जमशेदपुर। भारतीय इतिहास में मेवाड़ का नाम अदम्य साहस, स्वाभिमान और राष्ट्ररक्षा के लिए सदैव स्मरण किया जाता है। इस गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाने वाले वीर शासकों में महाराणा उदयसिंह द्वितीय का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे मेवाड़ के पराक्रमी शासक महाराणा साँगा और रानी कर्णावती के पुत्र तथा अमर वीर महाराणा प्रताप के पिता थे। 4 अगस्त 1522 ई. को चित्तौड़गढ़ में जन्मे महाराणा उदयसिंह का जीवन संघर्ष, धैर्य, दूरदर्शिता और मातृभूमि के प्रति समर्पण का अनुपम उदाहरण है।
महाराणा उदयसिंह का बचपन अत्यंत विषम परिस्थितियों में बीता। मेवाड़ के इतिहास का सबसे मार्मिक प्रसंग उस समय सामने आया जब बनवीर ने सत्ता प्राप्त करने के उद्देश्य से बालक उदयसिंह की हत्या का षड्यंत्र रचा। उस संकट की घड़ी में राजपरिवार की धाय माता पन्ना धाय ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर उदयसिंह के प्राण बचाए। भारतीय इतिहास में यह घटना मातृत्व, कर्तव्य और राष्ट्रनिष्ठा के सर्वोच्च आदर्श के रूप में सदैव स्मरण की जाती है। यदि पन्ना धाय का यह अद्वितीय बलिदान न हुआ होता, तो संभवतः मेवाड़ का इतिहास ही कुछ और होता।
1537 ई. में महाराणा उदयसिंह ने मेवाड़ के सिंहासन का दायित्व संभाला। उस समय राज्य अनेक आंतरिक और बाहरी चुनौतियों से घिरा हुआ था। दिल्ली और आगरा की सत्ता पर मुगलों का प्रभाव बढ़ रहा था तथा मेवाड़ लगातार आक्रमणों का सामना कर रहा था। इन कठिन परिस्थितियों में उन्होंने राज्य की सुरक्षा, प्रशासन और जनता के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास किए।
1567-68 ई. में मुगल सम्राट अकबर ने चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया। परिस्थितियाँ अत्यंत प्रतिकूल थीं, फिर भी मेवाड़ के वीरों ने अद्भुत शौर्य का परिचय दिया। महाराणा उदयसिंह ने रणनीतिक दृष्टि से चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा का दायित्व वीर सेनानायकों जयमल और पत्ता को सौंपा तथा स्वयं अरावली की पर्वतमालाओं की ओर चले गए, ताकि मेवाड़ का राजवंश सुरक्षित रहे और संघर्ष की ज्योति बुझने न पाए। यह निर्णय तत्कालीन परिस्थितियों में दूरदर्शी राजनीतिक सोच का परिचायक था।
महाराणा उदयसिंह का सबसे स्थायी और ऐतिहासिक योगदान उदयपुर नगर की स्थापना है। अरावली की सुरम्य घाटियों के बीच बसाया गया यह नगर आगे चलकर मेवाड़ की नई राजधानी बना। प्राकृतिक सुरक्षा, जल स्रोतों की प्रचुरता और सामरिक दृष्टि से इसकी स्थिति अत्यंत उपयुक्त थी। आज उदयपुर अपनी भव्य झीलों, राजमहलों, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक गौरव के कारण विश्वभर में “झीलों की नगरी” के रूप में प्रसिद्ध है। यह नगर महाराणा उदयसिंह की दूरदर्शिता और कुशल नेतृत्व का जीवंत स्मारक है।
महाराणा उदयसिंह ने अपने पुत्र महाराणा प्रताप को स्वाभिमान, स्वतंत्रता और मातृभूमि की रक्षा के वे संस्कार दिए, जिन्होंने आगे चलकर प्रताप को भारतीय इतिहास का अमर नायक बना दिया। इस दृष्टि से उदयसिंह केवल एक शासक ही नहीं, बल्कि ऐसे पिता और राष्ट्रनायक भी थे जिन्होंने आने वाली पीढ़ी को संघर्ष और स्वाभिमान का मार्ग दिखाया।
आज जब हम महाराणा उदयसिंह की जयंती मनाते हैं, तब यह केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व का स्मरण नहीं, बल्कि उस अदम्य संकल्प का सम्मान भी है जिसने मेवाड़ की अस्मिता को जीवित रखा। उनका जीवन हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में धैर्य, दूरदर्शिता, त्याग और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखकर ही इतिहास रचा जाता है।
महाराणा उदयसिंह तथा पन्ना धाय जैसे महान विभूतियों का जीवन भारतीय संस्कृति और राष्ट्रचेतना की अमूल्य धरोहर है। उनकी स्मृति सदैव हमें प्रेरित करती रहेगी कि स्वाभिमान, कर्तव्य और मातृभूमि की रक्षा के लिए किया गया प्रत्येक त्याग युगों-युगों तक अमर रहता है।
महाराणा उदयसिंह जी की जयंती पर उन्हें शत-शत नमन।
लेखन एवं कवि वरुण कुमार के सौजन्य से

