जमशेदपुर।महाराष्ट्र की संत परंपरा में संत ज्ञानेश्वर का नाम श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने अल्पायु में ही ज्ञान, भक्ति और अध्यात्म को लोकभाषा के माध्यम से आम लोगों तक पहुंचाकर समाज में आध्यात्मिक चेतना का संचार किया। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को मनाए जाने वाले उनके जन्मोत्सव के अवसर पर उनके जीवन और विचारों को स्मरण किया जाता है।
संत ज्ञानेश्वर का जन्म वर्ष 1275 ईस्वी में महाराष्ट्र के आपेगांव में माना जाता है। उनके पिता विट्ठल पंत भगवान विट्ठल के भक्त थे। माता का नाम रुक्मिणीबाई था। विट्ठल पंत ने विवाह के बाद संन्यास ग्रहण कर लिया था, लेकिन गुरु की आज्ञा से उन्हें दोबारा गृहस्थ जीवन में लौटना पड़ा। इसके बाद उनके चार संतानों निवृत्तिनाथ, ज्ञानेश्वर, सोपानदेव और मुक्ताबाई का जन्म हुआ। सामाजिक रूढ़ियों के कारण परिवार को काफी कठिनाइयों और बहिष्कार का सामना करना पड़ा। इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद चारों भाई-बहनों ने अपनी आध्यात्मिक साधना और ज्ञान की यात्रा जारी रखी।
परंपराओं में वर्णित है कि ज्ञानेश्वर और उनके भाई-बहन सामाजिक मान्यता प्राप्त करने के लिए पैठण पहुंचे थे। उनके आध्यात्मिक ज्ञान और प्रतिभा से जुड़ी कई कथाएं आज भी लोकमानस में प्रसिद्ध हैं। भैंसे के मुख से वेदों का उच्चारण कराने और संत चांगदेव के सामने दीवार चलाने की कथा उनमें प्रमुख है। इन प्रसंगों ने संत ज्ञानेश्वर की असाधारण आध्यात्मिक प्रतिभा को जनमानस में विशेष पहचान दिलाई।
ज्ञानेश्वर को आध्यात्मिक शिक्षा उनके बड़े भाई निवृत्तिनाथ से मिली, जो नाथ संप्रदाय की परंपरा से जुड़े थे। उस समय धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों की भाषा मुख्य रूप से संस्कृत थी, जिसके कारण आम लोगों की पहुंच उनसे सीमित थी। संत ज्ञानेश्वर ने इसी दूरी को कम करने का प्रयास किया और अध्यात्म के गूढ़ विचारों को सरल मराठी भाषा में प्रस्तुत किया।
किशोरावस्था में उन्होंने भगवद्गीता का मराठी भाष्य ‘भावार्थदीपिका’ लिखा, जो आगे चलकर ‘ज्ञानेश्वरी’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस रचना ने गीता के दर्शन को सामान्य लोगों के लिए सहज और सरल बनाया। ज्ञानेश्वरी मराठी साहित्य और भक्ति आंदोलन की महत्वपूर्ण कृतियों में शामिल हो गई। इसके बाद उन्होंने ‘अमृतानुभव’ की रचना की। संत चांगदेव को संबोधित उनकी रचना ‘चांगदेव पासष्ठी’ भी उनकी आध्यात्मिक दृष्टि का महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है।
संत नामदेव समेत कई संतों के साथ उनकी तीर्थयात्रा ने महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा को व्यापक स्वरूप दिया। उन्होंने ज्ञान, भक्ति और कर्म को जीवन के लिए परस्पर पूरक बताया और अध्यात्म को केवल विद्वानों तक सीमित रखने के बजाय आम व्यक्ति के जीवन से जोड़ने का प्रयास किया। यही कारण है कि वे वारकरी परंपरा और महाराष्ट्र की संत परंपरा के प्रमुख प्रेरणास्रोतों में गिने जाते हैं।
संत ज्ञानेश्वर ने बहुत कम आयु में आलंदी में जीवित समाधि लेने का निर्णय किया। वर्ष 1296 में लगभग 21 वर्ष की आयु में उन्होंने समाधि ग्रहण की। आज आलंदी उनकी स्मृति से जुड़ा प्रमुख तीर्थस्थल है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि कठिन परिस्थितियों के बीच भी ज्ञान, साधना, भक्ति और लोककल्याण की भावना मनुष्य को ऐसा जीवन जीने की प्रेरणा दे सकती है, जिसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों तक बना रहता है।
वरुण कुमार,
लेखक एवं कवि के सौजन्य से

