनौतियों के बीच बीता। प्रारंभिक शिक्षा नागपुर में हुई, जहां उनका संपर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार और संघ के प्रारंभिक स्वयंसेवकों से हुआ। किशोरावस्था में ही उन्होंने संघ की शाखा से जुड़कर राष्ट्रसेवा का संकल्प लिया। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने व्यक्तिगत जीवन की अपेक्षा पूर्णकालिक प्रचारक का मार्ग चुना और स्वयं को संगठन कार्य के लिए समर्पित कर दिया।एकनाथ रानडे की सबसे बड़ी विशेषता थी—संगठन को जीवंत और प्रभावी बनाने की अद्भुत क्षमता। 1938 में उन्हें महाकौशल क्षेत्र का प्रचारक बनाकर जबलपुर भेजा गया। उस समय मध्य भारत में भाषाई और सामाजिक विभाजन की स्थिति थी। हिंदी और मराठी भाषी समाज के बीच दूरी थी, लेकिन रानडे ने स्थानीय प्रतिष्ठित व्यक्तियों को जोड़कर संवाद और सहयोग का वातावरण बनाया। उनका विश्वास था कि संगठन केवल विचारों से नहीं, बल्कि विश्वास और व्यवहार से खड़ा होता है। इसी कारण उन्होंने समाज के सभी वर्गों से संपर्क स्थापित किया और संघ कार्य का विस्तार किया।स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश विभाजन, शरणार्थी समस्या और सामाजिक अस्थिरता जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा था। पूर्वी भारत में विस्थापितों की सहायता के लिए एकनाथ रानडे ने उल्लेखनीय कार्य किया। उन्होंने राहत शिविरों, भोजन, वस्त्र और पुनर्वास की व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाई। यह उनकी संगठन क्षमता का प्रमाण था कि सीमित संसाधनों में भी उन्होंने बड़े पैमाने पर सेवा कार्य संचालित किए।
1950 और 1960 के दशक में संघ के केंद्रीय दायित्वों का निर्वहन करते हुए वे अखिल भारतीय स्तर पर संगठन विस्तार में जुटे रहे। उन्हें संघ का सरकार्यवाह भी बनाया गया। इस दौरान उन्होंने शाखा विस्तार, कार्यकर्ता प्रशिक्षण और समाज के विभिन्न क्षेत्रों के प्रभावशाली लोगों से संवाद की परंपरा को नई दिशा दी। वे मानते थे कि राष्ट्र निर्माण केवल राजनीतिक शक्ति से नहीं, बल्कि समाज की संगठित चेतना से संभव है।एकनाथ रानडे के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय स्वामी विवेकानंद जन्मशती वर्ष 1963 से प्रारंभ होता है। कन्याकुमारी की उस शिला पर, जहां परंपरा के अनुसार स्वामी विवेकानंद ने शिकागो धर्म संसद में जाने से पहले ध्यान किया था, एक राष्ट्रीय स्मारक बनाने का विचार सामने आया। यह विचार जितना प्रेरक था, उसे साकार करना उतना ही कठिन था। प्रशासनिक अनुमति, राजनीतिक मतभेद, वित्तीय संसाधन और तकनीकी चुनौतियां—हर स्तर पर बाधाएं थीं।एकनाथ रानडे ने इस चुनौती को केवल निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जनभागीदारी के अभियान में बदल दिया। उन्होंने विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों से संपर्क किया और बड़ी संख्या में उनका समर्थन प्राप्त किया। यह उनकी संवाद क्षमता का परिचायक था कि विभिन्न विचारधाराओं के जनप्रतिनिधि इस राष्ट्रीय स्मारक के पक्ष में एकजुट हुए। इससे परियोजना को व्यापक राष्ट्रीय स्वीकार्यता मिली और प्रशासनिक प्रक्रिया आगे बढ़ सकी।
धन-संग्रह के क्षेत्र में भी उन्होंने अभिनव प्रयोग किए। उन्होंने देश के सामान्य नागरिकों को स्मारक निर्माण का सहभागी बनाया। एक रुपये के कूपन और छोटे-छोटे जनसहयोग अभियान चलाकर उन्होंने लाखों लोगों को इस कार्य से जोड़ा। उनका उद्देश्य केवल धन एकत्र करना नहीं था, बल्कि प्रत्येक भारतीय को यह अनुभव कराना था कि विवेकानंद शिला स्मारक उसके अपने योगदान से निर्मित हुआ है। यह अभियान अपने समय का एक अनूठा जनसहभागिता मॉडल माना जाता है।
लगभग छह वर्षों के अथक प्रयासों के बाद 1970 में कन्याकुमारी स्थित भव्य विवेकानंद शिला स्मारक राष्ट्र को समर्पित हुआ। आज यह केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय एकता और स्वामी विवेकानंद के संदेश का प्रतीक माना जाता है। प्रतिवर्ष देश-विदेश से लाखों लोग यहां पहुंचकर प्रेरणा प्राप्त करते हैं।
स्मारक निर्माण के बाद भी एकनाथ रानडे रुके नहीं। उनका मानना था कि पत्थरों का स्मारक तभी सार्थक होगा जब उसके साथ विचारों का भी प्रसार हो। इसी उद्देश्य से 1972 में उन्होंने विवेकानंद केन्द्र की स्थापना की। इस संस्था ने योग, शिक्षा, ग्रामीण विकास, संस्कार निर्माण, पर्यावरण संरक्षण और पूर्वोत्तर भारत सहित अनेक क्षेत्रों में सेवा कार्य प्रारंभ किए। आज भी विवेकानंद केन्द्र देश के अनेक राज्यों में शिक्षा और समाजसेवा के माध्यम से स्वामी विवेकानंद के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य कर रहा है।एकनाथ रानडे एक गंभीर चिंतक और लेखक भी थे। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचारों का अध्ययन कर उन्हें सरल भाषा में समाज के सामने प्रस्तुत किया। उनकी संपादित पुस्तक “राइजिंग कॉल टू द हिंदू नेशन” तथा उसका हिंदी रूपांतर “उत्तिष्ठ जागृत” व्यापक रूप से चर्चित हुआ। उनका मानना था कि स्वामी विवेकानंद का संदेश केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पुनर्जागरण का आह्वान है।
उनकी कार्यशैली का सबसे बड़ा गुण था—समय का अनुशासित उपयोग, सूक्ष्म योजना और परिणाम तक पहुंचने का दृढ़ संकल्प। वे किसी भी कार्य को केवल कल्पना तक सीमित नहीं रखते थे, बल्कि उसके लिए चरणबद्ध योजना बनाते, सहयोगियों को प्रेरित करते और स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करते थे। इसी कारण उन्हें उत्कृष्ट संगठनकर्ता के रूप में सम्मान मिला।
18 अगस्त 1982 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी बनाई संस्थाएं और उनके द्वारा विकसित कार्यपद्धति आज भी जीवंत हैं। कन्याकुमारी का विवेकानंद शिला स्मारक उनकी कर्मनिष्ठा का अमर प्रतीक है। यह स्मारक केवल ग्रेनाइट की भव्य संरचना नहीं, बल्कि यह संदेश देता है कि यदि संकल्प स्पष्ट हो, उद्देश्य राष्ट्रीय हो और समाज का सहयोग साथ हो तो असंभव प्रतीत होने वाले कार्य भी संभव हो जाते हैं।
आज, जब भारत स्वामी विवेकानंद के विचारों—आत्मविश्वास, राष्ट्रभक्ति, सेवा और युवा शक्ति—को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है, तब एकनाथ रानडे का जीवन और अधिक प्रासंगिक हो उठता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि संगठन का वास्तविक अर्थ लोगों को जोड़ना, उनकी ऊर्जा को राष्ट्रहित में दिशा देना और बड़े उद्देश्यों को जनआंदोलन में बदल देना है।
एकनाथ रानडे का जीवन हमें सिखाता है कि इतिहास केवल महान विचारों से नहीं बनता, बल्कि उन कर्मयोगियों से बनता है जो उन विचारों को धरातल पर उतारने का साहस रखते हैं। विवेकानंद शिला स्मारक उनकी इसी कर्मनिष्ठा, दूरदृष्टि और अदम्य संकल्प का सजीव प्रमाण है। भारतीय सार्वजनिक जीवन में उनका नाम सदैव ऐसे राष्ट्रनिर्माता के रूप में स्मरण किया जाएगा जिसने संगठन, सेवा और सांस्कृतिक जागरण को अपने जीवन का ध्येय बनाया।
लेखक एव कवि वरुण कुमार के सौजन्य से

