जमशेदपुर। 28 जुलाई, 2001 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास में अत्यंत पीड़ादायक स्मृति के रूप में दर्ज है। इसी दिन भारत सरकार ने औपचारिक रूप से उन चार वरिष्ठ स्वयंसेवकों को मृत घोषित किया, जिनका 6 अगस्त, 1999 को त्रिपुरा के कंचनपुर स्थित वनवासी कल्याण आश्रम के छात्रावास से सशस्त्र उग्रवादियों द्वारा अपहरण कर लिया गया था। लगभग दो वर्षों तक उनके सकुशल लौटने की आशा बनी रही, किंतु अंततः यह प्रतीक्षा शोक में बदल गई।
इन चारों कार्यकर्ताओं ने अपने जीवन का बड़ा भाग समाजसेवा, संगठन निर्माण और विशेष रूप से वनवासी क्षेत्रों में शिक्षा एवं सेवा कार्यों के लिए समर्पित किया था। उनके नाम थे—श्री श्यामलकांति सेनगुप्ता, श्री दीनेन्द्र डे, श्री सुधामय दत्त और श्री शुभंकर चक्रवर्ती।
सबसे वरिष्ठ श्री श्यामलकांति सेनगुप्ता का जन्म वर्तमान बांग्लादेश के श्रीहट्ट (सिलहट) जनपद के सुपातला ग्राम में हुआ था। देश विभाजन के बाद उनका परिवार असम के सिलचर में आकर बस गया। छात्र जीवन में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े। पिता के असामयिक निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने नौकरी के साथ उच्च शिक्षा पूरी की और जीवन बीमा निगम में कार्यरत रहे। 1992 में सेवा-निवृत्ति के बाद उन्होंने अपना पूरा समय सामाजिक एवं संगठनात्मक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया। उनके अनुभव और समर्पण को देखते हुए उन्हें क्षेत्र कार्यवाह का महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया।
श्री दीनेन्द्र डे का जन्म 1953 में कोलकाता में हुआ। किशोरावस्था से ही वे संघ की शाखा से जुड़े और आगे चलकर पूर्णकालिक प्रचारक बने। उन्होंने पश्चिम बंगाल के अनेक जिलों में संगठन विस्तार का कार्य किया तथा वनवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा परियोजनाओं में सक्रिय भूमिका निभाई। उनका जीवन अनुशासन, सादगी और समर्पण का उदाहरण माना जाता है।
श्री सुधामय दत्त भी लंबे समय तक प्रचारक के रूप में कार्यरत रहे। उन्होंने विभिन्न जिलों में संगठनात्मक दायित्व निभाने के साथ सेवा गतिविधियों का संचालन किया। पत्रकारिता में रुचि होने के कारण उन्हें कोलकाता से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका स्वस्तिका के प्रबंधन का दायित्व भी मिला। अपहरण के समय वे अगरतला में विभाग प्रचारक के रूप में कार्य कर रहे थे।
सबसे युवा श्री शुभंकर चक्रवर्ती विधि की शिक्षा प्राप्त करने के बाद पूर्णकालिक प्रचारक बने। उन्होंने पश्चिम बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने के उपरांत त्रिपुरा में धर्मनगर जिले का दायित्व संभाला। युवावस्था में ही उन्होंने समाजसेवा और राष्ट्रकार्य को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था।
6 अगस्त, 1999 को ये चारों कार्यकर्ता त्रिपुरा के कंचनपुर स्थित वनवासी कल्याण आश्रम के छात्रावास में थे, जहाँ से उनका अपहरण कर लिया गया। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। लंबे समय तक उनकी खोज के प्रयास चलते रहे, किंतु सफलता नहीं मिली। अंततः 28 जुलाई, 2001 को सरकार ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
इस घटना की सबसे मार्मिक बात यह रही कि चारों कार्यकर्ताओं के पार्थिव शरीर कभी प्राप्त नहीं हो सके। परिणामस्वरूप उनके परिवारों को अंतिम दर्शन का अवसर भी नहीं मिला और पारंपरिक अंतिम संस्कार की धार्मिक एवं पारिवारिक प्रक्रियाएँ भी पूर्ण नहीं हो सकीं। यह पीड़ा आज भी उनके परिजनों और उन्हें जानने वाले अनेक लोगों की स्मृतियों में जीवित है।
यह घटना केवल चार व्यक्तियों के निधन की नहीं थी, बल्कि उन असंख्य सामाजिक कार्यकर्ताओं के समर्पण और जोखिम का भी स्मरण कराती है, जो देश के दूरस्थ एवं चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में शिक्षा, सेवा और समाज-जागरण के कार्य में लगे रहते हैं। 28 जुलाई की यह स्मृति हमें सेवा, साहस, कर्तव्यनिष्ठा और समाज के प्रति समर्पण की प्रेरणा देती है तथा उन सभी कार्यकर्ताओं को श्रद्धापूर्वक नमन करने का अवसर भी प्रदान करती है, जिन्होंने अपने आदर्शों के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया।
लेखन एवं कवि वरुण कुमार के सौजन्य से

