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Fri. Jul 31st, 2026

चिकित्सकीय लापरवाही में डॉक्टर को 11 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश, 45 दिन में राशि नहीं चुकाने पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा

चाईबासा: पश्चिमी सिंहभूम जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने चिकित्सकीय लापरवाही के एक मामले में आशा नर्सिंग होम, चाईबासा के संचालक एवं सामान्य शल्य चिकित्सक डॉ. अरुण कुमार को शिकायतकर्ता सत्यनारायण बोइपाई को कुल 11 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। आयोग ने अपने निर्णय में कहा कि उपचार के दौरान आवश्यक चिकित्सकीय मानकों और निर्धारित प्रक्रिया का समुचित पालन नहीं किया गया, जिसके कारण मरीज की मृत्यु हुई। आयोग ने डॉ. अरुण कुमार को 10 लाख रुपये मानसिक पीड़ा, उत्पीड़न और क्षति के मुआवजे के रूप में तथा एक लाख रुपये वाद व्यय के रूप में कुल 11 लाख रुपये 45 दिनों के भीतर अदा करने का निर्देश दिया है। यदि तय समय सीमा में भुगतान नहीं किया गया तो पूरी राशि पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

यह निर्णय आयोग के अध्यक्ष सुनील कुमार सिंह और महिला सदस्य देवश्री चौधरी ने बहुमत से दिया। हालांकि आयोग के पुरुष सदस्य ने अलग मत व्यक्त करते हुए शिकायत को खारिज करने की राय दी, लेकिन बहुमत का फैसला ही अंतिम माना गया।

मामला ओडिशा के मयूरभंज जिले के देवगाम निवासी सत्यनारायण बोइपाई की ओर से दायर परिवाद से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया था कि उनकी पत्नी सुनीता देवगम को 11 जून 2024 को प्रसव पीड़ा होने पर आशा नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था। वहां बिना विशेषज्ञ स्त्री रोग चिकित्सक, प्रशिक्षित नर्स और आवश्यक चिकित्सकीय व्यवस्था के शल्य क्रिया की गई। शल्य क्रिया के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव होने से उनकी हालत गंभीर हो गई। इसके बाद उन्हें टाटा मुख्य अस्पताल, जमशेदपुर और फिर राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान, रांची भेजा गया, जहां 17 जून 2024 को उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

सुनवाई के दौरान डॉ. अरुण कुमार ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि मरीज पहले से ही अत्यंत गंभीर और उच्च जोखिम की स्थिति में थी। उन्होंने बताया कि अपरा के समय से पहले अलग हो जाने जैसी गंभीर जटिलता के कारण तत्काल शल्य प्रसव करना आवश्यक था। उनके अनुसार शल्य क्रिया सफल रही और स्वस्थ शिशु का जन्म हुआ, लेकिन बाद में संक्रमणजनित आघात, बहु-अंग विफलता तथा रक्त के थक्के बनने की गंभीर गड़बड़ी जैसी जटिलताओं के कारण मरीज की स्थिति बिगड़ गई।

दोनों पक्षों ने आयोग के समक्ष मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए। शिकायतकर्ता की ओर से परिजनों के शपथपत्र और अन्य दस्तावेज दाखिल किए गए, जबकि डॉ. अरुण कुमार की ओर से स्वयं उनका, वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. एस.एल. कुंकल तथा नर्सिंग होम के एक कर्मचारी का बयान दर्ज कराया गया।

आयोग के अध्यक्ष सुनील कुमार सिंह और महिला सदस्य देवश्री चौधरी ने अपने फैसले में कहा कि शिकायतकर्ता स्वतंत्र विशेषज्ञ चिकित्सक की राय प्रस्तुत नहीं कर सका, फिर भी उपलब्ध दस्तावेजी साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि उपचार के दौरान अपेक्षित चिकित्सकीय मानकों का समुचित पालन नहीं किया गया। आयोग ने इसे सेवा में कमी और चिकित्सकीय लापरवाही मानते हुए शिकायतकर्ता को मुआवजा देने का आदेश पारित किया।

वहीं आयोग के पुरुष सदस्य ने अपने असहमति मत में कहा कि केवल शल्य क्रिया के बाद मरीज की मृत्यु हो जाना चिकित्सकीय लापरवाही का प्रमाण नहीं माना जा सकता। उन्होंने सिविल सर्जन की जांच रिपोर्ट, राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान की विशेषज्ञ समिति की राय तथा उपलब्ध चिकित्सकीय अभिलेखों का हवाला देते हुए कहा कि मरीज का उपचार परिस्थितियों के अनुरूप किया गया था और चिकित्सकीय लापरवाही सिद्ध नहीं होती।

आयोग में मतभेद होने के बावजूद अध्यक्ष और महिला सदस्य के बहुमत वाले निर्णय के आधार पर शिकायत आंशिक रूप से स्वीकार की गई और सत्यनारायण बोइपाई के पक्ष में कुल 11 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश पारित किया गया।

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