Breaking
Thu. Oct 29th, 2026

29 अक्टूबर 1915 को काबुल में हुई थी अस्थायी आजाद हिन्द सरकार की स्थापना राजा महेन्द्र प्रताप बने थे राष्ट्रपति, मौलाना बरकतुल्ला ने संभाली थी प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी

जमशेदपुर।भारत की स्वतंत्रता का संघर्ष केवल देश की सीमाओं के भीतर नहीं लड़ा गया, बल्कि विदेशों में रहकर भी अनेक क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के प्रयास किए। इसी कड़ी में 29 अक्टूबर 1915 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में अस्थायी आजाद हिन्द सरकार की स्थापना की गई। राजा महेन्द्र प्रताप सिंह के नेतृत्व में गठित इस सरकार का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सहयोग जुटाकर भारत को अंग्रेजी शासन से मुक्त कराना था। इस ऐतिहासिक पहल में मौलाना मोहम्मद बरकतुल्ला और मौलाना ओबेदुल्ला सिंधी सहित कई राष्ट्रभक्तों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने ब्रिटिश साम्राज्य की कमजोरियों का लाभ उठाकर देश को आजाद कराने की रणनीति बनाई थी। उस समय जर्मनी और तुर्की जैसी ब्रिटेन विरोधी शक्तियों से सहयोग प्राप्त करने की कोशिशें की जा रही थीं। इसी उद्देश्य से राजा महेन्द्र प्रताप ने विदेशों में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों को एकजुट करने की पहल की। मौलाना बरकतुल्ला भी इस अभियान से जुड़े और भारत की स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने के प्रयासों में शामिल हुए।

क्रांतिकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल जर्मनी के सम्राट कैसर विल्हेल्म द्वितीय से मिला और भारत की आजादी के लिए समर्थन प्राप्त करने की कोशिश की। इसके बाद प्रतिनिधिमंडल ने तुर्की के नेताओं से संपर्क स्थापित किया। आगे चलकर यह दल अफगानिस्तान पहुंचा, जहां ब्रिटिश शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता अभियान को आगे बढ़ाने की संभावनाएं तलाशी गईं। मौलाना ओबेदुल्ला सिंधी ने भी इस प्रयास में सक्रिय भूमिका निभाई।

काबुल में स्थापित अस्थायी आजाद हिन्द सरकार में राजा महेन्द्र प्रताप को राष्ट्रपति और मौलाना मोहम्मद बरकतुल्ला को प्रधानमंत्री बनाया गया। मौलाना ओबेदुल्ला सिंधी को गृह विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई, जबकि डॉ. चम्पकरमण पिल्लै को विदेश मंत्री के रूप में जोड़ा गया। इस सरकार के गठन का उद्देश्य स्वतंत्र भारत की वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था का विचार प्रस्तुत करना और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संगठित संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना था।

इस सरकार ने अफगानिस्तान के रास्ते भारत में प्रवेश कर ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने की संभावनाओं पर भी विचार किया। क्रांतिकारी सीमावर्ती क्षेत्रों में समर्थन जुटाना चाहते थे और इसके लिए सैनिक तथा राजनीतिक सहयोग प्राप्त करने के प्रयास कर रहे थे। हालांकि, अफगानिस्तान के तत्कालीन शासक अमीर हबीबुल्ला खान ब्रिटेन के साथ सीधे संघर्ष से बचना चाहते थे। हथियारों, संसाधनों और व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन की कमी ने भी इस अभियान को कठिन बना दिया। परिणामस्वरूप यह सरकार अपने लक्ष्य को व्यावहारिक रूप से हासिल नहीं कर सकी।

राजा महेन्द्र प्रताप ने इसके बाद भी विभिन्न देशों की यात्राएं कर भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में समर्थन जुटाने का प्रयास जारी रखा। उनका मानना था कि भारत की आजादी के लिए विदेशी शक्तियों का सहयोग और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक समर्थन महत्वपूर्ण हो सकता है। उनके साथ जुड़े अन्य क्रांतिकारियों ने भी कठिन परिस्थितियों के बावजूद स्वतंत्रता का संदेश फैलाया।

काबुल में 1915 में स्थापित आजाद हिन्द सरकार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में बाद में गठित आजाद हिन्द सरकार से अलग ऐतिहासिक प्रयास था। दोनों का मूल उद्देश्य भारत को स्वतंत्र कराना था, लेकिन उनके नेतृत्व, परिस्थितियों और कार्ययोजना में अंतर था। 29 अक्टूबर का दिन उन क्रांतिकारियों के योगदान को याद करने का अवसर है, जिन्होंने देश से दूर रहकर भी भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया और विदेशी धरती पर स्वतंत्र भारत की सरकार की कल्पना को साकार रूप देने का प्रयास किया।

Related Post

You Missed