जमशेदपुर।रक्षाबंधन का पर्व भारतीय संस्कृति में भाई और बहन के बीच प्रेम, विश्वास और रक्षा के संकल्प का प्रतीक माना जाता है। इस पर्व से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इन्हीं में भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और दानवीर राजा बलि से जुड़ी कथा विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार असुरराज राजा बलि अपने पराक्रम और दानशीलता के बल पर तीनों लोकों पर अधिकार स्थापित कर चुके थे। इससे देवतागण चिंतित हो गए और उन्होंने भगवान विष्णु से सहायता की प्रार्थना की। इसके बाद भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि के पास पहुंचकर दान में केवल तीन पग भूमि मांगी।
राजा बलि के वचन देने के बाद वामन देव ने विराट स्वरूप धारण कर लिया। उन्होंने पहले कदम में पृथ्वी, दूसरे कदम में आकाश और तीसरे कदम के लिए जब कोई स्थान शेष नहीं बचा तो राजा बलि ने अपना सिर उनके चरणों में रख दिया। राजा बलि की दानशीलता और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राजा बना दिया।
कथा के अनुसार राजा बलि ने भगवान विष्णु से वरदान मांगते हुए उनसे पाताल लोक में रहने और उनकी रक्षा के लिए द्वारपाल बनने का आग्रह किया। भगवान विष्णु ने राजा बलि की इच्छा स्वीकार कर ली और पाताल लोक में रहने लगे। जब माता लक्ष्मी को यह जानकारी मिली कि भगवान विष्णु पाताल लोक में रह रहे हैं और उनके वापस बैकुंठ लौटने की संभावना नहीं है, तो वह चिंतित हो उठीं।
माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को वापस बैकुंठ लाने का उपाय निकाला। उन्होंने एक साधारण महिला का रूप धारण किया और पाताल लोक पहुंचकर राजा बलि को अपना भाई बनाया। सावन पूर्णिमा के दिन उन्होंने राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और उनके सुखी, स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन तथा राज्य की समृद्धि की कामना की।
राजा बलि अपनी मुंहबोली बहन की प्रार्थना और स्नेह से प्रसन्न हुए और उन्हें उपहार मांगने के लिए कहा। तब माता लक्ष्मी ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट करते हुए बताया कि वह भगवान विष्णु को अपने साथ बैकुंठ ले जाने की इच्छा रखती हैं। राजा बलि ने अपनी बहन की इच्छा का सम्मान करते हुए भगवान विष्णु को पाताल लोक से मुक्त कर दिया। इसके बाद माता लक्ष्मी भगवान विष्णु के साथ बैकुंठ लौट गईं।
रक्षाबंधन से जुड़ी यह कथा भाई बहन के रिश्ते में विश्वास, त्याग, वचन और समर्पण के महत्व को दर्शाती है। इसी संदर्भ में एक प्रसिद्ध पंक्ति कही जाती है
मान तजी तो क्या भया
मान तजा न जाय
मान तजे बली राजा
हरि आपै मिल आय
इसका भावार्थ है कि धन-दौलत और सांसारिक सुखों का त्याग करना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन अहंकार और स्वाभिमान का त्याग करना कठिन होता है। राजा बलि की कथा मानव जीवन में त्याग, वचन पालन और ईश्वर के प्रति समर्पण का संदेश देती है।
रक्षाबंधन का पर्व इसी पवित्र भावना के साथ भाई-बहन के बीच प्रेम और विश्वास को मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है। यह पर्व हमें रिश्तों की गरिमा बनाए रखने, एक-दूसरे की रक्षा करने और स्नेह के बंधन को सदैव मजबूत रखने की प्रेरणा देता है।

