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*‘टाइगर मैन’ फतेह सिंह राठौड़ : जिसने रणथंभौर के जंगलों को दी नई पहचान*

जमशेदपुर।भारत के वन्यजीव संरक्षण इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं, जिन्होंने केवल जंगलों और वन्यजीवों की रक्षा नहीं की, बल्कि समाज की सोच को भी बदलने का काम किया। फतेह सिंह राठौड़ ऐसे ही असाधारण वन्यजीव संरक्षक थे, जिन्हें प्रेम और सम्मान से भारत का ‘टाइगर मैन’ कहा जाता है। रणथंभौर के जंगलों और बाघों के संरक्षण के लिए उनका योगदान भारतीय वन्यजीव संरक्षण की यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। उनकी जयंती पर उन्हें याद करना प्रकृति और वन्यजीवों के प्रति हमारी जिम्मेदारी को भी स्मरण करना है।

फतेह सिंह राठौड़ का जन्म 19 अगस्त 1938 को राजस्थान में हुआ था। वन सेवा से जुड़े अपने लंबे कार्यकाल के दौरान उन्होंने जंगल को केवल पेड़ों और वन्यजीवों का क्षेत्र नहीं माना, बल्कि उसे एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में समझा। विशेष रूप से रणथंभौर क्षेत्र में उन्होंने बाघों के संरक्षण के लिए उल्लेखनीय कार्य किया। उस दौर में बाघों की संख्या में तेजी से गिरावट चिंता का विषय बन रही थी और अवैध शिकार वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा था।भारत में बाघ संरक्षण को संस्थागत मजबूती देने के लिए 1973 में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ शुरू किया गया। रणथंभौर भी इस संरक्षण अभियान के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल हुआ। राठौड़ ने इस क्षेत्र में बाघ संरक्षण को केवल सरकारी कार्रवाई तक सीमित नहीं रखा, बल्कि स्थानीय समुदायों को संरक्षण की प्रक्रिया से जोड़ने पर जोर दिया। उनका मानना था कि जंगल की रक्षा केवल बंदूक और कानून के बल पर नहीं की जा सकती; इसके लिए स्थानीय लोगों में जंगल और वन्यजीवों के प्रति अपनापन और जिम्मेदारी की भावना पैदा करना आवश्यक है।

रणथंभौर में काम करते हुए राठौड़ ने बाघों के व्यवहार को करीब से समझा। उन्होंने जंगल में लंबे समय तक रहकर बाघों की गतिविधियों, उनके आवास, भोजन और क्षेत्रीय व्यवहार का अध्ययन किया। यही अनुभव आगे चलकर उनके संरक्षण कार्य की बड़ी ताकत बना। वे बाघों को केवल पर्यटकों के आकर्षण या जंगल की शोभा के रूप में नहीं देखते थे, बल्कि उन्हें पारिस्थितिक संतुलन के लिए आवश्यक प्रजाति मानते थे।उनकी कार्यशैली का एक महत्वपूर्ण पक्ष था—वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता और स्थानीय समाज के साथ संवाद। रणथंभौर क्षेत्र में मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते टकराव की समस्या को समझते हुए उन्होंने संरक्षण की ऐसी सोच को बढ़ावा दिया, जिसमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी को महत्व दिया गया। यह विचार आज के आधुनिक वन्यजीव संरक्षण में भी अत्यंत प्रासंगिक है।

फतेह सिंह राठौड़ का व्यक्तित्व केवल एक वन अधिकारी तक सीमित नहीं था। वे एक कुशल वन्यजीव विशेषज्ञ, प्रशिक्षक और प्रकृति के प्रति गहरी संवेदना रखने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने अनेक लोगों को जंगल और बाघों को समझने की प्रेरणा दी। उनके प्रयासों से रणथंभौर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाघ संरक्षण के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में पहचान बनाने लगा। आज रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में बाघों और वन्यजीव पर्यटन के लिए प्रसिद्ध है। इस पहचान के पीछे राठौड़ जैसे संरक्षणवादियों की दशकों की मेहनत रही है।राठौड़ का संरक्षण दर्शन आज भी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्तमान समय में वन्यजीव संरक्षण के सामने चुनौतियां पहले से अधिक जटिल हैं। जंगलों पर बढ़ता मानवीय दबाव, आवासों का विखंडन, अवैध शिकार, जलवायु परिवर्तन और मानव-वन्यजीव संघर्ष जैसी समस्याएं संरक्षण की नई रणनीतियों की मांग करती हैं। ऐसे समय में राठौड़ की यह सोच प्रासंगिक बन जाती है कि वन्यजीव संरक्षण को स्थानीय समाज के हितों और सहभागिता से जोड़कर ही दीर्घकालिक सफलता हासिल की जा सकती है।उनका जीवन हमें यह भी सिखाता है कि किसी प्रजाति को बचाना केवल उसकी संख्या बढ़ाने का प्रयास नहीं है। उसके लिए सुरक्षित आवास, पर्याप्त भोजन-पानी, प्राकृतिक गलियारों और संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र की आवश्यकता होती है। बाघ को बचाने का अर्थ दरअसल पूरे जंगल को बचाना है। बाघ एक ‘अम्ब्रेला स्पीशीज’ के रूप में जिस बड़े पारिस्थितिकी तंत्र का प्रतिनिधित्व करता है, उसके संरक्षण से अनेक अन्य वन्यजीवों और वनस्पतियों को भी लाभ मिलता है।फतेह सिंह राठौड़ ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि प्रकृति संरक्षण केवल विभागीय जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामूहिक सामाजिक दायित्व है। उन्होंने जंगलों को देखने की दृष्टि बदली और यह समझ विकसित करने में योगदान दिया कि वन्यजीवों के अस्तित्व में मानव समाज का भी भविष्य जुड़ा हुआ है।

उनका निधन 1 मार्च 2011 को हुआ, लेकिन उनका कार्य आज भी जीवित है। रणथंभौर के जंगलों में घूमता कोई बाघ, कैमरे में कैद होती उसकी तस्वीर और संरक्षण के प्रति बढ़ती जन-जागरूकता उनके योगदान की याद दिलाती है।फतेह सिंह राठौड़ की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि देना केवल एक महान वन्यजीव संरक्षक को याद करना नहीं है, बल्कि यह संकल्प दोहराना भी है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कायम रखते हुए हम अपनी प्राकृतिक विरासत की रक्षा करेंगे। आने वाली पीढ़ियों को यदि समृद्ध वन, स्वच्छ पर्यावरण और स्वतंत्र विचरण करते वन्यजीव देने हैं, तो राठौड़ की संरक्षण-चेतना से प्रेरणा लेना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
फतेह सिंह राठौड़ का जीवन हमें यही संदेश देता है—बाघ को बचाइए, जंगल को बचाइए और जंगल को बचाकर मानव सभ्यता के भविष्य को सुरक्षित रखिए।

वरूण कुमार लेखक एवं कवि के सौजन्य से

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