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Wed. Mar 18th, 2026

चाइल्ड पोर्न देखना-डाउनलोड करना पॉक्सो-आईटी कानून के तहत अपराध..

नई दिल्ली:-सुप्रीम कोर्ट ने आज मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया है, जिसमें कहा गया था कि केवल बाल पोर्नोग्राफी डाउनलोड करना और देखना पॉक्सो अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत अपराध नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्र की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी से जुड़े फोटो-वीडियो का स्टोर करना यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO) के तहत अपराध है।

मद्रास हाईकोर्ट ने 11 जनवरी को एक 28 वर्षीय व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी थी, जिसके खिलाफ आरोप था कि उसने अपने मोबाइल पर बाल पोर्नोग्राफी सामग्री डाउनलोड की थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि आजकल बच्चे पोर्नोग्राफी देखने की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं और समाज को उन्हें दंडित करने के बजाय उन्हें शिक्षित करने के लिए परिपक्व होना चाहिए।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 बी के तहत अपराध गठित करने के लिए, एक आरोपी को यौन-स्पष्ट कार्य या आचरण में बच्चों को चित्रित करने वाली सामग्री प्रकाशित, प्रसारित या बनाई जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दो याचिकाकर्ता संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ वकील एचएस फुल्का की दलीलों पर ध्यान दिया, जिन्होंने बताया कि हाईकोर्ट का फैसला इस संबंध में कानूनों के विपरीत था। अदालत ने स्पष्ट किया कि बाल पोर्नोग्राफी को शेयर करना, देखना, बनाना और डाउनलोड करना सभी दंडनीय अपराध हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने संसद को POCSO अधिनियम में संशोधन के लिए कानून लाने का सुझाव दिया है, जिसमें ‘चाइल्ड पोर्नोग्राफी’ शब्द को ‘चाइल्ड यौन शोषण और अपमानजनक सामग्री’ से बदलने की बात कही गई है।

आरोपी पर अब फिर से केस चलेगा, और सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी से संबंधित सभी गतिविधियाँ गंभीर अपराध हैं। यह निर्णय बच्चों के कल्याण के लिए काम कर रही संस्थाओं द्वारा उठाए गए मुद्दों को भी उजागर करता है।

इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बाल सुरक्षा से संबंधित कानूनों का उल्लंघन सहन नहीं किया जाएगा और ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की जाएगी।

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