जमशेदपुर। मां दुर्गा की प्रतिमाओं के विसर्जन के बाद गुरुवार की सुबह स्वर्णरेखा नदी के घाट पर एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने लोगों को भावुक कर दिया। एक ओर प्रतिमा विसर्जन के बाद घाटों पर पूजा सामग्री और निर्माण में इस्तेमाल किए गए सामान बिखरे पड़े थे, वहीं दूसरी ओर कुछ जरूरतमंद लोग इसी मलबे में अपने काम की चीजें तलाशते नजर आए। किसी के हाथ में बांस था, तो कोई बल्लियां और अन्य उपयोगी सामग्री समेटकर किनारे रख रहा था। आम लोगों के लिए अनुपयोगी हो चुकी ये वस्तुएं गरीब परिवारों के लिए बड़ी राहत का साधन बन रही थीं।
विजयादशमी के अवसर पर मां दुर्गा की विदाई के दौरान शहर के विभिन्न विसर्जन घाटों पर श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गई थीं। ढोल-नगाड़ों की गूंज, जयकारों और मां के अगले वर्ष फिर आने की कामना के बीच प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया। उत्सव समाप्त होने के बाद जब घाटों पर भीड़ कम हुई, तब वहां जीवन की कठिनाइयों से जूझ रहे लोगों की एक अलग ही कहानी दिखाई देने लगी।
घाट पर बांस-बल्लियां समेट रहे कुछ लोगों ने बताया कि बरसात के दौरान उनके घरों को नुकसान पहुंचा है। आर्थिक तंगी के कारण वे मकान की मरम्मत के लिए नए बांस खरीदने में असमर्थ हैं। ऐसे में दुर्गा प्रतिमाओं के निर्माण में इस्तेमाल किए गए बांस और बल्लियां उनके लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती हैं। इन्हीं सामग्रियों के सहारे वे अपने टूटे-फूटे आशियाने की मरम्मत कर सकेंगे और परिवार को सिर छिपाने के लिए सुरक्षित जगह उपलब्ध कराने की कोशिश करेंगे।
जिस बांस और बल्लियों के सहारे कुछ दिन पहले मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाएं खड़ी थीं, विसर्जन के बाद वही सामग्री किसी गरीब परिवार की छत और दीवारों का सहारा बन सकती है। श्रद्धालुओं ने इस दृश्य को मां दुर्गा की विदाई के बाद जरूरतमंदों के लिए अनजाने में मिली सौगात के रूप में देखा।
विसर्जन के बाद घाटों की सफाई की जिम्मेदारी प्रशासन और नगर निकाय की होती है। ऐसे में सफाई शुरू होने से पहले जरूरतमंद लोगों का उपयोगी सामग्री चुनना गरीबी और मजबूरी की उस हकीकत को सामने लाता है, जो अक्सर उत्सव की चमक-दमक के बीच नजर नहीं आती।
स्वर्णरेखा नदी के घाट पर बिखरी सामग्री के बीच जरूरत की चीजें तलाशते लोगों की तस्वीर ने यह संदेश दिया कि एक व्यक्ति के लिए बेकार हो चुकी वस्तु किसी दूसरे के जीवन में नई उम्मीद जगा सकती है। मां दुर्गा की विदाई के बाद बचे बांस-बल्ले गरीब परिवारों के लिए फिर से आशियाना खड़ा करने का आधार बन सकते हैं। आस्था और भक्ति के माहौल के बीच यह दृश्य मानवीय संवेदना के साथ समाज में मौजूद आर्थिक विषमता की भी याद दिला गया।

