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Wed. Aug 26th, 2026

सर दोराबजी टाटा: राष्ट्र निर्माण की नींव रखने वाले दूरदर्शी उद्योगपति और खेलों के समर्थक

जमशेदपुर: राष्ट्र निर्माण केवल बड़े सपने देखने से नहीं, बल्कि उन्हें जमीन पर उतारने के लिए लगातार किए गए प्रयासों से होता है। सर दोराबजी टाटा का जीवन इसी सोच और दूरदर्शिता का उदाहरण रहा। उद्योग से लेकर शिक्षा, विज्ञान, स्वास्थ्य और खेल तक उन्होंने ऐसी मजबूत नींव तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका प्रभाव आज भी देश की प्रगति में दिखाई देता है।

जमशेदजी नसरवानजी टाटा ने आत्मनिर्भर भारत का जो सपना देखा था, उसे पूरा होते देखने से पहले ही उनका निधन हो गया। इसके बाद उनके बड़े बेटे दोराबजी टाटा के सामने पिता के अधूरे सपनों और विशाल विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी आई। उन्होंने इस जिम्मेदारी को चुनौती के बजाय अवसर के रूप में लिया और अपने नेतृत्व से टाटा समूह के विस्तार के साथ राष्ट्र निर्माण की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए।

अगस्त 2026 में सर दोराबजी टाटा की जयंती के अवसर पर उनकी खेल विरासत भी विशेष रूप से याद की जा रही है। भारतीय खेलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भागीदारी के वे शुरुआती समर्थकों में शामिल थे। 1920 के एंटवर्प ओलंपिक में भारत की भागीदारी के लिए उन्होंने व्यक्तिगत रूप से आर्थिक सहयोग दिया और खिलाड़ियों को प्रोत्साहित किया। उनके इन प्रयासों ने देश में संगठित ओलंपिक आंदोलन को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाई। आगे चलकर 1927 में भारतीय ओलंपिक संघ के गठन का रास्ता तैयार हुआ और दोराबजी टाटा इसके पहले अध्यक्ष बने।

सर दोराबजी टाटा की खेल विरासत को आज टाटा स्टील आगे बढ़ा रही है। कंपनी 5 विश्वस्तरीय खेल अकादमियों, हाई परफॉर्मेंस सेंटर, टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन और जमीनी स्तर से उच्च प्रदर्शन स्तर तक फैले 16 प्रशिक्षण एवं फीडर केंद्रों के जरिए 19 खेल विधाओं में प्रतिभाओं को तैयार कर रही है।

टाटा फुटबॉल अकादमी ने अब तक 300 से अधिक कैडेट्स को प्रशिक्षण दिया है, जिनमें 150 से अधिक खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय टीम का प्रतिनिधित्व किया है। वहीं, टाटा स्टील फाउंडेशन के फुटबॉल ट्रेनिंग सेंटर झारखंड की अंडर-14 और अंडर-16 बालक टीमों के लिए लगातार प्रतिभाशाली खिलाड़ी तैयार कर रहे हैं।

टाटा आर्चरी अकादमी भी इस विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पिछले 25 वर्षों में अकादमी ने 180 से अधिक कैडेट्स को प्रशिक्षित किया है और देश को 8 ओलंपियन दिए हैं। नवल टाटा हॉकी अकादमी के तहत 3 रीजनल डेवलपमेंट सेंटर और 32 ग्रासरूट स्तर के केंद्र संचालित किए जा रहे हैं। तीरंदाजी, हॉकी, स्पोर्ट क्लाइम्बिंग और रोइंग जैसे खेलों में भी विश्वस्तरीय प्रशिक्षण सुविधाएं विकसित की गई हैं। इसके अलावा मैराथन और शतरंज जैसी प्रतियोगिताओं के जरिए सामुदायिक स्तर पर खेलों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

दोराबजी टाटा का योगदान केवल खेलों तक सीमित नहीं था। सीमित पूंजी, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और औपनिवेशिक शासन की उदासीनता के बीच उन्होंने साकची में भारत के पहले बड़े इस्पात संयंत्र की स्थापना के सपने को साकार करने में निर्णायक भूमिका निभाई। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी ने करीब 2.90 लाख टन इस्पात की आपूर्ति की। इसी औद्योगिक केंद्र को बाद में उनके पिता जमशेदजी नसरवानजी टाटा के सम्मान में ‘जमशेदपुर’ नाम दिया गया।

आर्थिक संकट के दौर में उद्योग को बचाए रखने के लिए दोराबजी टाटा और लेडी मेहरबाई ने अपनी निजी संपत्ति तक दांव पर लगा दी। इसमें उनका प्रसिद्ध जुबली डायमंड भी शामिल था। उनके नेतृत्व में इस्पात संयंत्र का पांच गुना विस्तार हुआ। 1920 की बड़ी श्रमिक हड़ताल के दौरान भी उन्होंने व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप किया और बातचीत के जरिए स्थिति को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने का प्रयास किया।

उनकी दूरदृष्टि ऊर्जा, विज्ञान, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी दिखाई दी। पश्चिमी घाटों में तीन जलविद्युत कंपनियों की स्थापना के जरिए उन्होंने टाटा पावर के विकास को मजबूती दी। भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु के विकास में भी उन्होंने महत्वपूर्ण सहयोग दिया। इसके अलावा उन्होंने ‘सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट’ की स्थापना की, जिसने आगे चलकर देश के कई महत्वपूर्ण संस्थानों के विकास में योगदान दिया।

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS), टाटा मेमोरियल अस्पताल, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) और नेशनल सेंटर फॉर द परफॉर्मिंग आर्ट्स (NCPA) जैसे संस्थानों के विकास में इस ट्रस्ट की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

1932 में सर दोराबजी टाटा के निधन के समय उनके पीछे केवल उद्योगों का विस्तार नहीं, बल्कि संस्थानों, सामाजिक जिम्मेदारियों और राष्ट्र निर्माण की ऐसी विरासत थी, जिसने आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित किया। उनका जीवन यह बताता है कि दूरदृष्टि, जिम्मेदारी और समाज के प्रति प्रतिबद्धता के साथ किया गया काम किसी एक दौर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर लंबे समय तक देश के विकास में दिखाई देता है।

सर दोराबजी टाटा की जयंती उनके योगदान को याद करने के साथ-साथ उस सोच को समझने का अवसर भी है, जिसमें उद्योग को केवल व्यापार नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का माध्यम माना गया।

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