नई दिल्ली: भारत और बांग्लादेश के रिश्ते सिर्फ दो पड़ोसी देशों के बीच कूटनीतिक संबंध नहीं हैं। दोनों देशों के बीच इतिहास, सुरक्षा, व्यापार, संस्कृति और भौगोलिक संपर्क की ऐसी कड़ियां हैं, जिनका सीधा असर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों पर पड़ता है। पिछले एक दशक में नरेंद्र मोदी सरकार और शेख हसीना के नेतृत्व में दोनों देशों के संबंधों में कई अहम प्रगति हुई, लेकिन अगस्त 2024 में हसीना सरकार के पतन के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों ने नई दिल्ली के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मलिकराम के मुताबिक, मौजूदा परिस्थितियों में भारत के लिए टकराव की बजाय संतुलित और दीर्घकालिक कूटनीति ज्यादा अहम है। उनका मानना है कि भारत को बांग्लादेश की नई सरकार के साथ संस्थागत संबंध मजबूत करने के साथ-साथ सुरक्षा, व्यापार और कनेक्टिविटी से जुड़े हितों को राजनीतिक बदलावों से अलग रखना होगा।
1971 से शुरू हुआ रिश्ता, कई उतार-चढ़ाव से गुजरा
भारत और बांग्लादेश के संबंधों की बुनियाद 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान पड़ी थी। हालांकि, बांग्लादेश के गठन के बाद अवैध प्रवास, सीमा प्रबंधन, तीस्ता जल बंटवारा, व्यापार असंतुलन और आतंकवाद जैसे मुद्दों ने कई बार दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित किया।
2009 में शेख हसीना के सत्ता में लौटने के बाद संबंधों में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला। बांग्लादेश ने अपनी जमीन से भारत विरोधी उग्रवादी गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई की, जिसके बाद दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग मजबूत हुआ। नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में इस साझेदारी को आगे बढ़ाते हुए सीमा प्रबंधन और कनेक्टिविटी के क्षेत्र में कई अहम समझौते हुए।
2015 का भूमि सीमा समझौता दोनों देशों के बीच सहयोग का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना गया। इसके तहत भारत और बांग्लादेश ने 111 और 51 एन्क्लेव का आदान-प्रदान किया। दशकों पुरानी इस जटिल सीमा समस्या के समाधान ने दोनों देशों के बीच राजनीतिक भरोसे को भी मजबूत किया।
कनेक्टिविटी से बढ़ी पूर्वोत्तर की रणनीतिक अहमियत
भारत-बांग्लादेश संबंधों में कनेक्टिविटी पिछले कुछ वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उभरी है। नवंबर 2023 में अखौरा-अगरतला क्रॉस-बॉर्डर रेल लिंक का उद्घाटन इसी दिशा में बड़ा कदम था। करीब 12.24 किलोमीटर लंबे इस रेल संपर्क का उद्देश्य भारत के पूर्वोत्तर को बांग्लादेश के जरिए क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ना है।
इस कनेक्टिविटी से कोलकाता और अगरतला के बीच यात्रा की दूरी और समय में उल्लेखनीय कमी आने की उम्मीद जताई गई थी। इसका महत्व केवल परिवहन सुविधा तक सीमित नहीं है। भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए बांग्लादेश के बंदरगाहों, रेल नेटवर्क और जलमार्गों तक पहुंच सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकती है।
डॉ. मलिकराम के अनुसार, यही वह क्षेत्र है जहां बांग्लादेश का महत्व भारत की विदेश नीति से आगे बढ़कर राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक रणनीति से सीधे जुड़ जाता है। बेहतर कनेक्टिविटी से माल ढुलाई की लागत और समय कम करने के साथ पूर्वोत्तर के व्यापारिक अवसरों को भी बढ़ाया जा सकता है।
सुरक्षा सहयोग ने बदली तस्वीर
सुरक्षा के मोर्चे पर भी भारत और बांग्लादेश के बीच सहयोग का असर सामने आया है। अतीत में पूर्वोत्तर भारत में सक्रिय कई उग्रवादी संगठनों ने बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल किया था। हसीना सरकार के दौरान इन संगठनों के खिलाफ कार्रवाई और भारत के साथ बढ़ते सुरक्षा सहयोग ने इस चुनौती को काफी हद तक कमजोर किया।
इस वजह से भारत के लिए बांग्लादेश की भूमिका पूर्वोत्तर की सुरक्षा और स्थिरता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हो गई। सीमा सुरक्षा, आतंकवाद और उग्रवाद से जुड़े मुद्दों पर दोनों देशों के बीच सहयोग को आगे बनाए रखना नई दिल्ली की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल रहेगा।
आर्थिक रिश्तों में भी आया विस्तार
भारत और बांग्लादेश के आर्थिक संबंधों में भी पिछले वर्षों में तेजी आई। भारत ने बांग्लादेश में रेल, सड़क, बिजली, बंदरगाह और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स के लिए रियायती ऋण उपलब्ध कराया। विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अगस्त 2024 तक बांग्लादेश के लिए भारत की लाइन ऑफ क्रेडिट करीब 7.86 अरब डॉलर थी।
इन परियोजनाओं ने दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच परस्पर निर्भरता बढ़ाने के साथ क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को भी मजबूत किया।
हसीना के बाद बदला राजनीतिक समीकरण
अगस्त 2024 में शेख हसीना के सत्ता से हटने और भारत आने के बाद बांग्लादेश में राजनीतिक संक्रमण का दौर शुरू हुआ। इसके बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। फरवरी 2026 में अंतरिम व्यवस्था समाप्त होने के बाद चुनाव हुए और बीएनपी नेता तारिक रहमान प्रधानमंत्री बने।
नई सरकार के सामने भारत के साथ संबंधों को नए राजनीतिक संदर्भ में आगे बढ़ाने की चुनौती है। वहीं, भारत के लिए भी यह अहम है कि वह बांग्लादेश के साथ अपने रिश्तों को किसी एक राजनीतिक नेतृत्व तक सीमित रखने के बजाय संस्थागत स्तर पर मजबूत करे।
शेख हसीना का भारत में रहना दोनों देशों के बीच एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। बांग्लादेश की ओर से उनके प्रत्यर्पण की मांग की गई है। भारत ने कहा है कि इस अनुरोध पर कानूनी और न्यायिक प्रक्रियाओं के तहत विचार किया जा रहा है। अगस्त 2026 में भी यह मुद्दा दोनों देशों के बीच बातचीत के प्रमुख विषयों में बना हुआ है।
चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत के सामने विकल्प
बदलते क्षेत्रीय समीकरणों में चीन की भूमिका भी भारत के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है। बांग्लादेश में चीन का आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव लगातार बढ़ा है। ऐसे में भारत के लिए केवल राजनीतिक बयानबाजी के जरिए प्रतिस्पर्धा करना पर्याप्त नहीं होगा।
डॉ. अतुल मलिकराम का मानना है कि भारत को बेहतर आर्थिक, व्यापारिक और रणनीतिक विकल्प उपलब्ध कराने होंगे। साथ ही, चल रही कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को राजनीतिक बदलावों से प्रभावित होने से बचाना होगा।
पूर्वोत्तर की सुरक्षा और विकास से जुड़ा सवाल
बांग्लादेश की स्थिरता भारत के लिए केवल विदेश नीति का मुद्दा नहीं है। इसका सीधा असर पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा, व्यापार, परिवहन और आर्थिक विकास पर पड़ता है। इसलिए ढाका में बदलती सरकारों के बीच नई दिल्ली की सबसे बड़ी चुनौती भारत-बांग्लादेश संबंधों को व्यक्ति-केंद्रित राजनीति से आगे ले जाकर संस्थागत और दीर्घकालिक साझेदारी में बदलने की होगी।
आने वाले समय में भारत के लिए सुरक्षा सहयोग को बनाए रखना, व्यापार और कनेक्टिविटी परियोजनाओं को गति देना तथा बांग्लादेश की नई सरकार के साथ व्यावहारिक संवाद जारी रखना अहम होगा। यही रणनीति भारत के व्यापक राष्ट्रीय हितों और पूर्वोत्तर की स्थिरता के लिए सबसे महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

