जमशेदपुर। मां दुर्गा की विदाई का क्षण श्रद्धा, भावुकता और आस्था से भरा होता है। नम आंखों से भक्त मां को विदा करते हैं और अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करते हैं। कोई मां के चरणों में अपनी पीड़ा अर्पित करता है, तो कोई परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करता है। लेकिन बुधवार को शहर में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान कुछ जुलूसों में बजाए गए फूहड़ और आपत्तिजनक बोल वाले गीतों ने धार्मिक आयोजनों की मर्यादा और हमारी सांस्कृतिक सोच पर सवाल खड़े कर दिए। एक ओर मां की विदाई में श्रद्धालु भावुक थे, वहीं दूसरी ओर तेज डीजे पर बजते कुछ गानों का शोर इस पवित्र अवसर की गरिमा को चुनौती देता नजर आया।
विसर्जन जुलूसों में भोजपुरी सहित अन्य लोकप्रिय गीतों के नाम पर ऐसे गाने सुनाई दिए, जिनके बोल पारिवारिक और धार्मिक माहौल के लिहाज से असहज माने जा सकते हैं। “तोहार लहंगा उठा देम रिमोट से”, “प्रखंड हो या जिला बहुआने से हिला”, “नया-नया ड्राइवर ह”, “लहरिया लूट ए राजा”, “चुम्मा-चुम्मा दे-दे चुम्मा” और “कमरिया करे लापा-लप” जैसे गीतों ने इस बहस को जन्म दिया कि क्या धार्मिक उत्सवों में मनोरंजन के नाम पर किसी भी तरह के गीतों को उचित ठहराया जा सकता है।
यह सवाल किसी भाषा, क्षेत्र या कलाकार की प्रतिभा के विरोध का नहीं है। भोजपुरी समेत देश की तमाम क्षेत्रीय भाषाओं में समृद्ध लोकसंगीत और सांस्कृतिक विरासत मौजूद है। लोकगीतों में मिट्टी की खुशबू, सामाजिक जीवन, प्रेम, परंपरा और लोकभावनाओं की सुंदर अभिव्यक्ति मिलती है। लेकिन लोकसंस्कृति की समृद्ध परंपरा और दोहरे अर्थ वाले फूहड़ मनोरंजन के बीच अंतर समझना भी उतना ही आवश्यक है।
मां दुर्गा की विदाई केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं से जुड़ा अवसर है। इस दौरान भजन, देवी स्तुति, पारंपरिक ढोल-नगाड़े और भक्ति संगीत वातावरण को श्रद्धामय बना सकते हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब उत्सव को सुंदर और संस्कारपूर्ण बनाने के इतने विकल्प मौजूद हैं, तो कुछ आयोजनों में आपत्तिजनक बोल वाले गीतों को प्राथमिकता क्यों दी जाती है?
डिजिटल युग में हर आयोजन को कैमरे में कैद करने, वीडियो बनाने और सोशल मीडिया पर वायरल करने की होड़ बढ़ गई है। कई बार तेज आवाज, अनोखे प्रदर्शन और भीड़ के बीच अलग दिखने की चाह उत्सव का केंद्र बन जाती है। हालांकि तकनीक और सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश में धार्मिक परंपराओं की गरिमा पीछे छूट जाए, तो इस प्रवृत्ति पर विचार करना जरूरी हो जाता है। कुछ घंटों के लिए वीडियो पर मिलने वाले व्यूज और लाइक हमारी सांस्कृतिक पहचान का विकल्प नहीं हो सकते।
उत्सव में नाचना-गाना और खुशी मनाना समाज की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। धार्मिक आयोजनों को पूरी तरह नीरस बनाने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन उत्साह के साथ अनुशासन और सामाजिक जिम्मेदारी भी होनी चाहिए। विसर्जन जुलूसों में बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग और परिवार के सदस्य शामिल होते हैं। ऐसे में गीतों के चयन से लेकर ध्वनि की तीव्रता तक हर पहलू का ध्यान रखना आयोजकों की जिम्मेदारी बनती है।
पूजा समितियों को विसर्जन के दौरान बजाए जाने वाले गीतों के चयन को लेकर गंभीरता दिखानी चाहिए। डीजे संचालकों को भी केवल लोगों की पसंद या व्यावसायिक लाभ के आधार पर संगीत बजाने के बजाय अवसर की प्रकृति और सामाजिक मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। वहीं, प्रशासन को निर्धारित ध्वनि मानकों और लागू नियमों का पालन सुनिश्चित करना चाहिए, ताकि धार्मिक उत्सवों का आनंद दूसरों के लिए परेशानी का कारण न बने।
सबसे बड़ा सवाल हमारी अपनी सोच से जुड़ा है। हम मां दुर्गा से सुख, शांति, समृद्धि और परिवार की खुशहाली मांगते हैं, लेकिन क्या हम अपने व्यवहार में उन मूल्यों को भी जगह देते हैं, जिनकी प्रेरणा हमें भारतीय संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से मिलती है? आधुनिकता अपनाना गलत नहीं है, लेकिन आधुनिक होने का अर्थ अपनी मर्यादा और संस्कारों को पीछे छोड़ देना भी नहीं है।
मां दुर्गा की विदाई ऐसी होनी चाहिए, जिसमें आंखें श्रद्धा से नम हों, हृदय भक्ति से भरा हो और वातावरण सकारात्मक ऊर्जा से सराबोर रहे। बुजुर्गों को सम्मान, महिलाओं को सहजता, बच्चों को अच्छे संस्कार और युवाओं को अपनी संस्कृति पर गर्व महसूस हो। यही किसी भी धार्मिक आयोजन की वास्तविक सफलता है।
हे मां शेरावाली! हमें ऐसी सद्बुद्धि दीजिए कि मनोरंजन के नाम पर हम अपनी संस्कृति और परंपराओं की गरिमा को न भूलें। हमारी आधुनिकता में संस्कार, हमारे उत्साह में अनुशासन और हमारी खुशियों में दूसरों के सम्मान का भाव बना रहे। मां की विदाई शोर और प्रदर्शन की नहीं, बल्कि श्रद्धा, भक्ति और सामाजिक सद्भाव की पहचान बने।

