जमशेदपुर।भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास ऐसे असंख्य वीरों के त्याग और बलिदान से भरा है, जिन्होंने विदेशी शासन की गुलामी को स्वीकार करने के बजाय अपने प्राणों की आहुति देना उचित समझा। मदनलाल ढींगरा ऐसे ही शौर्य, साहस और राष्ट्रभक्ति के प्रतीक क्रांतिकारी थे। उनके भीतर बचपन से ही अंग्रेजी शासन के प्रति तीव्र आक्रोश था। वे मानते थे कि भारत की स्वतंत्रता केवल प्रार्थनाओं और याचिकाओं से नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर संघर्ष और बलिदान से प्राप्त होगी।
मदनलाल ढींगरा का जन्म 18 सितंबर 1883 को अमृतसर के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनके पिता डॉ. दित्तामल ढींगरा अंग्रेज सरकार के अधीन प्रतिष्ठित चिकित्सक थे। परिवार का वातावरण अंग्रेजी शासन के अनुकूल था, लेकिन युवा मदनलाल के मन में देश की गुलामी को लेकर बेचैनी बढ़ती गई। वे भारतीयों के साथ होने वाले भेदभाव और अंग्रेजी शासन की नीतियों से अत्यंत क्षुब्ध थे।उच्च शिक्षा के लिए वे इंग्लैंड गए। लंदन पहुंचने के बाद उनके जीवन की दिशा निर्णायक रूप से बदल गई। वहां उनका संपर्क उन भारतीय राष्ट्रवादियों से हुआ, जो विदेश की धरती पर रहकर भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे थे। लंदन स्थित इंडिया हाउस उस समय भारतीय क्रांतिकारी गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका था। इंडिया हाउस के संस्थापक श्यामजी कृष्ण वर्मा के विचारों और वातावरण ने ढींगरा को गहराई से प्रभावित किया। इसी दौरान उनका संपर्क विनायक दामोदर सावरकर सहित कई क्रांतिकारियों से हुआ।सावरकर के संपर्क ने उनके भीतर के राष्ट्रवादी भाव को और अधिक दृढ़ किया। वे भारत की दासता को केवल राजनीतिक समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अपमान के रूप में देखते थे। उनका विश्वास था कि अंग्रेजी शासन को चुनौती देने के लिए भारतीय युवाओं को निर्भीक होकर आगे आना होगा।
1 जुलाई 1909 को लंदन के इंपीरियल इंस्टीट्यूट में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मदनलाल ढींगरा ने ब्रिटिश अधिकारी सर विलियम हट कर्जन वायली पर गोली चला दी। इस घटना में कर्जन वायली की मृत्यु हो गई। ढींगरा को तत्काल गिरफ्तार कर लिया गया। ब्रिटिश सरकार ने उनके विरुद्ध मुकदमा चलाया और उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई।मुकदमे के दौरान भी ढींगरा अपने निर्णय से विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपने कृत्य को भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष से जोड़कर देखा। उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था कि जब एक राष्ट्र को पराधीन बना दिया गया हो, तब स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना उसका अधिकार है।
17 अगस्त 1909 को लंदन की पेंटनविल जेल में मदनलाल ढींगरा को फांसी दे दी गई। उस समय उनकी आयु केवल 25 वर्ष के आसपास थी। इतनी कम उम्र में उन्होंने जिस निर्भीकता से मृत्यु का सामना किया, वह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेगा।मदनलाल ढींगरा का बलिदान केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं था, बल्कि यह उस पीढ़ी की बेचैनी और संकल्प का प्रतीक था, जो भारत को स्वतंत्र देखने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तैयार थी। उन्होंने यह संदेश दिया कि स्वतंत्रता का सपना देखने वाले युवाओं में साहस, आत्मविश्वास और राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा होनी चाहिए।
आज उनके बलिदान दिवस पर मदनलाल ढींगरा को स्मरण करना केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि उस त्याग और देशभक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है, जिसने स्वतंत्र भारत की नींव मजबूत की। उनके जीवन से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि राष्ट्रहित के लिए समर्पण, साहस और दृढ़ संकल्प किसी भी परिस्थिति में कमजोर नहीं पड़ना चाहिए।
अमर शहीद मदनलाल ढींगरा को उनके बलिदान दिवस पर शत-शत नमन।
वरुण कुमार,
लेखक एवं कवि के सौजन्य से

