जमशेदपुर। प्रथम दीक्षा दिवस के अवसर पर आनंद मार्ग प्रचारक संघ की ओर से आनंद मार्ग जागृति में सेवा और आध्यात्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के दौरान तीन घंटे तक बाबा नाम केवलम अखंड कीर्तन किया गया। इसके साथ ही नारायण सेवा और मोबाइल नारायण सेवा के माध्यम से करीब 500 लोगों को भोजन कराया गया। वहीं जरूरतमंद 100 लोगों के बीच साड़ी और धोती का वितरण किया गया। सेवा कार्यक्रम के माध्यम से मानवता, प्रेम और सहयोग का संदेश दिया गया।
कार्यक्रम में आनंद मार्गियों को संबोधित करते हुए आचार्य पारसनाथ जी ने प्रथम दीक्षा दिवस के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आनंदमार्गी परंपरा के अनुसार वर्ष 1939 की श्रावणी पूर्णिमा की रात कोलकाता के हुगली नदी तट स्थित काशीमित्र घाट पर श्रीश्री आनंदमूर्तिजी ने कालीचरण बन्द्योपाध्याय को दीक्षा प्रदान की थी।
उन्होंने बताया कि कालीचरण उस समय अपराध जगत से जुड़े हुए थे और लूट के इरादे से छुरी और कटार लेकर वहां पहुंचे थे। सद्गुरु के सान्निध्य में उनके जीवन में आंतरिक परिवर्तन आया और उन्होंने हथियारों का त्याग कर गंगा स्नान करने के बाद दीक्षा ग्रहण की। बाद में वे कालिकानन्द अवधूत के नाम से प्रसिद्ध हुए।
आचार्य पारसनाथ जी ने कहा कि प्रथम दीक्षा दिवस केवल आध्यात्मिक इतिहास की स्मृति नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन में सकारात्मक बदलाव की संभावनाओं का संदेश भी देता है। व्यक्ति का अतीत चाहे जैसा भी रहा हो, सही मार्गदर्शन, साधना और आत्मोन्नति के माध्यम से उसके जीवन में परिवर्तन संभव है।
उन्होंने कहा कि प्रथम दीक्षा दिवस का संदेश अपराध से साधना, हिंसा से प्रेम और अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। आनंद मार्ग की दृष्टि में यह घटना मानव चेतना के रूपांतरण और भीतर मौजूद दिव्य शक्ति के जागरण का उदाहरण है।
कार्यक्रम के दौरान सेवा गतिविधियों को विशेष महत्व दिया गया। भोजन वितरण और वस्त्र वितरण के माध्यम से जरूरतमंद लोगों तक सहायता पहुंचाई गई। आयोजकों ने कहा कि मानव सेवा को आध्यात्मिक साधना से जोड़ते हुए समाज में प्रेम, सहयोग और सेवा भावना को मजबूत करना कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य रहा।

