रांची। झारखंड आंदोलन के प्रणेता, आदिवासी अस्मिता के प्रतीक और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के संस्थापक नेताओं में से एक दिवंगत दिशोम गुरु शिबू सोरेन को देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से मरणोपरांत सम्मानित किया गया। मंगलवार को राष्ट्रपति भवन में आयोजित विशेष अलंकरण समारोह में भारत की राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने उनकी पत्नी रूपी सोरेन को यह सम्मान प्रदान किया। इस अवसर पर झारखंड के मुख्यमंत्री Hemant Soren की पत्नी एवं गांडेय विधायक कल्पना सोरेन भी मौजूद रहीं।
देशभर के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को सम्मानित करने के लिए आयोजित इस समारोह में शिबू सोरेन के योगदान को विशेष रूप से याद किया गया। केंद्र सरकार ने वर्ष 2026 के पद्म पुरस्कारों की घोषणा के दौरान उनके नाम का चयन करते हुए आदिवासी समाज, गरीबों, किसानों, मजदूरों और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए किए गए उनके आजीवन संघर्ष को सम्मान देने का निर्णय लिया था। पद्म भूषण सम्मान मिलने के बाद झारखंड में राजनीतिक, सामाजिक और आदिवासी संगठनों के बीच खुशी की लहर देखी गई। विभिन्न दलों के नेताओं ने इसे पूरे झारखंड और आदिवासी समाज के सम्मान के रूप में बताया।
11 जनवरी 1944 को तत्कालीन हजारीबाग जिले (वर्तमान रामगढ़) के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन ने बेहद साधारण परिस्थितियों में जीवन की शुरुआत की थी। उनके पिता सोबरन सोरेन सामाजिक अन्याय और शोषण के खिलाफ संघर्ष करते थे। पिता की हत्या के बाद शिबू सोरेन ने समाज के कमजोर तबकों के अधिकारों की लड़ाई को अपना जीवन लक्ष्य बना लिया। युवावस्था से ही उन्होंने आदिवासियों की जमीनों पर अवैध कब्जे, महाजनी शोषण और सामाजिक अन्याय के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया।
वर्ष 1970 में उनके नेतृत्व में चला ‘धान काटो आंदोलन’ झारखंड क्षेत्र में सामाजिक परिवर्तन का बड़ा माध्यम बना। इस आंदोलन के जरिए आदिवासी किसानों को उनकी जमीनों पर अधिकार दिलाने का प्रयास किया गया। इसके बाद उन्होंने जल, जंगल और जमीन की रक्षा को लेकर व्यापक जनजागरण अभियान चलाया। यही कारण था कि आदिवासी समाज ने उन्हें ‘दिशोम गुरु’ की उपाधि दी, जिसका अर्थ है जनता का महान मार्गदर्शक।
शिबू सोरेन अलग झारखंड राज्य आंदोलन के सबसे प्रमुख चेहरों में रहे। उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा को मजबूत जनाधार प्रदान किया और झारखंड की अलग पहचान तथा अधिकारों की मांग को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया। संसद से लेकर सड़कों तक उन्होंने झारखंड की आवाज बुलंद की। दशकों लंबे संघर्ष, आंदोलन और राजनीतिक प्रयासों के बाद 15 नवंबर 2000 को अलग झारखंड राज्य का गठन हुआ। झारखंड के निर्माण में उनकी भूमिका को इतिहास में हमेशा निर्णायक माना जाएगा।
राजनीतिक जीवन में भी शिबू सोरेन ने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। वे कई बार लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य रहे। केंद्र सरकार में कोयला मंत्री के रूप में उन्होंने अपनी सेवाएं दीं। झारखंड राज्य बनने के बाद वे तीन बार मुख्यमंत्री बने और राज्य के विकास, आदिवासी कल्याण तथा ग्रामीण क्षेत्रों के उत्थान के लिए विभिन्न योजनाओं को आगे बढ़ाने का प्रयास किया। उनकी राजनीतिक शैली हमेशा जनसरोकारों से जुड़ी रही और वे आम लोगों के बीच लोकप्रिय नेता के रूप में पहचाने जाते रहे।
सामाजिक क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। उन्होंने आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के प्रसार के लिए नाइट स्कूलों की शुरुआत कराई, ताकि दिन में काम करने वाले बच्चे और युवा भी शिक्षा प्राप्त कर सकें। वे नशामुक्ति अभियान के प्रबल समर्थक थे और गांव-गांव जाकर लोगों को शराब और अन्य नशे से दूर रहने की सलाह देते थे। उन्होंने सामाजिक एकता, सांप्रदायिक सौहार्द और सभी समुदायों को साथ लेकर चलने की नीति पर जोर दिया। यही कारण था कि झारखंड आंदोलन को विभिन्न वर्गों का व्यापक समर्थन मिला।
लंबे समय तक किडनी सहित कई गंभीर बीमारियों से जूझने के बाद 4 अगस्त 2025 को नई दिल्ली स्थित Sir Ganga Ram Hospital में 81 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था। उनके निधन के बाद पूरे झारखंड में शोक की लहर दौड़ गई थी और हजारों लोगों ने अपने प्रिय नेता को अंतिम विदाई दी थी।
मरणोपरांत पद्म भूषण सम्मान के रूप में देश ने शिबू सोरेन के संघर्ष, नेतृत्व और सामाजिक योगदान को औपचारिक मान्यता दी है। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उन आदर्शों का भी सम्मान माना जा रहा है जिनके लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित किया। जल, जंगल और जमीन की रक्षा, आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई, सामाजिक न्याय और झारखंड की पहचान के लिए उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

